जेएलएनएमसीएच की आपातकालीन व्यवस्था पर बड़ा सवाल, संवेदनहीन रहे वार्ड के चिकित्सक व नर्ससंजीव झा, भागलपुर
भागलपुर के जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज अस्पताल (जेएलएनएमसीएच) की आपातकालीन सेवाओं की अमानवीय तस्वीर एक बार फिर सामने आई है, जहां मौत के बाद भी एक बुजुर्ग को “मरीज” की तरह ट्रीट किया जाता रहा. मेडिसीन के आपातकालीन वार्ड में स्थित डेंगू वार्ड के बेड नंबर–चार पर 31 जनवरी की शाम करीब आठ बजे हृदयाघात से मृत 80 वर्षीय बुजुर्ग का शव करीब आठ घंटे से भी अधिक समय तक उसी बेड पर पड़ा रहा, जबकि उसी हॉलनुमा कमरे में चार अन्य मरीज भर्ती थे. हैरानी की बात यह रही कि मृत बुजुर्ग को इस दौरान ऑक्सीजन भी दी जाती रही, मानो सिस्टम को मौत की भी खबर ही नहीं हो. यदि उस कमरे में लगे सीसीटीवी कैमरे का फुटेज को खंगाला जाये, तो पूरी घटना स्पष्ट होने की उम्मीद है. रविवार को डेंगू वार्ड मरीजों से खाली करा दिया गया. वहीं जिलाधिकारी डॉ नवल किशोर चौधरी ने मामले का संज्ञान लिया है. मामले का स्थायी निदान होने की पूरी उम्मीद है.मरीज, परिजन और डर का माहौल
मृतक पीरपैंती प्रखंड के निवासी थे. जिस वार्ड में शव रखा रहा, वहां दो महिला और दो पुरुष मरीज भर्ती थे. उनके साथ मौजूद अधिकांश तीमारदार महिलाएं थीं. शव के घंटों तक बेड पर पड़े रहने से मरीजों और परिजनों में भय, घबराहट और असहजता का माहौल बना रहा. कोई डर के मारे चुप था, तो कोई बुदबुदाते हुए अस्पताल व्यवस्था को कोस रहा था.
एंबुलेंस बनी मजबूरी की दीवार
मृतक के बेटों को आसपास के लोग बार-बार शव घर ले जाने की सलाह देते रहे, लेकिन परिजनों की मजबूरी साफ झलक रही थी. उनका कहना था कि प्राइवेट एंबुलेंस चालक मनमाने पैसे मांग रहे हैं, जबकि सरकारी एंबुलेंस पर बार-बार कॉल करने के बावजूद संपर्क नहीं हो पा रहा. मजबूरन उन्होंने सुबह तक इंतजार करने का फैसला किया.शिकायत पर भी नहीं लिया गया संज्ञान
जब एक परिजन से यह स्थिति और बर्दाश्त नहीं हुई, तो उन्होंने वार्ड नर्स से मौखिक शिकायत की, लेकिन उनकी बात अनसुनी कर दी गयी. इसके बाद तैनात डॉक्टर से शव को दूसरी जगह शिफ्ट करने का मौखिक अनुरोध किया गया. डॉक्टर का जवाब और भी चौंकाने वाला था— “यहां ऐसे ही होता है। हमारे पास कोई कमरा नहीं है. क्या करें, बाहर फेंकवा दें?” यह जवाब न सिर्फ मानवीय संवेदनाओं को झकझोरता है, बल्कि अस्पताल की कार्यसंस्कृति पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है.
अधिकारियों से की गयी शिकायत
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए इस पूरे मामले का वीडियो, तस्वीर और लिखित शिकायत जेएलएनएमसीएच अधीक्षक को सुबह 4.16 बजे, जबकि जिलाधिकारी और प्रमंडलीय आयुक्त को सुबह 4.20 बजे व्हाट्स एप के माध्यम से भेजी गयी. मरीजों के परिजनों का कहना था कि ऐसी स्थिति रोज झेलनी पड़ती है, लेकिन अब पहली बार मामला सीधे अधिकारियों तक पहुंचा है.मोर्चरी पास में, फिर भी उपयोग नहीं
चौंकाने वाली बात यह रही कि जिस आपातकालीन वार्ड में शव घंटों पड़ा रहा, उसके ठीक बगल में मोर्चरी हाउस है. इसके बावजूद उसका उपयोग नहीं किया गया. जब इस पर सवाल उठे, तो कुछ लोगों ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि मोर्चरी हाउस “सिर्फ सरकारी पैसे बर्बाद करने के लिए बना है. यह टिप्पणी अस्पताल की प्रबंधकीय लापरवाही को और उजागर करती है.
दिखावा बनकर रह गया शिकायत बोर्ड?
परिजनों का कहना है कि अगर इस मामले का स्थायी समाधान नहीं हुआ, तो यह मान लिया जाएगा कि आपातकालीन वार्ड के मुख्य द्वार पर लगा. शिकायत दर्ज कराने की अपील” वाला बोर्ड केवल दिखावा है, जिसका जमीनी हकीकत से कोई लेना-देना नहीं.अंत में आयी एंबुलेंस
मौत के लगभग आठ घंटे बाद सुबह 4.45 बजे एंबुलेंस अस्पताल पहुंची और 4.55 बजे शव को लेकर गंतव्य की ओर रवाना हुई, लेकिन तब तक जेएलएनएमसीएच की आपातकालीन व्यवस्था एक बार फिर सवालों के कठघरे में खड़ी हो चुकी थी.
सवाल-जवाब
हॉस्पिटल मैनेजर सुनील गुप्ता व अधीक्षक डॉ एचपी दुबे से सीधी बातचीतप्रभात सवाल : लंबे समय तक लाश को रखने के लिए मॉर्चरी की व्यवस्था क्या है.
हॉस्पिटल मैनेजर : मॉचरी में चार बेड की सुविधा है, लेकिन लावारिश व पोस्टमॉर्टम वाले शवों को रखा जाता है.प्रभात सवाल : क्या इलाज करा रहे मरीज के बीच आठ घंटे तक लाश को रखा जा सकता है.
हॉस्पिटल मैनेजर : ऐसा नहीं होना चाहिए. ऐसी बात हुई है, तो जांच का विषय है. इतनी देर हुई है, तो व्यवस्था होनी चाहिए.प्रभात सवाल : क्या लाश को ऑक्सीजन दिया जाना चाहिए.
अस्पताल अधीक्षक : ऑक्सीजन का मास्क छोड़ दिया गया होगा. दरअसल सिस्टर लाश के समीप से मास्क हटाने से हिचकती है कि उसको सेनेटाइज कैसे किया जायेगा.प्रभात सवाल : लाश को रखने के लिए क्या-क्या व्यवस्था है.
अस्पताल अधीक्षक : मॉर्चरी का मकान टूट गया है. बीएमएस आइसीएल को मकान बनवाना है. बार-बार कहकर लाचार हो गये.—-
