बरसात में ‘कट’ जाता है दोन, 26 गांवों की जिंदगी पहाड़ी नदियों के भरोसे, आज भी ट्रैक्टर-ट्रॉली बनी सहारा

पश्चिम चंपारण का दोन क्षेत्र प्राकृतिक सुंदरता के बावजूद बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है. हर साल मानसून इन 26 गांवों को बाकी जिले से काट देता है, जिससे जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है.

Bettiah News: प्राकृतिक सुंदरता, घने जंगलों और पहाड़ी वादियों के लिए प्रसिद्ध पश्चिम चंपारण का दोन क्षेत्र आजादी के सात दशक बाद भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है. वाल्मीकि टाइगर रिजर्व (वीटीआर) के जंगलों के बीच बसे इस थारू आदिवासी बहुल इलाके में हर साल मानसून लोगों के लिए मुसीबत बनकर आता है. नेपाल के तराई और जलग्रहण क्षेत्रों में लगातार हो रही बारिश के कारण पहाड़ी नदियां उफान पर हैं, जिससे दोन पंचायत के 26 गांवों का जिला और प्रखंड मुख्यालय से संपर्क टूटने की स्थिति बन गई है.

जर्जर सड़क पर ट्रैक्टर निकालना भी मुश्किल

लगातार बारिश के कारण हरनाटांड़ से नौरंगिया दोन जाने वाली सड़क पूरी तरह जर्जर हो गई है. ग्रामीण सोहन महतो, हरिद्वार महतो, वीरेंद्र महतो और जगदीश सोखईत बताते हैं कि दोन से एक ट्रैक्टर-ट्रॉली निकालने के लिए दो से तीन अतिरिक्त ट्रैक्टर लगाकर उसे खींचना पड़ता है. तब कहीं जाकर नदी और जंगल के रास्ते वाहन हरनाटांड़ बाजार तक पहुंच पाते हैं.

करीब 25 से 30 किलोमीटर दूर बसे इस क्षेत्र तक आज भी कोई सर्व मौसम पक्की सड़क नहीं है. बरसात शुरू होते ही सड़कें नदी का रूप ले लेती हैं और आवागमन लगभग ठप हो जाता है.

एक सड़क, 22 बार नदी पार करने की मजबूरी

दोन क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यहां पहुंचने के लिए एक ही मार्ग पर एक नदी को 22 बार पार करना पड़ता है. यही वजह है कि हर साल लगभग चार महीने तक यह इलाका बाकी जिले से लगभग कट जाता है.

ट्रैक्टर-ट्रॉली ही बनी लोगों की लाइफलाइन

भारतीय थारू कल्याण महासंघ के महामंत्री राजकुमार बताते हैं कि विकास की अनदेखी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज भी शादी-ब्याह से लेकर रोजमर्रा की जरूरतों तक ट्रैक्टर-ट्रॉली ही सबसे भरोसेमंद साधन है. अधिकांश सड़कें कच्ची हैं और बारिश में कीचड़ से भर जाती हैं, जिससे पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है.

बीमारी में बढ़ जाती है परेशानी

बरसात शुरू होने से पहले ग्रामीण चार महीने के राशन का इंतजाम कर लेते हैं. लेकिन यदि इस दौरान कोई बीमार पड़ जाए या कोई आपात स्थिति उत्पन्न हो जाए तो अस्पताल पहुंचना बेहद कठिन हो जाता है. कई बार मरीजों को चारपाई या ट्रैक्टर-ट्रॉली के सहारे नदी पार कर अस्पताल ले जाना पड़ता है. राहत एवं बचाव दल के लिए भी गांवों तक पहुंचना आसान नहीं होता.

आधा दर्जन से अधिक पहाड़ी नदियां बनती हैं संकट

वीटीआर के जंगलों से निकलने वाली मसान, भपसा, कापन, हरहा, सुखौड़ा, सिगहा, ढोंगही, भलुई और रघिया समेत कई पहाड़ी नदियां और दर्जनों जंगली नाले दोन क्षेत्र से गुजरते हैं. सामान्य दिनों में शांत रहने वाली ये नदियां बरसात में उफान पर आ जाती हैं. कई दिनों तक हालात ऐसे रहते हैं कि सड़क, नदी और गांव में अंतर करना मुश्किल हो जाता है.

बाढ़ पीड़ितों को अब भी नहीं मिला पूरा पुनर्वास

सिगरहवा गांव की लक्ष्मीना देवी बताती हैं कि तीन वर्ष पहले बाढ़ में उनका घर बह गया था. सरकार ने आवास और वासगीत भूमि देने की घोषणा की थी, लेकिन आज भी कई परिवार इन सुविधाओं से वंचित हैं. हर वर्ष बाढ़ और कटाव की त्रासदी झेलने के बावजूद स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है.

ग्रामीणों ने उठाई सड़क और पुल निर्माण की मांग

स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि दोन क्षेत्र तक सर्व मौसम पक्की सड़क और प्रमुख नदियों पर पुलों का निर्माण हो जाए तो हजारों लोगों की वर्षों पुरानी समस्या समाप्त हो सकती है. उनका कहना है कि प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर यह इलाका विकास की मुख्यधारा से जुड़ने का भी अधिकार रखता है.


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Author: Jay prakash verma

Published by: Sarfaraz Ahmad

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