ऋषव मिश्रा कृष्णा, भागलपुरहर सुबह विक्रमशिला सेतु पर एक खामोश जंग शुरू होती है. एक ओर गाड़ियों की रफ्तार, दूसरी ओर रेलिंग से बंधी रस्सी के सहारे 40 फीट नीचे उतरते और चढ़ते लोग. जरा सी चूक और सीधी कच्ची जमीन पर गिरने का खतरा. यह दृश्य अब यहां की रोजमर्रा की सच्चाई बन चुका है. दियारी क्षेत्र के एक दर्जन से अधिक गांवों के किसान खेतों तक पहुंचने के लिए यही रास्ता अपनाते हैं. पुल की रेलिंग में मोटी रस्सी बांधी जाती है, गांठों को पकड़कर धीरे-धीरे नीचे उतरते हैं. कोई कंधे पर औजार लिए होता है, तो कोई दूध के खाली डिब्बे. लौटते समय इन्हीं डिब्बों को दूध से भरकर रस्सी के सहारे ऊपर खींचा जाता है. ऊपर खड़े लोग डोरी थामते हैं और नीचे किसान संतुलन बनाता है.
नाव से जाने का है विकल्प, लेकिन रोजाना भाड़ा देना संभव नहीं
नाव से जाने का विकल्प है, लेकिन रोजाना किराया देना संभव नहीं है. मजबूरी में जान जोखिम में डालना ही रास्ता बचता है. इसी जोखिम ने इस्माइलपुर के किसान रंजीत यादव की जान ले ली. रस्सी से उतरते समय संतुलन बिगड़ा और वे नीचे गिर पड़े. अस्पताल में उन्हें मृत घोषित कर दिया गया. मंगलवार को हुए हादसे के बाद भी हालात नहीं बदले. किसान आज भी उसी रस्सी के सहारे उतर रहे हैं. उनकी मांग है कि स्थायी सीढ़ी या सुरक्षित मार्ग बनाया जाए, ताकि रोजी-रोटी के लिए मौत से मुकाबला न करना पड़े.
चढ़ने-उतरने वालों ने कहा, रंजीत नया था, इसलिए फिसल कर गिर गया
बुधवार को पुल पर चढ़ने और उतरने वाले लोगों ने कहा कि रंजीत यादव नया था, इसलिए उनका हाथ फिसल गया और वे गिर गये. घटना से वे लोग आहत हैं. वे लोग कई वर्षों से पुल पर इसी तरह चढ़ते उतरते हैं, आज तक किसी तरह का हादसा नहीं हुआ. ज्यादा वृद्ध, भारी भरकम, मोटे और कमजोर लोगों को वे लोग नीचे उतरने की सलाह नहीं देते हैं, जो लोग अभ्यस्त हैं, बस वही लोग ऐसा करते हैं.
