कच्छ के वेकरिया रण में नालंदा सूरज अव्वल, 66 घोड़ों को पछाड़ा

गुजरात के कच्छ जिले में पाकिस्तान सीमा से सटे वेकरिया रण में 18 जनवरी को आयोजित पारंपरिक घुड़दौड़ प्रतियोगिता में बिहार के नालंदा जिले ने ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की.

एकंगरसराय. गुजरात के कच्छ जिले में पाकिस्तान सीमा से सटे वेकरिया रण में 18 जनवरी को आयोजित पारंपरिक घुड़दौड़ प्रतियोगिता में बिहार के नालंदा जिले ने ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की. देश के विभिन्न राज्यों से आए घोड़ों के बीच हुए कड़े मुकाबले में एकंगरसराय निवासी अरुण सिंह के स्वामित्व वाले घोड़े नालंदा सूरज ने दो दांत वाले घुड़दौड़ वर्ग में प्रथम स्थान प्राप्त कर राष्ट्रीय स्तर पर नालंदा का नाम रोशन किया.

इस प्रतिष्ठित प्रतियोगिता का आयोजन राम रहीम अश्व मंडली द्वारा किया गया था. दो दांत वाले वर्ग में पंजाब, राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, गुजरात, तमिलनाडु एवं बिहार से आए कुल 66 घोड़ों ने भाग लिया. सीमावर्ती रेतीले क्षेत्र में आयोजित इस दौड़ को तकनीकी और शारीरिक दृष्टि से अत्यंत चुनौतीपूर्ण माना जाता है. कठिन परिस्थितियों के बावजूद घुड़सवार हंसराज के कुशल संचालन में नालंदा सूरज ने पूरे ट्रैक पर बेहतरीन संतुलन और रफ्तार का प्रदर्शन किया. अंतिम चरण में शानदार बढ़त बनाते हुए उसने सभी प्रतिद्वंद्वी घोड़ों को पीछे छोड़ दिया. आयोजकों और घुड़दौड़ प्रेमियों ने इस प्रदर्शन को प्रतियोगिता की सबसे प्रभावशाली जीतों में से एक बताया. प्रतियोगिता के दौरान कुल पांच श्रेणियों में दौड़ कराई गई, जिसमें देशभर से 285 घोड़ों ने हिस्सा लिया. सीमावर्ती इलाके में इतने बड़े स्तर पर हुए इस आयोजन ने पारंपरिक भारतीय घुड़दौड़ को एक बार फिर चर्चा में ला दिया. अरुण सिंह ने बताया कि घुड़दौड़ उनके लिए केवल प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि वर्षों पुरानी परंपरा और आत्मसम्मान का विषय है. इसी भावना के साथ उन्होंने लाखों रुपये खर्च कर घोड़े को विशेष ट्रक से गुजरात भेजा, जबकि स्वयं सहयोगियों के साथ सड़क मार्ग से वेकरिया रण पहुंचे. 24 जनवरी को एकंगरसराय में सम्मान समारोह कच्छ में मिली इस बड़ी सफलता के बाद 24 जनवरी को एकंगरसराय में नालंदा सूरज के सम्मान में भव्य स्वागत समारोह आयोजित किया जायेगा. समारोह में घोड़े के स्वामी अरुण सिंह और घुड़सवार हंसराज को सम्मानित किया जायेगा. स्थानीय नागरिकों, खेल प्रेमियों और सामाजिक प्रतिनिधियों की बड़ी उपस्थिति रहने की संभावना है. क्षेत्रवासियों का मानना है कि यह जीत केवल एक व्यक्ति या घोड़े की नहीं, बल्कि नालंदा और बिहार की पारंपरिक खेल संस्कृति की जीत है, जिसने एक बार फिर राष्ट्रीय मंच पर अपनी मजबूत पहचान दर्ज करायी है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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By AMLESH PRASAD

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