Smriti Mandhana: एक ऐसे समाज में जहाँ पीरियड्स पर आज भी खुलकर बात करने में संकोच किया जाता है, वहाँ भारतीय क्रिकेटर स्मृति मंधाना ने टेस्ट मैच के दौरान पीरियड्स से जुड़े अपने अनुभव साझा कर एक नई और ज़रूरी बहस को जन्म दिया है. उन्होंने बताया कि मैदान पर पाँच दिनों के लंबे मैच के दौरान महिला खिलाड़ी इस शारीरिक असहजता से कैसे निपटती हैं. मंधाना का यह बेबाक अंदाज़ महिला खेल जगत के उस अनदेखे सच को उजागर करता है, जिसे अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है.
मंधाना ने इंस्टाग्राम पर किया खुलासा
स्मृति मंधाना ने हाल ही में इंस्टाग्राम पर एक बेहद ईमानदार वीडियो शेयर किया, जिसने खेल जगत में एक नई और जरूरी बहस छेड़ दी है. बिना किसी दिखावे या स्क्रिप्ट के, उन्होंने खुलकर बताया कि टेस्ट मैच के बीच में पीरियड्स से जूझना कैसा होता है. महिला एथलीटों से अक्सर इस विषय पर ऐसी बेबाकी देखने को नहीं मिलती.
मंधाना ने बयां किया अपना दर्द
मंधाना ने साझा किया कि कैसे उन्होंने उस शारीरिक दर्द के बावजूद अपना मानसिक संतुलन बनाए रखा। उन्होंने कहा- “मैं भारत के लिए खेलती हूं, और यही सोच मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है. जब आप देश की जर्सी पहनते हैं, तो आपको अपनी भूमिका के साथ न्याय करना होता है. ऐसे में आपके अपने पीरियड्स का दर्द भी रास्ते की रुकावट नहीं बन सकता.” उनकी यह बात जितनी प्रेरणादायक है, उतनी ही एक बड़ा सवाल भी खड़ी करती है. अगर दर्द सचमुच बर्दाश्त से बाहर हो जाए, तो क्या होगा.
अंपायर ने दी परमिशन
मंधाना ने मैच के दौरान के एक बेहद असहज लेकिन सच पल को याद करते हुए बताया- “मुझे याद है मैंने अंपायर से कहा था कि यह मेरी अब तक की सबसे अजीबोगरीब गुजारिश होने वाली है. मुझे पैड बदलने के लिए दौड़कर अंदर जाना होगा. चूंकि मैंने सफेद टेस्ट कपड़े पहने थे, अंपायर भी स्थिति की संवेदनशीलता को तुरंत समझ गईं और उनके पास मुझे अनुमति देने के अलावा कोई विकल्प नहीं था.”
क्रिकेट के नियम क्या कहते है
क्रिकेट के नियम MCC (मैरीलेबोन क्रिकेट क्लब) बनाता है और ICC इन्हें दुनिया भर में लागू करता है. नियम 24 के अनुसार, अगर कोई खिलाड़ी चोट, बीमारी या किसी ठोस वजह से मैदान से बाहर जाता है, तो अंपायर की अनुमति से उसकी जगह एक ‘सब्स्टीट्यूट’ खिलाड़ी फील्डिंग कर सकता है. लेकिन वह खिलाड़ी गेंदबाजी, विकेटकीपिंग या कप्तानी नहीं कर सकता.
‘पेनल्टी टाइम’ का गणित
अगर कोई खिलाड़ी 8 मिनट से ज़्यादा समय तक मैदान से बाहर रहता है, तो उस पर ‘पेनल्टी टाइम’ लागू होता है. यानी, वह जितने समय (मान लीजिए 30 मिनट) बाहर रहेगा, वापस आने के बाद उतने ही समय तक गेंदबाजी नहीं कर पाएगा.
असली समस्या कहाँ है
दरअसल, नियमों में यह कहीं साफ नहीं है कि पीरियड्स के दर्द को ‘बीमारी’ माना जाएगा या नहीं. क्रिकेट इतिहास में अब तक केवल सिर की चोट के लिए ही पूर्ण खिलाड़ी सब्स्टीट्यूट करने की अनुमति है, जो 2019 में शुरू हुई थी.
ऑलराउंडर्स को सबसे ज्यादा नुकसान
स्मृति मंधाना जैसी विशेष बल्लेबाजों के लिए गेंदबाजी पर रोक से कोई फर्क नहीं पड़ता. लेकिन दीप्ति शर्मा या नैट साइवर-ब्रंट जैसी ऑलराउंडर खिलाड़ी अगर पीरियड्स के दर्द के कारण थोड़ी देर बाहर बैठती हैं, तो टीम को उनके कोटे के ओवरों का भारी नुकसान झेलना पड़ सकता है.
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