जिस उम्र में बच्चों के हाथों में कॉपी, कलम और किताब होनी चाहिए, उस उम्र में उनके हाथों में मजदूरी की मजबूरी थमा दी जाती है. परिवार का पेट पालने के लिए अभिभावक भी विवश होकर बच्चों से श्रम करवाते हैं. नतीजतन, इन मासूमों का बचपन कूड़े के ढेर में गुम होता जा रहा है.
प्रखंड के विभिन्न क्षेत्रों में रोजाना ऐसे कई बच्चे कूड़ेदानों और कचरे के ढेर से प्लास्टिक, लोहा, शीशा, बोतल, लकड़ी और कागज बीनते नजर आते हैं. सरकार ने शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया है. गरीब परिवारों के लिए खाद्य सुरक्षा अधिनियम समेत कई कल्याणकारी योजनाएं भी संचालित हैं, लेकिन इसके बावजूद गरीब तबके की बदहाली पूरी तरह खत्म नहीं हो सकी है. यही कारण है कि आज भी कई बच्चों का भविष्य कूड़े के ढेर पर सिमटकर रह गया है.
सुबह सूरज की पहली किरण के साथ पीठ पर प्लास्टिक का बोरा लेकर निकलने वाले ये बच्चे दिनभर कचरे के बीच अपनी रोजी-रोटी की तलाश में जुटे रहते हैं. गंदगी और संक्रमण के बीच काम करने से उनके स्वास्थ्य पर लगातार खतरा मंडराता रहता है, लेकिन उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने वाला कोई नजर नहीं आता. समाज भी अक्सर इन्हें उपेक्षा की नजर से देखता है.
इन बच्चों के लिए कूड़े से उपयोगी सामान चुनना ही जीवन की नियति बन गई है. शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और बेहतर भविष्य जैसे बुनियादी अधिकार उनसे दूर होते जा रहे हैं. बाल श्रम रोकने और बच्चों को शिक्षा से जोड़ने की जिम्मेदारी संबंधित विभागों की है, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति चिंताजनक बनी हुई है.
क्या कहते हैं पदाधिकारी
प्रभारी प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी (बीईओ) संजीव कुमार ने बताया, शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत सरकारी रिकॉर्ड में अधिकांश बच्चे स्कूलों में नामांकित हैं. यदि कोई बच्चा स्कूल नहीं जाता और कूड़ा बीनने या मजदूरी में लगा है, तो उसके अभिभावक या बाल कल्याण समिति द्वारा जानकारी दिए जाने पर ही विभाग आवश्यक कार्रवाई कर सकता है.
