आरा सदर अस्पताल में बायोमेडिकल वेस्ट प्रबंधन पर उठे सवाल, विशेषज्ञ बोले- व्यवस्था चिंताजनक

आरा सदर अस्पताल में बायोमेडिकल वेस्ट प्रबंधन की लचर व्यवस्था पर विशेषज्ञों ने चिंता जताई है. वैज्ञानिक निस्तारण की कमी से स्वास्थ्य को खतरा बढ़ रहा है.

स्नातकोत्तर भूगोल विभाग, महाराजा कॉलेज, आरा एवं स्नातकोत्तर भूगोल विभाग, वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा के संयुक्त तत्वावधान में मंगलवार को प्रो. एस. के. सिन्हा स्मृति ऑनलाइन व्याख्यानमाला के 27वें एपिसोड का आयोजन किया गया.

"जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट प्रबंधन: पर्यावरणीय न्याय एवं सतत् शहरी सुशासन पर एक भौगोलिक परिप्रेक्ष्य" विषय पर आयोजित इस व्याख्यान में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थियों सहित 90 से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया.

जोखिमयुक्त अपशिष्ट का स्रोत स्तर पर पृथक्करण है जरूरी: डॉ. स्नेहा स्वरूप

कार्यक्रम की मुख्य वक्ता एस.एस. कॉलेज, जहानाबाद (मगध विश्वविद्यालय, बोधगया) के स्नातकोत्तर भूगोल विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. स्नेहा स्वरूप ने बायोमेडिकल वेस्ट की अवधारणा, उसके स्रोत, वर्गीकरण, वैज्ञानिक प्रबंधन तथा पर्यावरण एवं जनस्वास्थ्य पर उसके प्रभावों पर विस्तार से प्रकाश डाला.

उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य संस्थानों से निकलने वाले कुल अपशिष्ट का लगभग 85 प्रतिशत सामान्य होता है, जबकि 10 से 15 प्रतिशत अपशिष्ट जोखिमयुक्त होता है. यदि इस जोखिमयुक्त अपशिष्ट का स्रोत स्तर पर पृथक्करण नहीं किया जाए, तो पूरा अपशिष्ट खतरनाक बन सकता है.

उन्होंने बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स-2016 के तहत रंग-कोड आधारित पृथक्करण, सुरक्षित पैकेजिंग, बारकोडिंग, परिवहन, उपचार एवं वैज्ञानिक निस्तारण की प्रक्रिया की जानकारी देते हुए कहा कि अपशिष्ट का समुचित प्रबंधन सार्वजनिक स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण और सतत् शहरी विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है.

उन्होंने चेतावनी दी कि अनुचित प्रबंधन से हेपेटाइटिस-बी, हेपेटाइटिस-सी, एचआईवी, टिटनेस जैसे संक्रामक रोगों के साथ-साथ रासायनिक एवं रेडियोधर्मी प्रदूषण का खतरा भी बढ़ जाता है.

आरा सदर अस्पताल की व्यवस्था पर जताई गई चिंता

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा के स्नातकोत्तर भूगोल विभागाध्यक्ष प्रो. संजय कुमार ने कहा कि आरा सदर अस्पताल में बायोमेडिकल वेस्ट प्रबंधन की समुचित व्यवस्था का अभाव गंभीर चिंता का विषय है.

उन्होंने कहा कि यदि जिला स्तर के प्रमुख स्वास्थ्य संस्थान में भी जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट का वैज्ञानिक प्रबंधन प्रभावी ढंग से नहीं हो पा रहा है, तो यह सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं पर्यावरण दोनों के लिए बड़ी चुनौती है. उन्होंने संबंधित प्रशासन से इस दिशा में शीघ्र और प्रभावी कार्रवाई करने की मांग की.

वर्षा ऋतु में बढ़ जाती है संक्रमण फैलने की आशंका

कार्यक्रम का संचालन करते हुए महाराजा कॉलेज, आरा के स्नातकोत्तर भूगोल विभाग की विभागाध्यक्ष एवं आयोजन सचिव डॉ. द्वीपिका एस. सिंह ने कहा कि वर्षा ऋतु में बायोमेडिकल अपशिष्ट के अनुचित प्रबंधन की समस्या और गंभीर हो जाती है.

जलभराव के कारण संक्रमित अपशिष्ट के फैलने की आशंका बढ़ जाती है, जिससे आम लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है. उन्होंने प्रशासन से प्रभावी निगरानी एवं वैज्ञानिक अपशिष्ट प्रबंधन व्यवस्था सुनिश्चित करने की अपील की.

तकनीकी समन्वयक डॉ. अरविंद कुमार सिंह ने कहा कि बायोमेडिकल अपशिष्ट प्रबंधन केवल स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज, प्रशासन और नागरिकों की भी साझा जिम्मेदारी है.

व्याख्यान के बाद आयोजित प्रश्नोत्तर सत्र में डॉ. स्नेहा स्वरूप ने प्रतिभागियों की जिज्ञासाओं का विस्तार से समाधान किया. अंत में डॉ. किसलय कलश ने सभी अतिथियों, प्रतिभागियों एवं आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त किया.

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By Ashutosh pandey

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