नालंदा यूनिवर्सिटी ने नई दिल्ली स्थित इंडिया हैबिटेट सेंटर में कौटिल्य ग्लोबल सेंटर फॉर स्टेट कैपेसिटी पर उच्चस्तरीय राउंडटेबल का आयोजन कर वैश्विक दक्षिण में शासन क्षमता, लोक सेवा और संस्थागत विकास को लेकर महत्वपूर्ण विमर्श की शुरुआत की. कार्यक्रम में केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए.
राउंडटेबल में विभिन्न देशों के राजनयिकों, वरिष्ठ नीति-निर्माताओं, बहुपक्षीय संस्थानों के प्रतिनिधियों और परोपकारी संगठनों के शीर्ष पदाधिकारियों ने भाग लेकर स्टेट कैपेसिटी और दक्षिण-दक्षिण सहयोग को मजबूत करने के उपायों पर विचार-विमर्श किया.
चर्चा का प्रमुख केंद्र यह रहा कि कौटिल्य ग्लोबल सेंटर फॉर स्टेट कैपेसिटी भारत और एशिया की समृद्ध शासन एवं लोक सेवा परंपराओं को आधुनिक सार्वजनिक प्रशासन, संस्थागत सुधार और विकास की समकालीन जरूरतों से किस प्रकार जोड़ सकता है.
प्रतिभागियों ने माना कि वैश्विक दक्षिण के देशों के बीच अनुभवों और ज्ञान का आदान-प्रदान शासन व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.
केवल कौशल विकास पर्याप्त नहीं, मानसिक क्षमता का निर्माण जरूरी: डॉ. जितेंद्र सिंह
मुख्य अतिथि डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि तेजी से बदलते तकनीकी और सामाजिक परिवेश में भारत को वैश्विक स्तर पर प्रासंगिक बनाए रखने के लिए केवल कौशल विकास पर्याप्त नहीं है, बल्कि मानसिक क्षमता का निर्माण भी जरूरी है. इसके लिए निरंतर सीखने, परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढालने और नवाचार की प्रवृत्ति को बढ़ावा देना होगा.
उन्होंने स्टेट कैपेसिटी को केवल सरकारी संस्थानों तक सीमित रखने के बजाय पूरे समाज को जोड़ने वाला सामूहिक दृष्टिकोण विकसित करने की आवश्यकता बतायी. उन्होंने कहा कि क्षमता निर्माण से जुड़े विभिन्न संस्थानों को एक व्यापक ईकोसिस्टम से जोड़कर बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकते हैं.
भारत के ऐतिहासिक और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक स्टेट कैपेसिटी के साथ जोड़ने की कौटिल्य ग्लोबल सेंटर की क्षमता को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि यह केंद्र ग्लोबल साउथ के देशों के लिए शासन क्षमता निर्माण और परस्पर सीखने का महत्वपूर्ण मंच बन सकता है.
अंतरराष्ट्रीय विद्वता और बौद्धिक संवाद की विरासत को आगे बढ़ाएगा केंद्र: प्रो. सचिन चतुर्वेदी
नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी ने सेंटर की स्थापना के पीछे की परिकल्पना को सामने रखा. उन्होंने कहा कि नालंदा की पहचान सदियों से अंतरराष्ट्रीय विद्वता, बौद्धिक संवाद और ज्ञान के आदान-प्रदान के केंद्र के रूप में रही है.
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इसी विरासत को आधुनिक संदर्भ में आगे बढ़ाते हुए सेंटर अनुसंधान, ज्ञान साझेदारी और संस्थागत जुड़ाव के माध्यम से शासन तथा विकास से जुड़ी समकालीन चुनौतियों के समाधान की दिशा में काम करेगा.
दक्षिण-दक्षिण सहयोग और संस्थागत क्षमता निर्माण पर विशेष बल
राउंडटेबल में दक्षिण-दक्षिण सहयोग, संस्थागत क्षमता निर्माण, जिम्मेदार नवाचार तथा स्थानीय अनुभवों पर आधारित विकास मॉडल की आवश्यकता पर विशेष बल दिया गया. प्रतिभागियों ने संयुक्त राष्ट्र और उसकी विभिन्न संस्थाओं के साथ सहयोग की संभावनाओं पर भी चर्चा की. विषयगत संवाद और दक्षिण-दक्षिण सहयोग के लिए विशेष मंच विकसित करने के रास्तों पर विचार किया गया.
इस अवसर पर विश्व बैंक समूह के वरिष्ठ सलाहकार हेमांग जानी, गेट्स फाउंडेशन के सीईओ डॉ. मार्क सुजमैन, इंडोनेशिया की पूर्व वित्त मंत्री मुल्यानी इंद्रावती, भारत में संयुक्त राष्ट्र के आवासीय समन्वयक स्टीफन प्रीस्नर, भारत में श्रीलंका की राजदूत महिशिनी कोलोंने, ययासन हसनाह के ट्रस्टी एवं प्रबंध निदेशक पुआन सिती कमरिया अहमद सुबकी, रॉकफेलर फाउंडेशन की वरिष्ठ उपाध्यक्ष एवं एशिया प्रमुख दीपाली खन्ना, अटल इनोवेशन मिशन के मिशन निदेशक दीपक बागला तथा डेलबर्ग एडवाइजर्स के एशिया-पैसिफिक क्षेत्रीय निदेशक जगजीत सरीन सहित कई वरिष्ठ प्रतिनिधि मौजूद रहे.
नालंदा विश्वविद्यालय और गेट्स फाउंडेशन के बीच हुआ एमओयू
राउंडटेबल की पृष्ठभूमि में नालंदा विश्वविद्यालय और गेट्स फाउंडेशन के बीच कौटिल्य ग्लोबल सेंटर फॉर स्टेट कैपेसिटी के माध्यम से शैक्षणिक सहयोग को बढ़ावा देने के लिए समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए. एमओयू का आदान-प्रदान केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह, सचिव-ईस्ट (विदेश मंत्रालय) रुद्रेंद्र टंडन सहित अन्य गणमान्य प्रतिनिधियों की मौजूदगी में हुआ.
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एमओयू पर नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी और गेट्स फाउंडेशन के सीईओ मार्क सुजमैन ने अपनी-अपनी संस्थाओं का प्रतिनिधित्व करते हुए हस्ताक्षर किए. इस दौरान दोनों संस्थानों के वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित रहे. यह साझेदारी अकादमिक जगत, सरकार और विभिन्न हितधारकों को एक साझा मंच पर लाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है.
इसके माध्यम से ग्लोबल साउथ के देशों के अनुभवों और व्यावहारिक ज्ञान का आदान-प्रदान करते हुए भारत सहित विकासशील देशों के लिए टिकाऊ, स्थानीय जरूरतों के अनुरूप और संदर्भ-आधारित समाधान विकसित करने का प्रयास किया जाएगा.
