आजादी के 80 साल बाद भी पुल का इंतजार: बरसात आते ही टापू बन जाता है औरंगाबाद का डोमन बिगहा

आज़ादी के 80 साल बीत जाने के बाद भी डोमन बिगहा गांव के 400 परिवार पक्के पुल के लिए तरस रहे हैं. बरसात में नदी का पानी गांव को चारों ओर से घेर लेता है, जिससे आवागमन पूरी तरह ठप हो जाता है. इस बेहद गंभीर समस्या के बावजूद, सरकारी उदासीनता बनी हुई है, जिससे ग्रामीणों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं.

देश आजादी के 80 वर्ष पूरे होने का जश्न मना रहा है, विकास और आधुनिक भारत की तस्वीरें पेश की जा रही हैं. लेकिन औरंगाबाद के देव प्रखंड के इसरौर पंचायत स्थित डोमन बिगहा गांव की तस्वीर इन दावों से बिल्कुल अलग है. यहां करीब 400 परिवार आज भी एक पक्के पुल के लिए वर्षों से इंतजार कर रहे हैं.

चारों ओर नदी से घिरे इस गांव में बरसात आते ही जिंदगी जैसे ठहर जाती है. नदी में पानी बढ़ते ही डोमन बिगहा का संपर्क प्रखंड मुख्यालय, स्कूल, कॉलेज, अस्पताल और बाजार से लगभग चार महीने तक कट जाता है. गांव के लोगों के लिए बाहर निकलना किसी चुनौती से कम नहीं होता. हालात ऐसे हैं कि बीमारी हो जाए तो अस्पताल पहुंचना मुश्किल, बच्चों को स्कूल जाना हो तो जान जोखिम में डालकर नदी पार करनी पड़ती है और गर्भवती महिलाओं के सामने सबसे बड़ा सवाल सुरक्षित प्रसव का खड़ा हो जाता है.

पुल निर्माण की कोई व्यवस्था नहीं

सरकारी स्तर पर पुल निर्माण की कोई व्यवस्था नहीं होने पर ग्रामीणों ने खुद आगे बढ़कर चंदा और आपसी सहयोग से नदी पर चचरी पुल बनाया था. यही पुल गांव की जिंदगी का सहारा था, लेकिन पिछले दिनों हुई भारी बारिश और नदी के तेज बहाव ने ग्रामीणों की इस उम्मीद को भी बहा दिया. चचरी पुल टूटने के बाद अब गांव से निकलना लगभग मुश्किल हो गया है.

नदी पार करना मजबूरी, जोखिम उठाना नियति

डोमन बिगहा गांव के ग्रामीण आलोक सिंह, दिनेश मेहता, रामसुरूप मेहता, जयराम राम, रमेश महतो, अरविंद महतो, रितिक सिंह, सुरेंद्र नेता, राजू कुमार, रविरंजन कुमार, अक्षय कुमार, आशुतोष कुमार, विनय राम, बदरी महतो, परवेश राम, जगनारायण राम, विजय महतो, बीरेंद्र सिंह, बबलु राम, अंबिका राम, दिनेश महतो, रितिक कुमार और आनंद कुमार चंद्रवंशी ने एक स्वर में कहा कि गांव के करीब 400 परिवार वर्षों से पक्के पुल की मांग कर रहे हैं.

बरसात के दिनों में गांव चारों ओर से नदी के पानी से घिर जाता है और करीब चार महीने तक आवागमन पूरी तरह प्रभावित रहता है. इस दौरान नदी पार करना हमेशा से जान जोखिम में डालने जैसा रहा है. कई बार लोग तेज बहाव के बीच किसी तरह नदी पार करते हैं, लेकिन यह जोखिम कभी-कभी जिंदगी पर भारी पड़ जाता है.

स्कूल जाने के दौरान एक बच्ची नदी के पानी में बह गई थी

ग्रामीणों के अनुसार, लगभग दो-तीन वर्ष पूर्व स्कूल जाने के दौरान एक बच्ची नदी के पानी में बह गई थी. काफी खोजबीन के बाद उसका शव बरामद हुआ था. इस दर्दनाक हादसे के बाद पूरे गांव में मातम पसरा था. ग्रामीणों को उम्मीद थी कि शायद अब प्रशासन और जनप्रतिनिधि इस गंभीर समस्या को समझेंगे और गांव को सुरक्षित आवागमन की सुविधा मिलेगी, लेकिन वर्षों गुजर जाने के बाद भी डोमन बिगहा की तकदीर नहीं बदली. आज भी गांव के बच्चे, महिलाएं, बुजुर्ग और मरीज उसी खतरे के बीच जीवन जीने को मजबूर हैं.

गर्भवती महिलाओं की चिंता सबसे बड़ी

डोमन बिगहा की महिलाओं के लिए बरसात का मौसम भय लेकर आता है. गर्भवती महिलाओं को समय पर अस्पताल पहुंचाना ग्रामीणों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है. प्रसव पीड़ा होने पर परिजनों के सामने सवाल खड़ा हो जाता है कि आखिर नदी पार कर अस्पताल तक कैसे पहुंचाया जाए.

ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि बरसात के दिनों में रात के समय किसी की तबीयत बिगड़ जाए तो स्थिति और भयावह हो जाती है. सुरक्षित सड़क और पुल के अभाव में लोग भगवान भरोसे रहते हैं. कई बार मरीजों को स्थानीय स्तर पर जोखिम उठाकर नदी पार कराना पड़ता है.

बच्चों की पढ़ाई भी हो रही प्रभावित

पुल नहीं होने का असर केवल आवागमन तक सीमित नहीं है. गांव के बच्चों की पढ़ाई भी इससे प्रभावित होती है. बरसात के दिनों में स्कूल और कॉलेज जाने वाले छात्र-छात्राओं को नदी पार करनी पड़ती है. पानी बढ़ने पर अभिभावक बच्चों को घर से बाहर भेजने से डरते हैं.

ग्रामीणों का कहना है कि जिस रास्ते से बच्चों को रोजाना शिक्षा के लिए जाना चाहिए, वही रास्ता बरसात में उनके लिए खतरा बन जाता है. एक बच्ची की नदी में बहने से हुई मौत के बाद अभिभावकों का डर और बढ़ गया है.

आवेदन दिए, गुहार लगाई, लेकिन नहीं बदली तस्वीर

ग्रामीणों के अनुसार, पक्के पुल की मांग को लेकर जिला पदाधिकारी, सांसद, विधायक और अन्य जनप्रतिनिधियों को कई बार आवेदन दिया गया. गांव के लोगों ने अपनी समस्या हर स्तर तक पहुंचाने का प्रयास किया, लेकिन अब तक कोई ठोस पहल नहीं हुई.

ग्रामीणों में इस बात को लेकर गहरा आक्रोश है कि आजादी के 80 साल बाद भी उन्हें बुनियादी सुविधा के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है. उनका कहना है कि विकास की योजनाएं कागजों और मंचों पर भले ही दिखाई देती हों, लेकिन डोमन बिगहा जैसे गांव आज भी एक पुल के अभाव में विकास से कोसों दूर हैं.

क्या कहते हैं अधिकारी

देव के बीडीओ दीपक कुमार ने बताया कि डोमन बिगहा गांव में पुल निर्माण की मांग और ग्रामीणों की आवागमन संबंधी समस्या गंभीर है. इस मामले से वरीय पदाधिकारियों को अवगत कराया गया है. साथ ही संबंधित विभाग से लगातार संपर्क बनाए रखा जा रहा है. उन्होंने कहा कि प्रशासन का प्रयास होगा कि ग्रामीणों की आवागमन संबंधी समस्या का स्थायी समाधान निकाला जा सके.

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By Ravikant Pathak

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