सोमनाथ और नालंदा सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक
शुक्रवार को नालंदा विश्वविद्यालय में “भाषा और नालन्दा परम्परा: हिंदी के संवर्धन और वैश्विक संवाद में विविध संस्थाओं की भूमिका” विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ.
प्रतिनिधि, राजगीर
यह संगोष्ठी प्राचीन नालंदा की ज्ञान-परम्परा को आधुनिक संदर्भों में पुनर्स्थापित करने और हिन्दी को तकनीक, वैश्विक संवाद तथा भारतीय सभ्यता से जोड़ने की एक महत्वपूर्ण अकादमिक पहल के रूप में देखी जा रही है. उद्घाटन सत्र में कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी ने विषय-प्रवर्तन करते हुए कहा कि हिन्दी के वैश्विक प्रसार के लिए तकनीकी एकीकरण, सुदृढ़ अनुवाद तंत्र और नई शब्दावली का विकास अनिवार्य है. उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल माध्यम भाषाओं को जोड़ने के प्रभावी साधन बन सकते हैं. साथ ही अंग्रेज़ी के बढ़ते प्रभाव जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए अकादमिक संस्थानों और हिन्दी सेवी संस्थाओं के बीच समन्वित प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया. उन्होंने नालंदा विश्वविद्यालय को भाषाई विकास और बहुभाषिक संवाद का आधार केंद्र बनाने की प्रतिबद्धता दोहराई. डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन के निदेशक एवं पूर्व सांसद तरुण विजय ने अपने विचार रखते हुए भारत की सनातन चेतना, वैचारिक स्वतंत्रता और बौद्धिक पुनरुत्थान पर विस्तार से चर्चा की. उन्होंने कहा कि हजार वर्षों के वैश्विक आक्रमणों के बावजूद भारतीय आत्मा और चेतना अविजित रही है. उन्होंने सोमनाथ और नालंदा को शक्ति, विद्या और ज्ञान का केंद्र बताते हुए इनके पुनर्स्थापन को सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक बताया. उन्होंने पूर्वी एशिया में संस्कृत और भारतीय संस्कृति के प्रभाव, थाईलैंड व म्यांमार में भारतीय परम्पराओं की उपस्थिति तथा कुमारजीव द्वारा चीन में भारतीय ज्ञान के प्रसार का भी उल्लेख किया. संगोष्ठी के पहले दिन “भाषायी नवाचार और सम्पादकीय दृष्टि”, “नालंदा और साहित्यिक संस्कृति” तथा “भाषायी नवाचार: कृत्रिम बुद्धिमत्ता एवं तकनीकी अनुप्रयोग” जैसे सत्रों में देश-विदेश के प्रतिष्ठित विद्वानों ने सहभागिता की. अकादमिक विमर्श के साथ सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ भी हुईं, जिन्होंने भारतीय भाषाओं और परम्पराओं की जीवंत अभिव्यक्ति प्रस्तुत की. नालंदा जैसे ऐतिहासिक विरासत स्थल पर आयोजित यह संगोष्ठी हिन्दी को अतीत की गौरवशाली विरासत से जोड़ते हुए भविष्य की वैश्विक संभावनाओं से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.
— हिन्दी केवल एक भाषा नहीं, आम जनता की संवेदना : अंजनी बिहार संग्रहालय के महानिदेशक अंजनी कुमार सिंह ने हिन्दी की जन-जीवन में गहरी पैठ और उसकी संवादात्मक शक्ति पर प्रकाश डाला. उन्होंने बिहार संग्रहालय के अनुभव साझा करते हुए कहा कि संग्रहालय में आने वाले लगभग 98 प्रतिशत दर्शक बिहार एवं आसपास के राज्यों से होते हैं, जो हिन्दी को सहज रूप से बोलते, समझते और उससे भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं. यह तथ्य अपने आप में प्रमाण है कि हिन्दी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि आम जनता की संवेदना और सांस्कृतिक चेतना की अभिव्यक्ति है. अंजनी कुमार सिंह ने कहा कि सांस्कृतिक संस्थानों के लिए हिन्दी सबसे सशक्त जनसंवाद का माध्यम है. इसके माध्यम से इतिहास, कला और विरासत को आम लोगों तक प्रभावी ढंग से पहुँचाया जा सकता है. उन्होंने जोर देते हुए कहा कि हिन्दी के माध्यम से संग्रहालय और विश्वविद्यालय जैसी संस्थाएँ समाज के व्यापक वर्ग से जुड़ सकती हैं. ज्ञान को केवल अकादमिक दायरों तक सीमित न रखकर जनसरोकारों से जोड़ सकती है.अलग अलग सत्रों में इन्होंने भी विचार व्यक्त किया :
अमर उजाला के डिजिटल संपादक, जयदीप कर्णिक, बिहार लोक सेवा आयोग के सदस्य प्रो. अरुण कुमार भगत , अमृत मंथन के संयुक्त संपादक प्रो. हेमन्त कुकरेती, पत्रकार सचिन जोशी, लिस्बन विश्वविद्यालय, पुर्तगाल के प्रो. शिव कुमार सिंह, डीयू के प्रो. हीरा पॉल गांगनेगी, महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विवि, उज्जैन के डॉ. विनायक पाण्डेय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रो. शिवपाल शर्मा, भाषिणी—डिजिटल इंडिया परियोजना के सीईओ अमिताभ नाग ने विचार व्यक्त किया. इस अवसर पर हैदराबाद विश्वविद्यालय के प्रो. अम्बा कुलकर्णी, एम आईटी-आईआईकेएस के प्रो साई रामकृष्ण सुसरला, आईआईटी कानपुर के प्रो. अनंत भट्टाचार्य, जयप्रकाश विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. हरिकेश सिंह के अलावे प्रो. एच.पी. शुक्ला, मुंबई विश्वविद्यालय के प्रो. हुलनाथ पाण्डेय और बीआर अम्बेडकर विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर के प्रो. प्रमोद कुमार, और प्रो. जैनेन्द्र कुमार पाण्डेय ने विचार व्यक्त किया.
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