मदन कुमार, बांका : सरकारी दावें व विभागीय आंकड़ें से इतर बेरोजगारी का आलम काफी भयानक है. मजदूर दिवस पर जहां आज सरकारी व गैर सरकारी कार्यालय में छुट्टी है, वहीं दूसरी ओर दो जून की रोटी के लिए शहर के प्रमुख चौक-चौराहे पर रोजगार ढूंढने के लिए तपती धूप में सैकड़ों मजदूर खड़े हैं. हैरानी की बात यह है कि इन्हें प्रतिदिन रोजगार हाथ लगेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है.
बांका में प्रतिदिन रोजगार की गारंटी नहीं आज हाथ लगा काम, कल का ठिकाना नहीं
मदन कुमार, बांका : सरकारी दावें व विभागीय आंकड़ें से इतर बेरोजगारी का आलम काफी भयानक है. मजदूर दिवस पर जहां आज सरकारी व गैर सरकारी कार्यालय में छुट्टी है, वहीं दूसरी ओर दो जून की रोटी के लिए शहर के प्रमुख चौक-चौराहे पर रोजगार ढूंढने के लिए तपती धूप में सैकड़ों मजदूर खड़े हैं. […]

दरअसल, बांका में बेरोजगारी काफी अधिक है. प्रतिदिन दस हजार से अधिक मजबूर दैनिक मजदूर खोजने के लिए सुबह घर से निकलते हैं, परंतु हर दिन रोजगार मिलना संभव नहीं रहता है.
अलबत्ता किसी दिन काम मिला तो किसी दिन निराशा हाथ लगती है. जिस दिन काम मिलता है तो देहाड़ी के रुप में 300 से 400 रुपया मिल जाता है. अलबत्ता, मजदूर उस पैसे से घर के लिए खाद्य सामग्री खरीद कर वापस घर लौटते हैं. जबकि, जिस दिन काम नहीं मिलता है उस दिन मजदूर का हाथ खाली रहता है और उनके चेहरे पर मायूसी छायी रहती है.
शहर के डीएम कोठी चौक, गांधी चौक, शिवाजी चौक, विजयनगर चौक सहित अन्य चौक-चौराहे पर प्रतिदिन मजदूर काम की तलाश में इकट्ठे होते हैं. लिहाजा, इन मजदूरों को प्रतिदिन रोजगार देने के नाम पर सरकारी दावे फेल हो जाता है.
मजदूरों को पेयजल के लिए भी होती है दिक्कत: दिन भर मजदूरी की तलाश में चौक-चौराहे पर टकटकी लगाये खड़े मजदूर को छाया और पीने के लिए पानी तक मयस्सर नहीं है. लिहाजा, भूखे-प्यासे लोग काम की तलायश में घंटो बिता देते हैं.
सबसे दुखद बात यह है कि काम नहीं मिलने पर वैसी दशा में काफी संख्या में मजदूर घर लौट जाते हैं और दूसरे दिन पुन: वह रोजगार की तलाश में आ जाता है. इन सबके बीच मनरेगा मानव सृजन दिवस जैसी योजनाओं पर भी प्रश्न चिन्ह खड़ा हो जाता है.