जब हाईलेवल घाट से भागलपुर आने में लगे थे 13 घंटे, आज भी नीरज को याद है 10 सितंबर 1998 का दिन

Bhagalpur News : आज की तेज रफ्तार जिंदगी में कुछ घंटे की देरी भी लोगों को परेशान कर देती है. लेकिन 10 सितंबर 1998 का वह दिन नवगछिया के नीरज कुमार कभी नहीं भूल पाएंगे, जब हाईलेवल घाट से भागलपुर पहुंचने में उन्हें पूरे 13 घंटे लग गये थे.

भागलपुर से ऋषव मिश्रा कृष्णा की रिपोर्ट : नवगछिया के नीरज कुमार (46) वर्ष 1998 में 21 साल के थे. वे भागलपुर के मारवाड़ी कॉलेज में स्नातक अंतिम वर्ष के छात्र थे. मानसून का समय था. 10 सितंबर 1998 की सुबह वे भागलपुर जाने के लिए घर से निकले थे. आज भी उस दिन की पूरी घटना उनके जेहन में ताजा है.

सुबह 6.30 बजे हाईलेवल घाट से खुले थे

नीरज बताते हैं कि सुबह करीब 6.30 बजे वे हाईलेवल घाट पहुंचे थे. लंच (स्टीमर) घाट पर लग चुका था और यात्री तेजी से सवार हो रहे थे. उनके अनुसार स्टीमर पर 300 से अधिक यात्री रहे होंगे. चार-पांच मोटरसाइकिल, 50 से 60 साइकिल और एक कार भी लोड थी. स्टीमर पर आइसक्रीम, भूंजा, खीरा और मूंगफली बेचने वाले दुकानदार भी मौजूद थे. मानसून के कारण गंगा नदी उफान पर थी और तटों की दूरी काफी लंबी हो चुकी थी. यात्रियों को उम्मीद थी कि दो से तीन घंटे में बरारी घाट पहुंच जाएंगे.

एक घंटे बाद बंद हो गया स्टीमर का इंजन

स्टीमर खुलने के करीब एक घंटे बाद अचानक इंजन बंद हो गया. गंगा की तेज धारा के बीच स्टीमर लगभग ठहर-सा गया. चालक दल के लोगों ने यात्रियों को भरोसा दिलाया कि इंजन जल्द ठीक कर लिया जाएगा. शुरुआत में लोगों को लगा कि थोड़ी देर बाद यात्रा फिर शुरू हो जाएगी, लेकिन समय बीतता गया और दोपहर हो गयी. स्टीमर पर मौजूद झालमूढ़ी, आइसक्रीम और अन्य सामान बेचने वालों का सामान भी खत्म होने लगा. उस समय मोबाइल फोन या सूचना देने की कोई सुविधा नहीं थी. नदी में दूर-दूर तक मदद पहुंचाने वाला भी कोई नजर नहीं आ रहा था.

इंजन चालू हुआ तो लगे जयकारे, फिर बढ़ गया डर

दोपहर बाद करीब तीन से चार बजे के बीच अचानक इंजन स्टार्ट हुआ. यात्रियों ने गंगा मैया के जयकारे लगाए और राहत की सांस ली. लेकिन यह राहत ज्यादा देर तक नहीं रही. करीब दस मिनट बाद इंजन फिर बंद हो गया. हालांकि चालक दल ने सूझबूझ दिखाते हुए इतने समय में स्टीमर को नदी के मुख्य प्रवाह तक पहुंचा दिया था. इंजन बंद रहने के बावजूद स्टीमर धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था. यात्रियों के बीच डर और दहशत का माहौल था. कोई सुरक्षित किनारे तक पहुंचने के लिए मनौती मांग रहा था. कुछ यात्री गंगा मैया से प्रार्थना कर रहे थे तो कुछ ने काली मैया को भैंसे की बलि देने तक की मनौती मान ली थी.

अंधेरे में हुआ चमत्कार, किनारे पहुंची जिंदगी

शाम होते-होते अंधेरा घिरने लगा. चालक दल ने बताया कि स्टीमर किनारे तक पहुंच जाएगा, लेकिन वह बरारी घाट नहीं होगा. पूरी तरह अंधेरा हो चुका था. स्टीमर किनारे से करीब 200 मीटर दूर चल रहा था. यात्रियों को यह भी पता नहीं चल पा रहा था कि वे किस इलाके से गुजर रहे हैं. इसी बीच अचानक स्टीमर का इंजन फिर चालू हो गया. मल्लाह ने तुरंत स्टीमर को किनारे की ओर मोड़ दिया. पांच से दस मिनट के भीतर स्टीमर किनारे के पास पहुंच गया. हालांकि चिह्नित घाट नहीं होने के कारण स्टीमर ठीक से नहीं लग सका. कई यात्री छलांग लगाकर किनारे पहुंचे. कुछ लोगों के उतरने के बाद स्थानीय लोग मौके पर पहुंचे और स्टीमर को सुरक्षित तरीके से घाट तक लगाया गया. इसके बाद महिलाओं, बच्चों, जानवरों और वाहनों को उतारा गया.

“उस यात्रा को कभी नहीं भूल पाऊंगा”

नीरज कुमार कहते हैं कि वह सफर उनकी जिंदगी की सबसे डरावनी यात्राओं में से एक था. सुबह शुरू हुई यात्रा रात में खत्म हुई और भागलपुर पहुंचने में करीब 13 घंटे लग गए. आज नीरज कुमार नवगछिया के रामधारी सिंह इंटर स्तरीय उच्च विद्यालय में संस्कृत विषय के शिक्षक हैं, लेकिन 10 सितंबर 1998 की वह घटना आज भी उन्हें पूरी तरह याद है.

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लेखक के बारे में

Author: AMIT KUMAR SINH

Published by: Pratyush Prashant

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