तेतरी गांव स्थित शक्तिपीठ देवी दुर्गा मंदिर का इतिहास 425 वर्ष पुराना है. मेला समिति के अध्यक्ष रामाकांत राय ने बताया कि 1600 ई. में मंदिर की स्थापना की गयी थी. वर्षों पहले तेतरी गांव के लोगों को स्वप्न आया था कि कलबलिया धार में एक मेढ़ बह कर आया है, जिस पर दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना करें. गांव वालों ने कलबलिया धार में जाकर देखा तो वहां एक मेढ़ पड़ा था. पांच-छह लोग मेढ़ उठाकर तेतरी लाने लगे. इस बीच मंदिर वाले स्थान पर मेढ़ को रख कर ग्रामीण विश्राम करने लगे, तभी खरीक के काजीकौरेया गांव के कुछ लोग मेढ़ खोजते आ गये. वह लोग मेढ़ वापस ले जाना चाहते थे. इस पर तेतरी गांव के लोग सहर्ष तैयार हो गये. काजीकौरेया के लोग मेढ़ वापस ले जाने के लिए उठाने लगे, तो मेढ़ तनिक भी नहीं हिला. अंतत: वह लोग वापस अपने गांव चले गये. इसके बाद तेतरी के ग्रामीणों ने मेढ़ को उठा कर दूसरे जगह ले जाने का प्रयास किये, लेकिन सफल नहीं हो सके. इसके बाद उसी जगह पर दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया. मंदिर में देवी दुर्गा की भव्य प्रतिमा विराजमान है, जिनकी पूजा-अर्चना के लिए सालों भर लोगों की भीड़ जुटी रहती है. दुर्गापूजा में उस प्रतिमा के आगे मां दुर्गा की अलग से एक प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है. दशमी को प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है.
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