Bihar Politics: बिहार विधानसभा के मानसून सत्र का शुक्रवार एक अजीबो-गरीब राजनीतिक घटनाक्रम का गवाह बना, जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की थी. आमतौर पर सरकार को घेरने का सबसे बड़ा हथियार कटौती प्रस्ताव मुख्य विपक्षी दल द्वारा लाया जाता है, लेकिन इस बार सीन बिल्कुल उल्टा था.
गृह विभाग के बजट पर राजद के बजाय सदन में मात्र एक सीट वाली बसपा के विधायक सतीश कुमार यादव ने कटौती प्रस्ताव पेश किया. इस वाकये ने सत्ता पक्ष को राजद पर हमला करने का सुनहरा मौका दे दिया, जिसके बाद सदन में घंटों तक सियासी तकरार और दावों-प्रतिदावों का दौर चलता रहा.
क्या होता है कटौती प्रस्ताव?
‘कटौती प्रस्ताव’ लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के सदस्यों को दी गई एक शक्ति या साधन है, जिसके द्वारा वे सरकार द्वारा पेश किए गए वित्त विधेयक (या बजट मांग) में किसी भी मांग का विरोध या असहमति व्यक्त कर सकते हैं और आवंटित धनराशि को कम करने का प्रयास कर सकते हैं.
यह अविश्वास प्रस्ताव या सदन परीक्षण के समान है और विधेयक पारित होने से पहले इस पर मतदान होता है. यदि यह प्रस्ताव स्वीकार हो जाता है, तो इसका अर्थ है कि सरकार ने सदन में बहुमत खो दिया है.
पहली बार विपक्षी दल ने कटौती प्रस्ताव पेश नहीं किया
संसदीय कार्य मंत्री विजय कुमार चौधरी ने इस मौके पर राजद को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि संसदीय इतिहास में यह पहली बार है जब मुख्य विपक्षी दल ने कटौती प्रस्ताव ही पेश नहीं किया. उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि शायद तेजस्वी यादव और उनकी पार्टी सरकार के कामकाज और गृह विभाग की उपलब्धियों से पूरी तरह संतुष्ट हैं, इसीलिए उन्होंने चुप रहना बेहतर समझा. उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि विपक्ष के नेता सदन के बाहर सरकार की आलोचना करते हैं, लेकिन सदन के भीतर सरकार को कठघरे में खड़ा करने से बचते दिखे.
गृह मंत्री सम्राट चौधरी ने भी इसे राजद का ‘शर्मनाक कारनामा’ करार दिया. सत्ता पक्ष का तर्क था कि जो नेता सदन के बाहर अपराध को लेकर शोर मचाते हैं, वे सदन के भीतर बहस से भाग खड़े हुए.
हम महागठबंधन में नहीं हैं
सदन के भीतर उस वक्त स्थिति और भी दिलचस्प हो गई जब राजद विधायक कुमार सर्वजीत ने बचाव करते हुए बसपा को अपने गठबंधन का हिस्सा बता दिया. उन्होंने दावा किया कि विपक्षी दलों ने मिलकर यह तय किया था कि बसपा सदस्य ही प्रस्ताव पेश करेंगे.
बसपा विधायक सतीश कुमार यादव ने तुरंत इस दावे की हवा निकाल दी. उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि उनकी पार्टी न तो महागठबंधन में है और न ही एनडीए में. वे अकेले चुनाव लड़े और अकेले ही सदन में अपनी बात रख रहे हैं.
यह घटना बिहार की विपक्षी राजनीति में समन्वय की कमी को दिखाती है. वहीं सत्ता पक्ष इसे विपक्ष की कमजोरी के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है. आने वाले समय में राज्यसभा चुनाव और विधानसभा की आगामी रणनीतियों को देखते हुए सदन का यह घटनाक्रम राजनीतिक रूप से अहम संकेत हो सकती है.
