पटना के बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव का परिणाम बिहार की राजनीति के लिए एक बड़ा राजनीतिक संकेत है.पिछले 30 सालों से भारतीय जनता पार्टी (BJP) का अभेद्य किला मानी जाने वाली इस सीट पर पहली बार जन सुराज के फाउंडर प्रशांत किशोर 19,324 वोटों से जीत दर्ज की है.
3 अगस्त से पहले तक भाजपा को इस सीट पर अपनी जीत को लेकर पूरा भरोसा था, मगर नतीजे उसके पक्ष में नहीं रहे. अब सवाल ये है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि भाजपा का सबसे मजबूत गढ़ ढह गया और प्रशांत किशोर पहली बार चुनाव लड़ते हुए जीत गए? और यह समझना भी जरूरी है कि क्या यह जीत बिहार की राजनीति में नए विपक्ष के उभरने का संकेत है.
पहले समझते हैं कि वे पांच बड़े कारण क्या हैं, जिनकी वजह से प्रशांत किशोर बीजेपी का सबसे मजबूत गढ़ जीत गए
पहला कारण: खुद चुनाव मैदान में उतरना
- 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में जन सुराज ने 238 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सकी. पार्टी को 3.3% वोट मिले और 236 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई. प्रशांत किशोर खुद भी चुनाव नहीं लड़े थे.
- इस बार उन्होंने रणनीति बदली और किसी दूसरे नेता को टिकट देने के बजाय खुद बांकीपुर से चुनाव लड़ने का फैसला किया, जो टर्निंग प्वाइंट बन गया.
- प्रशांत किशोर पहले से पूरे देश में एक सफल चुनाव रणनीतिकार के रूप में पहचाने जाते रहे हैं, 2025 में चुनाव नहीं लड़ने के कारण आम जनता में उनकी यही इमेज बनी रही.
- लेकिन 2026 के उप चुनाव में जब वे खुद मैदान में उतरे तो चुनाव भाजपा बनाम प्रशांत किशोर बन गया और इसका फायदा जनसुराज को हुआ.
दूसरा कारण: भाजपा को उम्मीदवार बदलना पड़ा भारी
- बांकीपुर सीट लंबे समय तक भाजपा और नितिन नवीन के परिवार का गढ़ रही है. पहले यह पटना पश्चिम के नाम से जानी जाती थी, जहां से उनके पिता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा विधायक थे.
- 2006 में उनके निधन के बाद नितिन नवीन पहली बार विधायक बने और 2025 में फिर जीत दर्ज की. राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने और राज्यसभा जाने के बाद उनके इस्तीफे से सीट खाली हुई.
- भाजपा ने पहले अभिषेक कुमार सिन्हा (बंटी) को उम्मीदवार बनाया, लेकिन नामांकन के अगले दिन उन्होंने पारिवारिक कारणों से नाम वापस ले लिया. इसके बाद पार्टी ने नीरज कुमार सिन्हा को टिकट दिया, जो स्थानीय होने के बावजूद नितिन नवीन जैसी पहचान और जनसंपर्क नहीं बना सके.
- वहीं, प्रशांत किशोर ने चुनाव को पूरी तरह व्यक्तिगत स्तर पर लड़ा, जिससे मुकाबला पार्टियों से ज्यादा उम्मीदवारों के बीच सिमट गया.
तीसरा कारण: भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक में पहली बार बड़ी सेंध
- बांकीपुर को भाजपा का गढ़ इसलिए कहा जाता था क्योंकि यहां पार्टी का वोट प्रतिशत वर्षों तक बेहद मजबूत रहा. 2008 के बाद से भाजपा का वोट शेयर कभी 60 प्रतिशत से नीचे नहीं गया था. लेकिन इस चुनाव में यह घटकर 34.4 प्रतिशत तक पहुंच गया.
- प्रभात खबर के पॉलिटिकल एडिटर मिथिलेश कुमार कहते हैं कि यह गिरावट केवल एंटी-इंकम्बेंसी से नहीं आई. उनके अनुसार भाजपा के पारंपरिक सामाजिक गठबंधन में पहली बार दरार दिखाई दी.
- कायस्थ समुदाय का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ रहा, लेकिन अन्य सवर्ण वर्गों और कुछ पिछड़े वर्गों के मतदाता प्रशांत किशोर की ओर झुकते दिखाई दिए. यानी भाजपा के मजबूत वोट बैंक में पहली बार वास्तविक सेंध लगी.
चौथा कारण: एंटी बीजेपी वोट प्रशांत किशोर के पक्ष में गया
- मिथिलेश कुमार कहते हैं कि यह चुनाव केवल भाजपा के वोट टूटने की कहानी नहीं है. बल्कि राजद के पारंपरिक मुस्लिम-यादव (MY) वोट बैंक में भी बदलाव देखने को मिला.
- पिछले चुनावों में भाजपा विरोधी वोट राजद के पास जाता था. लेकिन इस बार स्थिति अलग थी और मतदाताओं को लगा कि भाजपा को हराने की संभावना प्रशांत किशोर के पास है।
- इसलिए इस बार बड़ी संख्या में भाजपा विरोधी वोट सीधे जन सुराज के खाते में चले गए. यानी भाजपा विरोधी वोट इस बार बंटे नहीं बल्कि एकजुट हो कर प्रशांत किशोर के हिस्से आ गए.
पांचवां कारण: प्रशांत किशोर का माइक्रो लेवल चुनाव प्रबंधन
- मिथिलेश कुमार कहते हैं कि प्रशांत किशोर की सबसे बड़ी ताकत हमेशा उनकी चुनावी रणनीति रही है.इस चुनाव में भी उन्होंने उसी रणनीति को जमीन पर उतारा. उनका पूरा फोकस बूथ मैनेजमेंट पर था.
- हर मतदान केंद्र पर कार्यकर्ताओं की सक्रिय मौजूदगी सुनिश्चित की गई. छोटी-छोटी मोहल्ला बैठक की गई. घर-घर जाकर मतदाताओं से सीधा संवाद किया गया. स्थानीय मुद्दों को प्राथमिकता दी गई.
- दूसरी तरफ भाजपा का प्रचार अपेक्षाकृत औपचारिक दिखाई दिया. केंद्रीय नेताओं की सभाएं हुईं लेकिन उनका स्थानीय असर सीमित रहा. भाजपा का चुनाव प्रचार इस बार अपेक्षित ऊर्जा नहीं दिखा पाया.
आंकड़ों से समझिए बदलाव
यदि पिछले विधानसभा चुनाव और इस उपचुनाव की तुलना करें तो तस्वीर और स्पष्ट हो जाती है. पिछले चुनाव में भाजपा को लगभग 98 हजार वोट मिले थे और जन सुराज को करीब 7 हजार वोट मिले थे. इस बार पूरी तस्वीर बदल गई. जन सुराज 49.23 प्रतिशत वोट शेयर तक पहुंच गई, जबकि भाजपा का वोट शेयर घटकर लगभग 35 प्रतिशत के आसपास रह गया. यानी चुनावी गणित पूरी तरह बदल गया.
राजद या भाजपा नुकसान किसका?
पहली नजर में लगता है कि इस चुनाव में भाजपा हारी है. लेकिन मिथिलेश कुमार मानते हैं कि इसका नुकसान राजद और कांग्रेस को ज्यादा हो सकता है.
- अब तक बिहार में भाजपा विरोधी राजनीति का मुख्य चेहरा राजद थी. लेकिन इस उपचुनाव ने संकेत दिया है कि भाजपा विरोधी वोट अब नए विकल्प की तलाश कर रहा है.यदि यह रुझान आगे भी जारी रहता है तो विपक्ष की राजनीति का केंद्र धीरे-धीरे जन सुराज बन सकती है.
- मिथिलेश कुमार कहते हैं कि इस समय बिहार की राजनीति में एक बड़ा राजनीतिक खालीपन दिखाई देता है और विपक्ष पहले जितना प्रभावी नजर नहीं आता. ऐसे में प्रशांत किशोर खुद को एक नए विपक्ष के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं.
- यदि आने वाले वर्षों में वे संगठन विस्तार, स्थानीय नेतृत्व और जनसंपर्क बनाए रखने में सफल रहते हैं, तो 2030 के विधानसभा चुनाव तक वे बिहार की राजनीति के सबसे बड़े विपक्षी चेहरे के रूप में उभर सकते हैं.
