Bihar Assistant Professor Recruitment: बिहार राज्य के विश्वविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति के लिए जारी ‘ड्राफ्ट स्टैच्यूट फॉर अपॉइंटमेंट ऑफ असिस्टेंट प्रोफेसर 2025’ को लेकर बहस तेज हो गई है.
राजभवन ने इस ड्राफ्ट पर विश्वविद्यालयों से 10 दिनों के भीतर सुझाव मांगे हैं, लेकिन इससे पहले ही छात्र संगठनों और अभ्यर्थियों ने कई गंभीर आपत्तियां उठानी शुरू कर दी हैं.
नए नियमों पर छात्रों का बढ़ता विरोध
विभिन्न छात्र संगठनों ने कई कमियां बताई हैं. छात्रों का कहना है कि प्रस्तावित नियमावली में कई ऐसे प्रावधान हैं जो एकेडमिक व्यवस्था के लिए नुकसानदेह साबित हो सकते हैं.
उनका आरोप है कि भर्ती प्रक्रिया को केवल परीक्षा तक सीमित कर दिया गया है, जबकि शोध और शिक्षण उपलब्धियों को नजरअंदाज किया गया है.
डिग्री और रिसर्च की वैल्यू हुई ‘जीरो’?
हैरानी की बात यह है कि नई नियमावली में लिखित परीक्षा पर सारा जोर दिया गया है, लेकिन वर्षों की मेहनत से हासिल की गई पीएचडी डिग्री, शोध पत्रों के प्रकाशन और शिक्षण अनुभव के अंकों को पूरी तरह साइडलाइन कर दिया गया है.
छात्रों का तर्क है कि असिस्टेंट प्रोफेसर जैसे गरिमामय पद के लिए केवल लिखित परीक्षा पर्याप्त नहीं हो सकती. रिसर्च और एकेडमिक उपलब्धियों को वेटेज न मिलने से विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक गुणवत्ता गिरने का डर है.
45 साल की उम्र सीमा पर उठे सवाल
ड्राफ्ट में असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्ति के लिए अधिकतम आयु सीमा 45 वर्ष निर्धारित की गई है, जबकि वर्तमान में चल रही नियुक्ति प्रक्रिया में यह सीमा 55 वर्ष तक है.
छात्र नेताओं का कहना है कि स्नातक, स्नातकोत्तर और पीएचडी जैसी उच्च शिक्षा प्राप्त करने में ही कई वर्षों का समय लग जाता है. ऐसे में 45 वर्ष की आयु सीमा तय करना अव्यावहारिक और शिक्षा विरोधी कदम माना जा रहा है.
गेस्ट फैकल्टी और शिक्षकों के अनुभव की अनदेखी
राज्य के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में लंबे समय से कार्यरत गेस्ट फैकल्टी, कॉन्ट्रैक्ट शिक्षकों और रिसर्चरों के अनुभव को भी ड्राफ्ट में कोई प्राथमिकता नहीं दी गई है. छात्र संगठनों का कहना है कि वर्षों से शिक्षा क्षेत्र में योगदान देने वाले शिक्षकों के अनुभव को नजरअंदाज करना उचित नहीं है.
चयन प्रक्रिया के केंद्रीकरण पर भी आपत्ति
ड्राफ्ट के अनुसार लिखित परीक्षा, प्रश्नपत्र निर्माण, सिलेबस निर्धारण और मूल्यांकन की पूरी प्रक्रिया आयोग के नियंत्रण में होगी. छात्र संगठनों का कहना है कि इससे चयन प्रक्रिया का अत्यधिक केंद्रीकरण हो जाएगा, जो पारदर्शिता और निष्पक्षता के सिद्धांतों पर सवाल खड़े कर सकता है.
फिलहाल राजभवन ने विश्वविद्यालयों से सुझाव मांगे हैं. ऐसे में आने वाले दिनों में इस ड्राफ्ट पर व्यापक चर्चा और संशोधन की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.
