बौसी (बांका) से संजीव पाठक की रिपोर्ट
Mandar Mystery : समुद्र मंथन की पौराणिक कथा से विश्व प्रसिद्ध मंदार पर्वत एक बार फिर इतिहास और पुरातत्व की चर्चाओं के केंद्र में है. स्थानीय इतिहासकारों, ब्रिटिशकालीन शोधकर्ताओं और लोकपरंपराओं के आधार पर यह दावा किया जाता है कि मंदार पर्वत के आसपास कभी ‘वालिशा’ नाम का एक विशाल और समृद्ध नगर आबाद था. हालांकि इस दावे की वैज्ञानिक पुष्टि अभी तक नहीं हो सकी है, लेकिन क्षेत्र में बिखरे प्राचीन शिल्प, मंदिरों के अवशेष, विशाल तालाब, मिट्टी के टीले और लोकमान्यताएं इस रहस्य को लगातार जीवित रखे हुए हैं.
इतिहासकारों के अनुसार व्यापार और संस्कृति का बड़ा केंद्र था वालिशा
स्थानीय इतिहासकार उदयेश रवि के अनुसार ऐतिहासिक विवरणों में वालिशा नगर को उस समय का प्रमुख व्यापारिक और सांस्कृतिक केंद्र बताया गया है. मान्यता है कि यहां 53 गलियां, 52 बाजार और 88 तालाब मौजूद थे. चारों ओर जलाशय, वन क्षेत्र और तीर्थस्थलों की मौजूदगी इस नगर की समृद्धि का संकेत मानी जाती है. यदि इन विवरणों को ऐतिहासिक संदर्भों में देखा जाए तो वालिशा किसी साधारण गांव के बजाय एक सुव्यवस्थित नगर प्रतीत होता है.
ब्रिटिशकालीन विद्वानों ने भी दर्ज किए थे प्राचीन अवशेष
फ्रांसिस बुकनन (हैमिल्टन), एलेक्जेंडर कनिंघम, एल.एस.एस. ओ’मैले, रॉबर्ट मोंटगोमरी मार्टिन, जेम्स रेनेल, विलियम फ्रेंकलिन, राजेंद्रलाल मित्रा और जे.डी. बेगलर जैसे कई यूरोपीय विद्वानों ने अपने यात्रा विवरणों और शोध में मंदार क्षेत्र के आसपास बिखरे प्राचीन अवशेषों का उल्लेख किया है. इन टिप्पणियों को कई शोधकर्ता यहां किसी विकसित प्राचीन बसावट के संकेत के रूप में देखते हैं.
बौंसी को वालिशा मानने पर भी मतभेद
स्थानीय मान्यता के अनुसार वर्तमान बौंसी क्षेत्र को प्राचीन वालिशा नगर माना जाता है. हालांकि कई शोधकर्ता इस मत से सहमत नहीं हैं. उनका कहना है कि अब तक ऐसे व्यापक पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिले हैं, जिनके आधार पर बौंसी को निश्चित रूप से वालिशा घोषित किया जा सके. हालांकि यहां स्थित भगवान मधुसूदन मंदिर अपनी प्राचीनता के कारण विशेष महत्व रखता है.
लखदीपा मंदिर और दीपावली की अनोखी परंपरा
Mandar Mystery : इतिहासकार रॉबर्ट मोंटगोमरी मार्टिन ने अपने लेखन में लखदीपा मंदिर का उल्लेख करते हुए लिखा है कि यहां दीप रखने के लिए असंख्य ताखे बने थे और दीपावली पर प्रत्येक घर से एक दीप लाकर पूरा परिसर प्रकाशित किया जाता था. स्थानीय लोगों का कहना है कि आज भी मधुसूदन मंदिर में पहले एक दीप जलाने और उसी ज्योति से घर में दीप प्रज्वलित करने की परंपरा इस प्राचीन विरासत की याद दिलाती है.
वैज्ञानिक उत्खनन से खुल सकते हैं कई ऐतिहासिक रहस्य
मंदार क्षेत्र में आज भी शिल्पयुक्त पत्थर, प्राचीन मूर्तियां, टूटे मंदिर, पुराने कुएं, मिट्टी के टीले और अन्य पुरातात्विक अवशेष बिखरे हुए हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यहां व्यवस्थित वैज्ञानिक उत्खनन और विस्तृत शोध कराया जाए, तो भारतीय इतिहास के कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं. फिलहाल वालिशा नगर इतिहास, लोकविश्वास और पुरातत्व के बीच एक रोचक रहस्य बना हुआ है.
