बिहारशरीफ. जिले में जमीन की खरीद-बिक्री को पारदर्शी बनाने के लिए सरकार भले ही नई-नई तकनीकों और नियमों को लागू कर रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है. भू-माफियाओं के आगे रैयत खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं. हालात ऐसे हो गए हैं कि डर के कारण लोग अपनी जमीन पर यह जमीन बिक्री के लिए नहीं है या नॉट फॉर सेल का बोर्ड लगाने को मजबूर हैं, फिर भी उनकी जमीन पूरी तरह सुरक्षित नहीं मानी जा सकती. वर्षों से भू-माफिया फर्जी कागजात के सहारे जमीन बेचने या उस पर अवैध दावा ठोकने का खेल खेलते आ रहे हैं. इसका खामियाजा असली मालिकों को भुगतना पड़ता है, जिन्हें अपनी ही जमीन साबित करने के लिए वर्षों तक कोर्ट और सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं. स्थिति यह हो गई है कि कई रैयत जमीन की घेराबंदी कराने के बाद भी एहतियातन नॉट फॉर सेल का बोर्ड टांग रहे हैं. बीते दो दशकों में जिले में जमीन की कीमतों में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है. बिहारशरीफ से राजगीर तक के प्रमुख मार्गों और आसपास के इलाकों में जमीन के दाम तेजी से बढ़े हैं. यही वजह है कि देश-विदेश में नौकरी और व्यवसाय करने वाले लोग यहां जमीन में निवेश कर रहे हैं. राजगीर, नालंदा और बिहारशरीफ क्षेत्र में जमीन खरीदने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जबकि बेचने वाले कम हैं। इस असंतुलन का सबसे ज्यादा फायदा भू-माफिया उठा रहे हैं. सरकार की किसी नई योजना या बड़े प्रोजेक्ट की घोषणा होते ही भू-माफिया उस इलाके की मुख्य सड़कों और चौक-चौराहों से सटी जमीनों पर नजर गड़ा लेते हैं. किसानों से औने-पौने दाम पर जमीन खरीदने का दबाव बनाया जाता है. जो रैयत इनकार करते हैं, उनकी जमीन के फर्जी दस्तावेज तैयार कर बिक्री कर दी जाती है या अवैध दावा कर दिया जाता है. डर और दबाव में कई किसान मजबूरी में अपनी जमीन बेच देते हैं. विकास योजनाओं के साथ बढ़ी माफियागिरी:-
जागरूकता बनाम हकीकत:-
जिला प्रशासन की ओर से चौक-चौराहों पर बैनर-पोस्टर लगाकर लोगों को भू-माफियाओं से सावधान रहने और फर्जी कागजात पर जमीन न खरीदने की अपील की जा रही है. लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि अंचल कार्यालयों में सही और समय पर जानकारी नहीं मिल पाती. कई बाबू और अधिकारी जमीन से जुड़ी सूचनाएं देने में रुचि नहीं दिखाते. इसी का फायदा दलाल उठाते हैं और आम लोग अंचल व निबंधन कार्यालयों के चक्कर में पड़कर ठगी का शिकार हो जाते हैं. भू-माफियाओं के डर से रैयत आज नॉट फॉर सेल का सहारा ले रहे हैं, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या सिर्फ एक बोर्ड उनकी जमीन को सुरक्षित कर पाएगा. जरूरत है सख्त निगरानी, त्वरित कार्रवाई और जमीन से जुड़े रिकॉर्ड को सचमुच पारदर्शी बनाने की, ताकि रैयत खुद को सुरक्षित महसूस कर सकें.
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