रांची के बिरसा मुंडा फुटबॉल स्टेडियम में 26 जुलाई, रविवार की शाम सिर्फ डूरंड कप का एक मुकाबला नहीं खेला जा रहा था, बल्कि झारखंड के एक युवा फुटबॉलर का सपना भी साकार हो रहा था. जमशेदपुर एफसी के डिफेंडर निखिल बरला पहली बार अपने घरेलू शहर में किसी आधिकारिक प्रतियोगिता में खेलने उतरे थे.
मैदान में उतरने से पहले टनल में खड़े निखिल के लिए यह सिर्फ एक मैच नहीं, बल्कि उन लोगों के सामने खुद को साबित करने का मौका था, जिन्होंने उन्हें बचपन से फुटबॉल खेलते देखा था. डिफेंडर्स एफसी (श्रीलंका आर्म्ड फोर्सेज) के खिलाफ जमशेदपुर एफसी की 5-0 की शानदार जीत के बाद निखिल ने अपने सफर, संघर्ष और डूरंड कप जीतने के सपने को शेयर किया.
'रांची में खेलना मेरे लिए भावुक पल था'
निखिल ने कहा कि रांची में पहली बार डूरंड कप का आयोजन होना पूरे झारखंड के लिए बड़ी उपलब्धि है.
मैंने कॉलेज के दिनों में रांची से फुटबॉल खेलना शुरू किया था. पहली बार यहां डूरंड कप हो रहा है और अपने परिवार, दोस्तों और समर्थकों के सामने खेलना मेरे लिए बेहद खास और भावुक पल था.
बिजली नहीं थी, मैदान नहीं था... फिर भी नहीं छोड़ा फुटबॉल
निखिल का जन्म रांची में नहीं, बल्कि खूंटी जिले के एक छोटे से गांव में हुआ. गांव में न पक्का मैदान था, न बिजली. खाली जमीन पर नंगे पैर फुटबॉल खेलना ही उनकी शुरुआत थी. तीन साल की उम्र में परिवार रांची आ गया और यहीं से उनके फुटबॉल करियर को दिशा मिली. उन्होंने 2018 में टाटा फुटबॉल अकादमी (TFA) जॉइन की. 2021 में जमशेदपुर एफसी की सीनियर टीम में जगह बनाई और अब इंडियन सुपर लीग (ISL) में टीम के भरोसेमंद राइट बैक बन चुके हैं.
विंगर से बने राइट बैक
बहुत कम लोग जानते हैं कि निखिल ने अपने करियर की शुरुआत विंगर (जो मैदान के बाएं या दाएं छोर पर खेलता है) के रूप में की थी. बाद में कोच खालिद जमील ने टीम की जरूरत को देखते हुए उन्हें राइट बैक (डिफेंडर, जो मैदान के राइट साइड में खेलता है) की जिम्मेदारी दी. निखिल कहते हैं,
"मैं दोनों पोजिशन पर खेलने में सहज हूं. कोच जहां मौका दें, मैं वहीं खेलने के लिए तैयार रहता हूं. मेरे लिए सबसे जरूरी है मैदान पर उतरना."
यह फैसला उनके करियर का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ. इसी साल फरवरी में उन्होंने राइट बैक खेलते हुए ISL में अपना पहला गोल भी किया.
'झारखंड के खिलाड़ियों को मिलेगा बड़ा मंच'
रांची में डूरंड कप की मेजबानी को निखिल सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे राज्य के युवा खिलाड़ियों के लिए बड़ी उपलब्धि मानते हैं.
ऐसे टूर्नामेंट युवा खिलाड़ियों के लिए बहुत फायदेमंद होते हैं. उन्हें बड़े खिलाड़ियों को करीब से देखने और उनसे सीखने का मौका मिलता है. इससे झारखंड में फुटबॉल का विकास होगा. झारखंड में टैलेंट की कमी नहीं है. रोज अभ्यास करें, कोच की बात मानें और कम उम्र से ही ट्रायल देना शुरू करें. यही आगे बढ़ने का रास्ता है.
ये भी पढ़ें: 138 साल का इतिहास, अनगिनत कहानियां; कैसे भारतीय फुटबॉल की पहचान बना डूरंड कप
अब सिर्फ एक सपना... डूरंड कप की ट्रॉफी
निखिल 2021 में भी डूरंड कप खेल चुके हैं, लेकिन तब जमशेदपुर एफसी खिताब नहीं जीत सकी थी. इस बार उनका लक्ष्य बिल्कुल साफ है.
मैं अपने प्रोफेशनल करियर की शुरुआत के समय डूरंड कप नहीं जीत सका था. इस बार हमारे पास शानदार मौका है. मेरी कोशिश है कि जमशेदपुर एफसी के साथ डूरंड कप जीतकर यह सपना पूरा करूं.
झारखंड फुटबॉल के लिए नई शुरुआत
138 साल के इतिहास में पहली बार डूरंड कप रांची पहुंचा है. इस बार बिरसा मुंडा फुटबॉल स्टेडियम में सात मुकाबले खेले जाएंगे, जिनमें एक क्वार्टर फाइनल भी शामिल है. निखिल बरला की कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की सफलता नहीं, बल्कि इस बात का संकेत है कि अगर झारखंड में बेहतर अवसर और सुविधाएं मिलें, तो यहां से और भी कई खिलाड़ी भारतीय फुटबॉल में अपनी पहचान बना सकते हैं.
ये भी पढ़ें: डूरंड कप 2026: रेनियर फर्नांडिस की हैट्रिक, जमशेदपुर एफसी ने डिफेंडर्स एफसी को 5-0 से रौंदा
