बीएयू सबौर मे लगभग 67 एकड़ धान की फसल पूरी तरह जलमग्न हो गयी

गंगा का पानी बीएयू के खेतों में घुसा, 67 एकड़ धान की फसल जलमग्न, 47.85 एकड़ में ब्रीडर बीज उत्पादन प्रभावित

बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर (BAU Sabour) के विशाल कृषि प्रक्षेत्र में गंगा और कतरिया नदियों के बढ़ते जलस्तर ने दस्तक दे दी है. करीब 67 एकड़ में लगी धान की फसल, जिसमें महत्वपूर्ण ब्रीडर बीज उत्पादन का क्षेत्र भी शामिल है, पूरी तरह जलमग्न हो गई है.

BAU Sabour Flood: सबौर, भागलपुर. गंगा के बढ़ते जलस्तर का असर अब बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर के कृषि प्रक्षेत्र पर भी साफ दिखाई देने लगा है. गंगा नदी और कतरिया नदी के बढ़ते जलस्तर के कारण बिहार कृषि महाविद्यालय सबौर फॉर्म में करीब 67 एकड़ में रोपी गयी धान की फसल पूरी तरह जलमग्न हो गयी है. यह सिर्फ सामान्य धान की फसल का नुकसान नहीं है, बल्कि इसमें बड़ी मात्रा में ब्रीडर बीज उत्पादन का प्रक्षेत्र भी शामिल है.

कुल 67 एकड़ प्रभावित क्षेत्र में करीब 47.85 एकड़ में ब्रीडर बीज उत्पादन के उद्देश्य से धान की फसल उगायी गयी थी. पानी में फसल के डूबने से विश्वविद्यालय का महत्वपूर्ण बीज उत्पादन कार्यक्रम गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है. इसके अलावा करीब 10 एकड़ क्षेत्रफल में फैला विश्वविद्यालय का मॉडल भिट्ठी फॉर्म भी बाढ़ के पानी में डूब गया है.

गंगा और कतरिया का जलस्तर बढ़ा तो खेत डूब गये

बीएयू सबौर फॉर्म के जिन हिस्सों में पानी पहुंचा है, उनमें राइस एरिया के अलावा एल ब्लॉक, एम ब्लॉक, एन ब्लॉक और जे ब्लॉक शामिल हैं. इन प्रक्षेत्रों में धान की 17 अलग-अलग किस्मों का रोपण किया गया था.

इन किस्मों पर विश्वविद्यालय में कृषि से जुड़े प्रयोग और बीज उत्पादन का काम भी होता है. ऐसे में लंबे समय तक खेत में पानी जमा रहने से केवल मौजूदा फसल पर ही असर नहीं पड़ेगा, बल्कि अनुसंधान और बीज उत्पादन से जुड़े कार्य भी प्रभावित हो सकते हैं.

बाढ़ का पानी बढ़ने के साथ सबसे बड़ी चिंता यह है कि खेत में पानी कितने समय तक जमा रहता है. जलमग्नता की अवधि बढ़ने पर फसल को होने वाला नुकसान भी बढ़ सकता है. इसी वजह से विश्वविद्यालय प्रशासन ने मौजूदा स्थिति का आकलन शुरू कर दिया है.

कुलपति ने वैज्ञानिकों के साथ लिया जमीनी जायजा

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए बीएयू सबौर के कुलपति डॉ डी आर सिंह ने विश्वविद्यालय के सभी निदेशकों, संबंधित वैज्ञानिकों और पदाधिकारियों के साथ बाढ़ प्रभावित प्रक्षेत्र का निरीक्षण किया.

निरीक्षण के दौरान खेतों में जमा पानी की स्थिति, धान की फसल पर इसके संभावित प्रभाव और भविष्य में ऐसी समस्या से बचने के उपायों पर विस्तार से चर्चा की गयी. कुलपति ने वर्तमान नुकसान का आकलन करने के साथ आगे की रणनीति तैयार करने पर भी जोर दिया.

कुलपति ने कहा कि भविष्य में बाढ़ से फसल क्षति कम करने के लिए धान की वर्तमान किस्मों की समीक्षा जरूरी है. बाढ़ की स्थिति को ध्यान में रखते हुए ऐसी किस्मों के चयन पर वैज्ञानिक तरीके से काम करने का सुझाव दिया गया, जो जलभराव और बाढ़ की परिस्थितियों में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन कर सकें.

फसल बचाने के लिए रोपाई का समय बदलने पर भी मंथन

बीएयू प्रशासन के सामने एक और महत्वपूर्ण सवाल फसल के समय को लेकर है. गंगा नदी के जलस्तर बढ़ने की संभावित अवधि को ध्यान में रखते हुए धान की नर्सरी और रोपाई का काम पहले पूरा किया जा सकता है या नहीं, इस पर वैज्ञानिक रूप से अध्ययन करने का सुझाव दिया गया है.

अगर बाढ़ आने से पहले धान की फसल अपेक्षाकृत सुरक्षित अवस्था में पहुंच जाती है, तो नुकसान को कम किया जा सकता है. इसके लिए मौसम, नदी के जलस्तर और फसल के विकास चक्र के बीच तालमेल बैठाकर रोपाई का समय तय करने पर काम करना होगा.

यह बदलाव खासकर उन कृषि प्रक्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, जहां हर साल मानसून के दौरान बाढ़ और जलजमाव का खतरा बना रहता है.

हर साल डूब रहा फॉर्म का निचला हिस्सा

विश्वविद्यालय के लिए यह समस्या कोई नई नहीं है. पिछले चार-पांच वर्षों से गंगा नदी का जलस्तर बढ़ने पर फॉर्म के निचले हिस्सों में बाढ़ और जलजमाव की स्थिति सामने आती रही है.

हर साल दोहरायी जा रही इस समस्या ने विश्वविद्यालय के अनुसंधान प्रक्षेत्रों और महत्वपूर्ण बीज उत्पादन कार्यक्रमों को प्रभावित किया है. यही वजह है कि इस बार निरीक्षण के दौरान सिर्फ मौजूदा फसल को बचाने की कोशिश तक सीमित रहने के बजाय स्थायी समाधान पर भी चर्चा हुई.

लंबे समय तक पानी जमा रहने से फसल की उत्पादकता प्रभावित होने के साथ कृषि अनुसंधान के लिए तैयार किये गये प्रक्षेत्रों पर भी असर पड़ सकता है. ऐसे में विश्वविद्यालय के लिए जल निकासी और बाढ़ नियंत्रण की स्थायी व्यवस्था तैयार करना जरूरी हो गया है.

पानी की निकासी के लिए बनेगा तकनीकी प्रस्ताव

निरीक्षण के दौरान कुलपति ने फॉर्म क्षेत्र से बाढ़ के पानी की जल्द निकासी और गंगा के बाढ़ के पानी के नियंत्रित प्रवेश को लेकर विस्तृत तकनीकी प्रस्ताव तैयार करने का सुझाव दिया.

इस प्रस्ताव में जल निकासी नालियों को मजबूत करने, जरूरत के अनुसार उनका पुनर्गठन करने और पानी की त्वरित निकासी की व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया जायेगा. इसके साथ ही गंगा के बाढ़ के पानी के प्रवेश को नियंत्रित करने के लिए उपयुक्त संरचनात्मक और दीर्घकालीन उपायों की संभावनाओं पर भी विचार किया जायेगा.

यानी विश्वविद्यालय अब सिर्फ हर साल बाढ़ आने के बाद नुकसान का आकलन करने के बजाय ऐसी व्यवस्था तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है, जिससे पानी के प्रवेश और निकासी दोनों को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सके.

BAU Sabour Flood: ब्रीडर बीज उत्पादन की स्थिति का होगा आकलन

वर्तमान बाढ़ से प्रभावित फसल और 47.85 एकड़ में चल रहे ब्रीडर बीज उत्पादन कार्यक्रम की स्थिति का समुचित आकलन करने का निर्देश संबंधित वैज्ञानिकों और अधिकारियों को दिया गया है.

यह आकलन इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि ब्रीडर बीज कृषि अनुसंधान और आगे की बीज उत्पादन प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण आधार होता है. फसल कितनी प्रभावित हुई, कितने क्षेत्र में उत्पादन बचाया जा सकता है और आगे क्या कदम उठाने होंगे, इसका फैसला वैज्ञानिक आकलन के बाद ही किया जा सकेगा.

बीएयू की कोशिश अब फसल प्रबंधन, उपयुक्त धान की किस्म के चयन, रोपाई के समय में जरूरी बदलाव और प्रभावी जल निकासी व बाढ़ नियंत्रण व्यवस्था के माध्यम से भविष्य में होने वाली क्षति को न्यूनतम करने की है.

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By Balram

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