1990 में रांची से आए और लिया संकल्प, पूस के घर से हुई थी शुरुआत
मूल रूप से रांची के रहने वाले सुरजीत दा वर्ष 1990 में अररिया पहुंचे थे. उन्होंने जब इस निर्जन और खाली पड़े स्थल को देखा, तो उनके मन में यहाँ एक मंदिर और देव प्रतिमा स्थापित करने का संकल्प जागा. स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों से विचार-विमर्श के बाद उन्होंने यहाँ न्याय के देवता भगवान शनिदेव का मंदिर बनाने की ठानी.
उनका पेशा गैस-चूल्हा और स्टोव की मरम्मत करना है. अपनी रोज़ की सीमित आय से परिवार चलाने के साथ-साथ उन्होंने पाई-पाई जोड़कर मंदिर निर्माण की नींव रखी. उन्होंने किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया और न ही कोई सार्वजनिक चंदा मांगा; जो लोग स्वेच्छा से सहयोग करने आए, उनका दान सहर्ष स्वीकार किया.
संकल्प से सिद्धि तक: 36 वर्षों का ऐतिहासिक सफरनामा
सुरजीत दा के 1990 से लेकर वर्तमान समय तक के कड़े संघर्ष और मंदिर के क्रमिक विकास को नीचे दी गई तालिका में देखा जा सकता है:
| वर्ष / कालखंड | सांगठनिक व निर्माण कार्य की प्रगति |
| वर्ष 1990 | सुरजीत दा का रांची से अररिया आगमन, खाली भूमि पर मंदिर निर्माण का दृढ़ संकल्प. |
| वर्ष 1995 | पहली बार पूस (फूस) के छोटे से घर में शनिदेव की लघु प्रतिमा की स्थापना (स्थापक-सह-सेवायत: सुरजीत दा). |
| वर्ष 2012 | अपने स्वरोजगार की बचत से भव्य और स्थायी पक्के मंदिर निर्माण कार्य का शुभारंभ. |
| वर्ष 2018 | जनसहयोग और निजी कोष से मंदिर के मुख्य भवन की छत की ढलाई का कार्य पूर्ण. |
| वर्ष 2019 | वैदिक मंत्रोचार और भव्य प्राण-प्रतिष्ठा अनुष्ठान के साथ शनि महाराज की विशाल प्रतिमा स्थापित. |
| वर्तमान स्वरूप | काले संगमरमर, आधुनिक मार्बल और नक्काशीदार कलाकृतियों से सुसज्जित भव्य देवस्थान. |
बोलती हैं दीवारें: स्लोगन में छिपा है कर्म और धर्म का अद्भुत जीवन दर्शन
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसकी दीवारें हैं, जिन पर लिखे स्लोगन श्रद्धालुओं को जीवन जीने की कला सिखाते हैं:
- अभिनय का मंच: “मंच एक है, आप लोग सब अलग-अलग अभिनय कर रहे हैं. क्योंकि एक-दूसरे से कौन किससे आगे निकल जाये या निकल न पाये. इस मंच में जो सकुशल अभिनय करेगा, उसकी विजय तय है.”
- परिवर्तन ही नियम है: “चूंकि पृथ्वी निरंतर घूम रही है; दृश्य, वस्तु व हम सभी प्राणी साथ-साथ चल रहे हैं, इसलिए इस धरा पर कुछ भी स्थिर नहीं है.”
- कर्तव्य व न्याय का बोध: “गलत करने से डरिये. वक्त, समय, ईमान और सत्य जाहिर करने का साहस करें. शनिदेव आध्यात्मिक व्यवस्था में सर्वोच्च दंडाधिकारी हैं, जो सत्कर्म करने वालों से प्रसन्न रहते हैं और अहंकारी व पाप करने वालों को कड़ा दंड देते हैं.”
विस्तृत पूजा विधि, सामग्रियां एवं विशेष निषेधात्मक नियम
श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए मंदिर प्रशासन द्वारा दीवारों पर ही पूजा के नियम और सामग्रियां अंकित कर दी गई हैं:
- मूल मंत्र:
ॐ शं शनिश्चरायै नमः(पूजा के समय इस मंत्र का जाप करें). - परिक्रमा नियम: शनिदेव की परिक्रमा हमेशा बाएं से दाएं (क्लॉकवाइज) घूमकर ही करनी चाहिए.
- आवश्यक सामग्रियां: तिल या सरसों का तेल, अगरबत्ती, काला तिल, लोहा, साबुत काला उड़द, काला कपड़ा, नीलकंठ का फूल, मनपसंद फल और विशेष मिठाई (घेना). दीप और पलीता मंदिर परिसर में ही उपलब्ध कराए जाते हैं.
विशेष चेतावनी (इन बातों का रखें ध्यान):
- प्रतिमा स्पर्श वर्जित: किसी भी श्रद्धालु को शनिदेव की मुख्य मूर्ति को छूने (स्पर्श करने) की अनुमति नहीं है.
- मूर्ति पर जल निषेध: शनिदेव की मुख्य प्रतिमा पर सीधे पानी या जल का इस्तेमाल बिल्कुल न करें.
- नाम का भ्रम: ‘शनि का पेड़’ कहकर कोई पेड़ नहीं होता, बल्कि वह ‘शमी’ का पूजनीय वृक्ष होता है.
- घर में पूजा नहीं: शनिदेव की फोटो या तैलचित्र कभी भी घर के भीतर स्थापित नहीं की जाती और न ही घर के अंदर इनका प्रसाद ले जाकर खाया जाता है.
नवग्रह शांति और वटसावित्री पूजन का प्रमुख केंद्र बना आश्रम रोड
वर्तमान में यह मंदिर न केवल शनि पूजा बल्कि एक बड़े ‘नवग्रह शांति केंद्र’ के रूप में विकसित हो चुका है. यहाँ प्रामाणिक रत्न-उपरत्न और अद्भुत ईश्वरीय शक्ति से युक्त 1 से लेकर 5 मुखी तक के सिद्ध रुद्राक्ष उपलब्ध कराए जाते हैं. इसके अतिरिक्त, महिलाओं की सुविधा के लिए परिसर में ही ‘वटसावित्री पूजन स्थल’ का भी निर्माण किया गया है.
प्रत्येक शनिवार को यहाँ हजारों की संख्या में श्रद्धालु न्यायदेव के दरबार में हाजिरी लगाने पहुंचते हैं. संध्या काल में महाआरती के बाद भक्तों के बीच ‘महाभोग प्रसाद’ का वितरण किया जाता है, जहाँ लोग स्वेच्छा से दान-पेटी में अर्पण करते हैं.
अररिया से राहुल सिंह की रिपोर्ट:
