नव नालंदा महाविहार में विश्व हिंदी दिवस पर चर्चा

नव नालंदा महाविहार सम विश्वविद्यालय, नालंदा में विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर विशेष अकादमिक कार्यक्रम का आयोजन बुधवार को किया गया.

By SANTOSH KUMAR SINGH | January 7, 2026 9:13 PM

राजगीर. नव नालंदा महाविहार सम विश्वविद्यालय, नालंदा में विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर विशेष अकादमिक कार्यक्रम का आयोजन बुधवार को किया गया. इसमें जापानी बौद्ध धर्म के दार्शनिक, सांस्कृतिक और जीवनगत पक्षों पर गंभीर चर्चा हुई. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि टोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ फॉरेन स्टडीज़, जापान के सुप्रसिद्ध विद्वान प्रो. हीरोयुकी सातो द्वारा “जापानी बौद्ध धर्म” विषय पर विचारोत्तेजक व्याख्यान दिया गया. प्रो. सातो ने कहा कि जापानी बौद्ध धर्म किसी एक धार्मिक अनुशासन तक सीमित नहीं है, बल्कि वह जीवन को देखने और जीने की एक सूक्ष्म पद्धति है. उन्होंने बताया कि बौद्ध धर्म भारत से चीन और कोरिया होते हुए जापान पहुँचा. वहाँ की सांस्कृतिक चेतना से समन्वित होकर ज़ेन, शुद्धभूमि और निचिरेन जैसे संप्रदायों के रूप में विकसित हुआ. उन्होंने ज़ेन परंपरा में मौन, ध्यान, अनुशासन और क्षण-बोध के महत्त्व को रेखांकित करते हुए कहा कि जापानी समाज में बौद्ध धर्म दर्शन से अधिक अभ्यास और जीवन-शैली में व्यक्त होता है. जापानी कला, चाय-समारोह, उद्यान-रचना और कविता पर बौद्ध धर्म का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है. नव नालंदा महाविहार के कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कहा कि विश्व हिंदी दिवस जैसे अवसरों पर भारतीय बौद्ध परंपरा के अंतरराष्ट्रीय प्रभाव को समझना विशेष रूप से प्रासंगिक है. उन्होंने कहा कि जापानी बौद्ध धर्म यह दर्शाता है कि भारतीय दार्शनिक परंपराएँ किस प्रकार विश्व-संस्कृति में रचनात्मक रूप से आत्मसात हुई हैं. उन्होंने जापानी बौद्ध धर्म की बारीक विशेषताओं को समकाल में सहज भाषा में समझाया. उन्होंने हिंदी को वैश्विक संवाद की सशक्त भाषा के रूप में विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया. बीज व्याख्यान में प्रो. रवींद्र नाथ श्रीवास्तव ‘परिचय दास’ ने कहा कि जापानी बौद्ध धर्म भारतीय बौद्ध दर्शन का केवल विस्तार नहीं, बल्कि उसका एक स्वतंत्र और सृजनात्मक सांस्कृतिक पाठ है. उन्होंने ज़ेन बौद्ध धर्म के सौंदर्यबोध, ‘वाबी-साबी’ की अवधारणा और हाइकु कविता में निहित बौद्ध चेतना को रेखांकित करते हुए इसे आधुनिक जीवन के लिए अत्यंत प्रासंगिक बताया. पालि एवं अन्य भाषाओं के संकायाध्यक्ष प्रो. विश्वजीत कुमार ने स्वागत करते हुए कहा कि बौद्ध धर्म की पालि परंपरा और उसकी एशियाई यात्राएँ सांस्कृतिक संवाद की महत्त्वपूर्ण मिसाल हैं. ऐसे आयोजन विश्वविद्यालय की अकादमिक और बहुभाषिक पहचान को सुदृढ़ करते हैं. प्रो हरे कृष्ण तिवारी ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहा कि इस प्रकार के अकादमिक आयोजनों से विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय बौद्ध अध्ययन, भाषाई संवाद और शोधपरक विमर्श को नई दिशा और ऊर्जा मिलती है. कार्यक्रम का संचालन शुभजित चटर्जी ने किया. मौके पर भोजपुरी चित्रकार वंदना श्रीवास्तव की पुस्तक भोजपुरी कला के बहाने का लोकार्पण जापानी प्रो. हीरोयुकी सातो, कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह, प्रो. विश्वजीत कुमार, प्रो. हरे कृष्ण तिवारी और प्रो. रवींद्र नाथ श्रीवास्तव ” परिचय दास ” ने किया. कार्यक्रम में महाविहार के आचार्य, शोध छात्र, गैर शैक्षणिक स्टाफ, अन्य छात्र बड़ी संख्या में उपस्थित थे.

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