355 दिन थाने में विराजते हैं गणपति, 10 दिनों के लिए निकलते हैं बाहर; 40 साल से चली आ रही सिलाव के ''महाराजा'' की अनोखी परंपरा

नालंदा के सिलाव में स्थित 'बुढ़वा गणेश' की प्रतिमा साल के 355 दिन थाने की सुरक्षा में रहती है. केवल गणेश चतुर्थी पर 10 दिनों के लिए यह प्रतिमा बाजार चौक पर भक्तों के दर्शन के लिए लाई जाती है. यह अनोखी परंपरा चोरी की घटना के बाद शुरू हुई थी.

Nalanda budhwa ganesh: सोमवार को देशभर में गणेश चतुर्थी का पर्व उल्लास और भव्यता के साथ मनाया गया, लेकिन नालंदा जिले के सिलाव में इस पर्व की छटा और आस्था का स्वरूप बिल्कुल अनूठा है. यहां विघ्नहर्ता भगवान गणेश की एक अति-प्राचीन और बेशकीमती प्रतिमा है, जिसे साल के 355 दिन सिलाव थाने की सुरक्षा में रखा जाता है. ‘बुढ़वा गणेश’ के नाम से विख्यात यह प्रतिमा गणेश चतुर्थी के अवसर पर 10 दिनों के लिए थाने से बाहर आती है. स्थानीय लोग इन्हें सिलाव का ‘महाराजा’ कहते हैं.

थाने से धूमधाम के साथ बाजार पहुंचते हैं बुढ़वा गणेश

गणेश चतुर्थी के अवसर पर पूजा समिति के सदस्य थाना को सूचना देकर श्रद्धालुओं के साथ बुढ़वा गणेश की प्रतिमा को धूमधाम और गाजे-बाजे के साथ बाजार चौक पर लेकर जाते हैं. थाना परिसर से करीब 500 मीटर दूर सिलाव बाजार चौक पर प्रतिमा को 10 दिनों के लिए स्थापित किया जाता है. इसके बाद अनंत चतुर्दशी के दिन विधि-विधान के साथ विसर्जन किया जाता है और प्रतिमा को दोबारा सिलाव थाने में सुरक्षित रखा जाता है.

चोरी की घटना के बाद थाने में रखने का लिया गया निर्णय

स्थानीय बुजुर्ग बाल गोविंद राय बताते हैं कि शुरुआत में भगवान की प्रतिमा मिट्टी की हुआ करती थी, जिसे बाद में पाषाण यानी संगमरमर में बदल दिया गया. यह प्रतिमा पहले सिलाव के प्रसिद्ध ‘श्याम सरोवर ठाकुरबाड़ी’ में स्थापित रहती थी.

दशकों पहले कुछ चोरों ने इस बेशकीमती पाषाण प्रतिमा को चुराकर भागने का प्रयास किया था. हालांकि, स्थानीय लोगों की सतर्कता से चोर पकड़े गये और प्रतिमा सुरक्षित बच गयी. इसके बाद सिलाव की जनता और पूजा समिति ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि दुर्लभ प्रतिमा को सिलाव थाना परिसर स्थित मंदिर में रखा जाये, ताकि इसकी सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके. स्थानीय लोगों के अनुसार, करीब 40 वर्षों से यह व्यवस्था चली आ रही है.

एक ही पत्थर को तराश कर बनी है करीब चार फीट ऊंची प्रतिमा

स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, बुढ़वा गणेश की प्रतिमा उजले ‘लोहिया पत्थर’ को तराश कर बनायी गयी है. इसकी ऊंचाई करीब चार फीट है और वजन काफी अधिक है. प्रतिमा को उठाने के लिए कई हट्टे-कट्टे लोगों की जरूरत पड़ती है. ग्रामीणों का कहना है कि प्रतिमा में कहीं कोई जोड़ नहीं है, बल्कि इसे एक ही पत्थर को काटकर बारीकी से गढ़ा गया है.

बुढ़वा गणेश की महिमा पूरे क्षेत्र में विख्यात है. लोगों का मानना है कि जो भी भक्त सच्चे मन से इनके दरबार में मन्नत मांगता है, उसकी मुराद पूरी होती है. इसी आस्था के कारण इस प्रतिमा का सिलाव में विशेष महत्व है.

10 दिनों के लिए हार्डवेयर की दुकान बन जाती है पूजा स्थल

बुढ़वा गणेश के विराजमान होने की परंपरा का सबसे अनूठा पहलू यह है कि भगवान की प्रतिमा किसी मंदिर में नहीं, बल्कि सिलाव चौक बाजार स्थित एक हार्डवेयर की दुकान में 10 दिनों के लिए स्थापित होती है. दुकान संचालक संजीव प्रसाद भदानी बताते हैं कि वे पिछले 25-30 वर्षों से यह दुकान चला रहे हैं. उनसे पहले उनके अभिभावक कपड़े का कारोबार करते थे.

संजीव प्रसाद भदानी के अनुसार, जब इस दुकान की खरीद-बिक्री हुई थी, तभी यह शर्त और संकल्प लिया गया था कि जब तक गणेश जी यहां बैठेंगे, इस स्थान से उन्हें कोई हटा नहीं सकता. हर साल भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से एक दिन पहले दुकान को पूरी तरह खाली कर दिया जाता है. अगले 10 दिनों तक कारोबार बंद रहता है और दुकान भव्य पूजा पंडाल में तब्दील हो जाती है.

विसर्जन के अगले दिन दोबारा शुरू होता है कारोबार

बुढ़वा गणेश को 10 दिनों तक दर्शन देने के बाद अनंत चतुर्दशी के दिन गाजे-बाजे और विधि-विधान के साथ विदाई दी जाती है. विसर्जन के अगले दिन संजीव प्रसाद भदानी अपनी दुकान में दोबारा कारोबार शुरू करते हैं.

जल्द बनेगा बुढ़वा गणेश का स्थायी मंदिर

पूजा समिति के सदस्यों का कहना है कि उन्होंने थाने में लिखित प्रतिवेदन दिया हुआ है. वर्तमान में बुढ़वा गणेश का अपना कोई स्थायी मंदिर नहीं है. समिति की इच्छा है कि भगवान का भव्य और सुरक्षित स्थायी मंदिर बनाया जाये. मंदिर तैयार होने के बाद प्रतिमा को हमेशा के लिए वहां स्थापित किया जायेगा.

थाना परिसर में प्रतिमा रखने को लेकर पुलिसकर्मियों ने बताया कि सुरक्षा के दृष्टिकोण से बुढ़वा गणेश को थाना परिसर में रखा जाता है. गणेश चतुर्थी पर पूजा समिति के सदस्य और श्रद्धालु प्रतिमा को बाजार में ले जाते हैं और 10 दिनों तक पूजा-अर्चना के बाद विसर्जन कर प्रतिमा को वापस थाना परिसर में स्थापित कर देते हैं. यह सिलसिला कई वर्षों से चला आ रहा है.

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लेखक के बारे में

By दिलीप कुमार

दिलीप कुमार ने वर्ष 1990 में पत्रकारिता की शुरुआत की. वर्ष 2000 से प्रभात खबर से जुड़े हैं. नालंदा के सिलाव समेत आसपास के प्रखंडों से रिपोर्टिंग करते हैं.

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