नालंदा में हरियाली पर 112 करोड़ खर्च करने के बाद भी विभाग के पास रिकार्ड नहीं, आखिरकार कितने पेड़ जिंदा बचें

Nalanda News : (कंचन कुमार) जिले में पिछले दस वर्षो के दौरान मनरेगा योजना के तहत हरियाली बढ़ाने के लिए 112 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए गए और 28 लाख से ज्यादा पौधे लगाने का दावा किया गया. हालांकि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद विभाग के पास यह स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं है कि इनमें से कितने पौधे आज भी जीवित हैं.

Nalanda News : (कंचन कुमार) जिले में पिछले दस वर्षो के दौरान मनरेगा योजना के तहत हरियाली बढ़ाने के लिए 112 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए गए और 28 लाख से ज्यादा पौधे लगाने का दावा किया गया. हालांकि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद विभाग के पास यह स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं है कि इनमें से कितने पौधे आज भी जीवित हैं। ऐसे में पूरे पौधारोपण अभियान की सफलता और पारदर्शिता पर सवाल खड़े होने लगे हैं.

10 साल में 28 लाख पौधे लगाने का दावा, लक्ष्य का 83 प्रतिशत हासिल

विभागीय आंकड़ों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2016-17 से 2025-26 तक 33.58 लाख पौधे लगाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था. अब तक 28.04 लाख पौधों के रोपण का दावा किया गया है, जो कुल लक्ष्य का लगभग 83.51 प्रतिशत है। इन पौधों को सड़क किनारे, आहर-पइन, विद्यालय परिसरों, सरकारी भूमि और निजी भूखंडों पर लगाया गया.

पौधे लगाने से लेकर रखरखाव तक 112 करोड़ रुपये खर्च

मनरेगा मद से पौधारोपण कार्यों पर अब तक करीब 112 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं. इस राशि में गड्ढा खुदाई, पौधों की खरीद, खाद, जैव उर्वरक, ट्री गार्ड और मजदूरी भुगतान शामिल हैं। पौधों की सुरक्षा और देखरेख के लिए वनपोषकों की नियुक्ति का भी प्रावधान किया गया है.

आखिर जिंदा कितने पौधे बचें हैं?

विभाग के पास पौधारोपण का रिकॉर्ड तो उपलब्ध है, लेकिन वर्तमान में कितने पौधे जीवित हैं और कितने नष्ट हो चुके हैं, इसकी अद्यतन जानकारी नहीं है\. पिछले वर्ष जीवित पौधों की गणना और सत्यापन का निर्देश भी दिया गया था, लेकिन उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई। इससे खर्च और परिणाम के बीच पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं.

विकास कार्यों की भेंट चढ़ रहे हजारों पौधे

जिले में सड़क चौड़ीकरण, नहर निर्माण और अन्य विकास परियोजनाओं के दौरान बड़ी संख्या में पौधों की कटाई की शिकायतें सामने आई हैं. गिरियक और सिलाव प्रखंड के कई क्षेत्रों में नहर निर्माण के दौरान 1200 से 1800 पौधों के कटने की बात कही जा रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि कई पौधों को बचाया जा सकता था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया.

हरियाली बढ़ाने और पेड़ काटने की दोहरी तस्वीर

समाजसेवियों का कहना है कि एक तरफ करोड़ों रुपये खर्च कर पौधारोपण किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ विकास परियोजनाओं के नाम पर उन्हीं पौधों को काटा जा रहा है. प्रतिपूरक पौधारोपण की व्यवस्था भी कई मामलों में प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो रही है.

वन भूमि पर कब्जे और प्रतिपूरक पौधारोपण पर भी सवाल

राजगीर क्षेत्र में पुलिस प्रशिक्षण केंद्र निर्माण के दौरान बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई हुई थी. इसके बदले अन्य स्थानों पर पौधारोपण की योजना बनाई गई, लेकिन भूमि विवाद और अतिक्रमण के कारण कई योजनाएं प्रभावित हुईं। सूत्रों के अनुसार जिले में 72 हेक्टेयर वन भूमि पर अवैध कब्जे के मामले भी सामने आए हैं.

दो मॉडल से चल रहा पौधारोपण अभियान

जिले में निजी और सार्वजनिक भूमि मॉडल के तहत पौधारोपण कराया जा रहा है. दोनों मॉडलों में 200 पौधों की एक इकाई पर लगभग 80 हजार रुपये खर्च किए जाते हैं. सार्वजनिक भूमि पर दो और निजी भूमि पर एक वनपोषक की नियुक्ति का प्रावधान है.

हर साल आग में जल रहे हजारों पौधे

गर्मी के मौसम में झाड़-झंखाड़ साफ करने के लिए लगाई जाने वाली आग कई बार बड़े क्षेत्र में फैल जाती है. इसके कारण सड़क किनारे, तालाब, आहर और पइन के किनारे लगाए गए हजारों पौधे हर साल नष्ट हो जाते हैं। स्थानीय स्तर पर निगरानी की कमी इस समस्या को और गंभीर बना रही है.

अनियमितताओं के आरोपों ने बढ़ाई चिंता

पौधारोपण कार्यों में फर्जी भुगतान, गलत जियो-टैगिंग, कम गुणवत्ता वाले पौधे लगाने और वनपोषकों के चयन में पक्षपात जैसे आरोप समय-समय पर सामने आते रहे हैं। कुछ मामलों में पोर्टल पर भ्रामक तस्वीरें अपलोड करने की शिकायतें भी मिली हैं.

पारदर्शिता और सोशल ऑडिट की बढ़ी मांग

विशेषज्ञों का मानना है कि पौधारोपण की सफलता केवल पौधे लगाने से नहीं, बल्कि उनके जीवित रहने और विकसित होने से तय होगी. इसके लिए ग्राम सभा से लेकर भुगतान और निगरानी तक पूरी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने की आवश्यकता है. स्वतंत्र एजेंसियों द्वारा नियमित सत्यापन और सोशल ऑडिट को भी जरूरी बताया जा रहा है.

हरियाली अभियान की सफलता पर टिकी निगाहें

करोड़ों रुपये खर्च और लाखों पौधे लगाने के दावों के बावजूद जीवित पौधों का स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने से पूरे अभियान की वास्तविक उपलब्धि पर सवाल उठ रहे हैं. अब लोगों की नजर इस बात पर है कि विभाग जीवित पौधों की वास्तविक संख्या का रिकॉर्ड कब सार्वजनिक करता है और हरियाली अभियान की सफलता को कैसे साबित करता है.

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Published by: Vivek Singh

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