24 अगस्त 1942: बेतिया के इसी रमना मैदान में अंग्रेजों ने निहत्थों पर बरसाईं गोलियां, 8 देशभक्त हुए थे शहीद

24 अगस्त 1942 को बेतिया के छोटा रमना मैदान में अंग्रेजों ने देशभक्तों के जुलूस पर गोलियां बरसाईं. इस गोलीकांड में 13 वर्षीय जगन्नाथ पुरी समेत आठ स्वतंत्रता सेनानी शहीद हुए थे.

बेतिया इतिहास: 24 अगस्त 1942 का दिन बेतिया के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में आज भी शौर्य और बलिदान की याद दिलाता है. भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान छोटा रमना मैदान में अंग्रेजी हुकूमत ने निहत्थे देशभक्तों के जुलूस पर गोलियां बरसा दी थीं. इस गोलीकांड में आठ वीर सपूत शहीद हुए थे. इनमें महज 13 वर्ष के बाल क्रांतिकारी जगन्नाथ पुरी भी शामिल थे. आज रमना मैदान स्थित शहीद पार्क में इन आठ शहीदों की प्रतिमाएं उस ऐतिहासिक बलिदान की गवाही देती हैं.

चंपारण तक पहुंची थी भारत छोड़ो आंदोलन की लहर

महात्मा गांधी के आह्वान पर वर्ष 1942 में शुरू हुआ भारत छोड़ो आंदोलन देखते ही देखते चंपारण तक पहुंच गया था. नौ अगस्त को स्थानीय नेता पंडित प्रजापति मिश्र की गिरफ्तारी के बाद आंदोलन और तेज हो गया. जगह-जगह तिरंगा फहराया जाने लगा. युवाओं ने सरकारी कार्यालयों, थानों और अदालतों पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने का प्रयास शुरू कर दिया था. आंदोलन को दबाने के लिए अंग्रेजी हुकूमत ने दमनात्मक कार्रवाई शुरू कर दी.

राज स्कूल से निकला था देशभक्तों का जुलूस

24 अगस्त को बेतिया में सभा और जुलूस निकालने का निर्णय लिया गया. सुबह मीना बाजार स्थित राज स्कूल परिसर से देशभक्तों का जुलूस निकला. हाथों में तिरंगा और जुबां पर देशभक्ति के नारे लिये लोगों का कारवां छोटा रमना मैदान की ओर बढ़ रहा था. जुलूस जैसे ही रमना मैदान के समीप पहुंचा, वहां पहले से तैनात अंग्रेज पुलिस ने अचानक गोलीबारी शुरू कर दी.

13 साल के जगन्नाथ पुरी भी हुए थे शहीद

अंग्रेजी पुलिस की गोलियों से रामेश्वर मिश्र, गणेश राव, गणेश राय, भगवत उपाध्याय, जगन्नाथ पुरी, फौजदार अहीर, तुलसी रावत और भिखारी कोइरी शहीद हो गये. गोलीबारी में दर्जनों लोग घायल भी हुए थे. इन शहीदों में जगन्नाथ पुरी की उम्र महज 13 वर्ष थी. कम उम्र में देश के लिए दिया गया उनका बलिदान आज भी लोगों को प्रेरित करता है.

शहीद पार्क में जीवित है बलिदान की कहानी

रमना मैदान स्थित शहीद पार्क में स्थापित आठों शहीदों की प्रतिमाएं बेतिया के उस गौरवशाली इतिहास को याद दिलाती हैं. 24 अगस्त 1942 का यह गोलीकांड केवल बेतिया की घटना नहीं थी, बल्कि चंपारण के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिसमें निहत्थे देशभक्तों ने अंग्रेजी हुकूमत के सामने अदम्य साहस दिखाया. इन वीर सपूतों का बलिदान आज भी स्वतंत्रता संग्राम की कीमत और देशभक्ति की मिसाल के रूप में याद किया जाता है.

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लेखक के बारे में

By अवध किशोर तिवारी

अवध किशोर तिवारी तीन दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. इन्होंने हिंदी दैनिक राष्ट्रीय सहारा के दिल्ली संस्करण से करियर की शुरुआत की. वर्तमान में वर्ष 2018 से प्रभात खबर के बेतिया ब्यूरो कार्यालय से जुड़े हैं. सामाजिक, अपराध, राजनीतिक एवं जनसरोकार से जुड़ी खबरों पर उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है

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