कार्तिक में अहले सुबह सूर्य मंदिर में उमड़ रही महिलाओं की भीड़

छठ गीत गाकर भगवान के चरण पखार रहीं महिलाएं

छठ गीत गाकर भगवान के चरण पखार रहीं महिलाएं

देव. कार्तिक माह में देव सूर्य मंदिर में प्रतिदिन सुबह में महिलाओं की भीड़ उमड़ रही है. महिलाओं द्वारा गाये जा रहे पारंपरिक गीतों से वातावरण गुंजायमान हो रहा है, जो श्रद्धालुओं को एक अलौकिक अनुभव करा रहा है. देव स्थित प्रसिद्ध देव सूर्य मंदिर, जिसका दरवाजा पश्चिम की ओर है और जो अपनी प्राचीनता के लिए जाना जाता है, एक बार फिर लाखों छठ व्रतियों के स्वागत के लिए तैयार है. यह मंदिर न केवल अपने अद्भुत वास्तुकला, बल्कि छठ पर्व के दौरान उमड़ने वाली भक्तों की भारी भीड़ के कारण भी विश्व विख्यात है. कार्तिक माह के प्रारंभ होते ही देव और इसके आसपास के पंचायतों की हजारों महिलाएं अहले सुबह से ही सूर्यकुंड तालाब में स्नान कर देव सूर्य मंदिर परिसर को धोना प्रारंभ कर दे रही हैं. सैकड़ों वर्षों से यह आस्था है कि पवित्र कार्तिक माह में अहले सुबह ब्रह्ममुहूर्त में स्नान कुंभ स्नान के बराबर फल प्रदान करता है. ऐसे में सैकड़ों की संख्या में महिलाएं स्नान कर भगवान सूर्य के गर्भगृह को अपने हाथों से पखारती हैं और भगवान को प्रसन्न करती हैं जिससे मनोकामना पूर्ण होती है. धीरे धीरे यह परंपरा बढ़ती गई और आज हजारों महिलाओं का हुजूम मंदिर में उमड़ रहा है. सुबह के तीन बजे से ही सूर्यकुंड तालाब, सूर्य मंदिर के बाहर और देव आने वाली सभी सड़कों पर भीड़ उमड़ रही है जो छठ गीत गुनगुनाती हुई सूर्य मंदिर की ओर जाती दिखती हैं.

तैयारियों को दिया जा रहा अंतिम रूप

प्रशासन ने भी इस छठ महापर्व के लिए कमर कस ली है. लाखों की संख्या में आने वाले श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए सुरक्षा और सुविधाओं के पुख्ता इंतजाम किए जा रहे हैं. देव सूर्यकुंड तालाब की साफ-सफाई और घाटों की व्यवस्था को अंतिम रूप दिया जा रहा है, जिसका छठ पर्व में विशेष महत्व है. कार्तिक छठ के दौरान किसी भी अप्रिय घटना से बचने के लिए सुरक्षा के चाक-चौबंद इंतजाम किए जा रहे हैं. यहां हर साल लगभग 12 से 15 लाख लोग आस्था के इस महाकुंभ में शामिल होने के लिए देश के कई राज्यों से पहुंचते हैं. छठ पर्व की सबसे बड़ी खासियत इसकी सामाजिक समरसता है, जहां बिना किसी जातिगत भेदभाव के, सूर्य देव को बांस के सूप और डाले में प्रसाद अर्पित किया जाता है, जो आस्था और लोक संस्कृति के अटूट बंधन को दर्शाता है. छठ के पारंपरिक गीतों से सजी देव की यह नगरी यह सिद्ध करती है कि यह पर्व केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि हमारी लोक-संस्कृति, शुद्धता और प्रकृति के प्रति अटूट आस्था का महापर्व है. सूर्य की पहली किरण के स्वागत और ढलते सूर्य को अर्घ्य देने के इस अनुपम दृश्य को देखने के लिए लाखों आंखें प्रतीक्षारत है.

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