बिहारशरीफ : पुलिस की अनुशंसा पर मुखिया पर हुई कार्रवाई हाईकोर्ट ने की रद्द, सरकार को 60 हजार रुपये देने का आदेश

पटना उच्च न्यायालय ने नालंदा प्रशासन द्वारा चोरसुआ पंचायत के मुखिया चंदन कुमार के खिलाफ बिहार अपराध नियंत्रण अधिनियम (सीसीए) के तहत की गई कार्रवाई को रद्द कर दिया है. हाईकोर्ट ने प्रशासनिक चूक मानते हुए राज्य सरकार को एक महीने के भीतर मुखिया को 60 हजार रुपये मुआवजा और मुकदमे का खर्च देने का निर्देश दिया है.

बिहारशरीफ के चोरसुआ पंचायत के मुखिया चंदन कुमार पर बिहार अपराध नियंत्रण अधिनियम (सीसीए) के तहत की गई कार्रवाई नालंदा प्रशासन को भारी पड़ गई है.

पटना उच्च न्यायालय ने जिलाधिकारी द्वारा पारित आदेश को रद्द करते हुए राज्य सरकार को मुखिया को 50 हजार रुपये मुआवजा और 10 हजार रुपये मुकदमे के खर्च के रूप में कुल 60 हजार रुपये एक माह के भीतर देने का निर्देश दिया है.

हाईकोर्ट की कड़ी नसीहत

न्यायालय ने प्रशासनिक अधिकारियों को कड़ी नसीहत देते हुए कहा कि जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक जैसे उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों को अपनी कठोर शक्तियों का इस्तेमाल करते समय कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पूरी तरह पालन करना चाहिए.

न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद और न्यायमूर्ति सुनील दत्ता मिश्रा की खंडपीठ ने 11 सितंबर 2026 को चंदन कुमार की आपराधिक रिट याचिका पर यह फैसला सुनाया.

मामला बिहार अपराध नियंत्रण अधिनियम वाद संख्या 212/2025 से जुड़ा है. चंदन कुमार ने बताया कि राजनीतिक द्वेष के कारण उनके विरोधियों द्वारा मामले दर्ज कराए गए थे.

तत्कालीन डीएम ने पुलिस अधीक्षक की अनुशंसा पर आदेश पारित कर उन्हें सप्ताह में तीन दिन सिलाव थाना में हाजिरी लगाने और गिरियक थाना क्षेत्र से बाहर जाने के लिए अनुमति लेने की पाबंदी लगाई थी, जिसे हाईकोर्ट ने निष्कासन जैसी स्थिति माना.

तीन दिन में जवाब मांगना अनुचित

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता प्रतीक कुमार सिन्हा ने पक्ष रखते हुए कहा कि सात अक्टूबर 2025 को नोटिस देकर 10 अक्टूबर को जवाब मांगा गया, जिससे बचाव की तैयारी का पर्याप्त अवसर नहीं मिला.

अधिवक्ता ने बताया कि चंदन कुमार पिछले दस वर्षों से लगातार पंचायत के मुखिया हैं और उनके खिलाफ पहले कोई मामला नहीं था तथा उन्हें कई प्रशस्ति पत्र भी मिल चुके हैं.

प्रशासनिक भरोसे पर संदेश

सुनवाई के दौरान 28 अगस्त से दो सितंबर 2025 के बीच पावापुरी थाना में दर्ज तीन सनहा को राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से जोड़ा गया.

फैसले में उच्च न्यायालय ने स्पष्ट संदेश दिया कि कठोर कानूनों के तहत अनिवार्य प्रक्रियाओं का बार-बार उल्लंघन आम जनता के प्रशासन पर विश्वास को कमजोर कर सकता है, इसलिए कानूनी मर्यादा बनाए रखना जरूरी है.

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By अमर वर्मा

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