Bihar News: बिहारशरीफ के पास पंचाने नदी के तट पर बसा ‘मघड़ा’ आज दो वजहों से चर्चा में है. एक तरफ इसकी सदियों पुरानी पौराणिक मान्यता और गौरवशाली इतिहास है, तो दूसरी तरफ हाल ही में मां शीतला मंदिर में हुई भगदड़, जिसने 8 श्रद्धालुओं की जान ले ली.
मां शीतला मंदिर अपनी धार्मिक महत्ता के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है, लेकिन ताजा हादसे ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर क्यों लोगों में इस मंदिर के प्रति इतनी आस्था है? श्रद्धालुओं के आस्था का यह मंदिर इतना छोटा क्यों है?
सती के कंगन और ह्वेनसांग की यादों से जुड़ा है इतिहास
मघड़ा की महिमा केवल लोक कथाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार भगवान शिव और माता सती के पौराणिक काल से जुड़े हैं. मान्यता है कि जब महादेव सती के पार्थिव शरीर को लेकर ब्रह्मांड में भ्रमण कर रहे थे, तब यहां माता के शरीर का एक हिस्सा और उनका ‘कंगन’ गिरा था. ‘कंगन’ गिरने की वजह से ही इस जगह का नाम ‘मघड़ा’ पड़ा.
बाद में राजा वृषकेतु को स्वप्न आया और खुदाई के दौरान यहां मां की अलौकिक प्रतिमा मिली, जिसे आज सिद्धपीठ के रूप में पूजा जाता है.
इतिहास के पन्ने बताते हैं कि जब प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग नालंदा विश्वविद्यालय में पढ़ रहे थे, तब वे भी सुकून की तलाश में इसी मंदिर के नीम और पीपल के पेड़ों की छांव में विश्राम किया करते थे, यहां का ‘मिट्टी कुआं’ (मीठा कुआं) आज भी भक्तों के लिए परम पवित्र माना जाता है. यही कारण है कि चैत्र माह के मंगलवार को उत्तर प्रदेश, दिल्ली और बंगाल जैसे राज्यों से हजारों भक्त यहां मत्था टेकने खिंचे चले आते हैं.
छोटा परिसर और हजारों की भीड़
अब सवाल उठता है कि इतने ऊंचे धार्मिक महत्व वाले मंदिर का परिसर आखिर इतना छोटा क्यों है कि वहां हजारों की भीड़ अनियंत्रित हो जाती है? स्थानीय लोगों का दावा है कि मंदिर का गर्भ गृह और परिसर काफी संकीर्ण है, जहां एक बार में केवल सीमित संख्या में ही लोग पूजा कर सकते हैं.
इसके बावजूद, बिना किसी भीड़ प्रबंधन के हजारों लोगों को एक साथ भीतर जाने की अनुमति दे दी गई, जिससे सांसें अटक गईं और भगदड़ मच गई.
प्रशासनिक अनदेखी की पुरानी कहानी
यह कोई पहली बार नहीं था जब मघड़ा में भीड़ बेकाबू हुई हो. इससे पहले शीतलाष्टमी मेले के दौरान भी महिलाएं बेहोश हुई थीं और बड़े पैमाने पर मोबाइल व चेन छिनतई की घटनाएं हुई थीं. स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रशासन ने इन छोटी घटनाओं से कोई सबक नहीं लिया.
भीड़ को नियंत्रित करने के बजाय उसे और बढ़ने दिया गया. आज मंदिर की बदइंतजामी और प्रशासनिक ढिलाई की पोल आठ मासूम जिंदगियों की मौत के साथ खुल गई है. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि सीमित क्षमता वाले इस मंदिर परिसर में हजारों श्रद्धालु एक साथ कैसे पहुंच गए?
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