उफनती गंडक में बहती लकड़ियों के सहारे चल रही सीमावर्ती परिवारों की रोजी-रोटी

उफनती गंडक में बहती लकड़ियों के सहारे चल रही सीमावर्ती परिवारों की रोज़ी

वाल्मीकिनगर भारत-नेपाल सीमा पर बहने वाली गंडक नदी सीमावर्ती इलाकों के दर्जनों परिवारों के लिए सिर्फ एक नदी नहीं, बल्कि जीवनयापन का महत्वपूर्ण आधार है. नेपाल के पहाड़ी जलग्रहण क्षेत्रों में लगातार हो रही बारिश के कारण गंडक नदी इन दिनों पूरे उफान पर है. तेज बहाव के साथ बहकर आने वाली लकड़ियां स्थानीय ग्रामीणों के लिए कमाई और घरेलू जरूरतों को पूरा करने का अहम साधन बन जाती हैं. आर्थिक रूप से कमजोर कई परिवार इन्हीं लकड़ियों के सहारे अपने घर का चूल्हा जलाते हैं और अतिरिक्त लकड़ियां बेचकर आय भी अर्जित करते हैं. मानसून के दौरान नदी किनारे बसे गांवों में सुबह से ही लोगों की नजर गंडक की तेज धाराओं पर टिकी रहती है. बांस और रस्सियों की मदद से बहती लकड़ियों को किनारे लाने का प्रयास किया जाता है. हालांकि यह काम बेहद जोखिम भरा होता है. तेज धारा, गहराई और फिसलन के कारण हर पल हादसे की आशंका बनी रहती है. कई बार संतुलन बिगड़ने से लोग नदी में बह जाते हैं या गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं, लेकिन आर्थिक मजबूरी उन्हें इस खतरे से दो-दो हाथ करने के लिए विवश कर देती है. ग्रामीणों का कहना है कि बरसात शुरू होते ही यह सिलसिला हर वर्ष देखने को मिलता है. पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा अब सीमावर्ती गांवों की जीवनशैली का हिस्सा बन चुकी है. आज भी बड़ी संख्या में ग्रामीण परिवार खाना बनाने के लिए लकड़ियों पर निर्भर हैं, जबकि कई लोग इन्हें स्थानीय बाजारों में बेचकर अपने परिवार की जरूरतें पूरी करते हैं.उफनती गंडक में बहती लकड़ियों को पकड़ने का यह संघर्ष सीमावर्ती लोगों की कठिन परिस्थितियों, साहस और जीवटता की जीवंत तस्वीर पेश करता है. यह दृश्य बताता है कि रोज़ी-रोटी की तलाश में लोग किस तरह हर दिन अपनी जान जोखिम में डालने को मजबूर हैं. वाल्मीकि नगर से विवेक सिंह की रिपोर्ट

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Author: Prabhat khabar news desk

Published by: Satish kumar

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