बौसी (बांका) से संजीव पाठक की रिपोर्ट
Community Toilet : बांका जिले के बौसी प्रखंड में स्वच्छता अभियान की जमीनी तस्वीर सरकारी दावों की पोल खोल रही है. लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के तहत लाखों रुपये खर्च कर बनाए गए सामुदायिक शौचालय वर्षों से अनुपयोगी पड़े हैं. रखरखाव के अभाव और प्रशासनिक उदासीनता के कारण इनका लाभ आम लोगों तक नहीं पहुंच सका है. वहीं एक शौचालय परिसर की टूटी सेप्टिक टंकी अब बच्चों की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन गई है.
निर्माण के बाद कभी नहीं मिला योजनाओं का लाभ
प्रखंड क्षेत्र के कौआवरण गांव के समीप बने दो सामुदायिक शौचालय वर्षों से बंद पड़े हैं. इसी तरह नगर पंचायत क्षेत्र में सरस्वती शिशु विद्या मंदिर के पास बना सामुदायिक शौचालय भी बदहाल स्थिति में है. स्थानीय लोगों का कहना है कि निर्माण के कुछ समय बाद ही यह शौचालय बंद हो गया और आज तक इसका संचालन शुरू नहीं हो सका.
1.79 लाख रुपये की लागत से हुआ था निर्माण
जानकारी के अनुसार वर्ष 2020-21 में 1,79,477 रुपये की लागत से इस सामुदायिक शौचालय का निर्माण कराया गया था. उस समय निर्माण कार्य तत्कालीन प्रखंड पंचायती राज पदाधिकारी निलेश कुमार के अधीन कराया गया था. उद्देश्य आसपास के लोगों को स्वच्छ एवं सुरक्षित शौचालय सुविधा उपलब्ध कराना था, लेकिन योजना अपने मकसद तक नहीं पहुंच सकी.
टूटी सेप्टिक टंकी से बच्चों की सुरक्षा पर खतरा
Community Toilet : शौचालय परिसर में बनी सेप्टिक टंकी का ढक्कन पूरी तरह टूट चुका है. यह खुली टंकी किसी भी समय बड़े हादसे का कारण बन सकती है. सबसे चिंता की बात यह है कि इसके ठीक बगल में स्थित सरस्वती शिशु विद्या मंदिर में प्रतिदिन सैकड़ों बच्चे पढ़ने आते हैं. ऐसे में दुर्घटना की आशंका लगातार बनी हुई है.
ग्रामीणों ने प्रशासन से की तत्काल कार्रवाई की मांग
स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने कई बार प्रशासन से शौचालय की मरम्मत और नियमित संचालन की मांग की, लेकिन अब तक कोई ठोस पहल नहीं हुई. ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से सामुदायिक शौचालयों को शीघ्र चालू कराने, टूटी सेप्टिक टंकी की मरम्मत कराने और बच्चों व आम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है.
स्वच्छता अभियान पर उठ रहे सवाल
ग्रामीणों का कहना है कि करोड़ों रुपये की सरकारी योजनाएं तभी सफल मानी जाएंगी, जब उनका लाभ लोगों तक पहुंचे. वर्षों से बंद पड़े सामुदायिक शौचालय और बदहाल रखरखाव स्वच्छता अभियान की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर रहे हैं.
