Ismael Saibari: मैच खत्म होते ही जश्न मनाने के बजाय वह सीधे स्टेडियम की दर्शक दीर्घा की ओर दौड़ पड़े, जहां उनकी मां बैठी थीं. बेटे को अपनी ओर आते देख उनकी मां खुद को रोक नहीं सकीं और उनकी आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े. साइबारी ने मां को कसकर गले लगाया, दोनों ने एक-दूसरे का माथा चूमकर अपने वर्षों के संघर्ष, विश्वास और प्यार को बिना शब्दों के बयां कर दिया. स्टेडियम में मौजूद हजारों दर्शकों ने इस भावुक पल का तालियों से स्वागत किया, जबकि इसका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया.
जन्म से ही थी गंभीर शारीरिक समस्या
इस्माइल साइबारी का बचपन बहुत मुश्किल था. उनका जन्म पैरों की एक बीमारी के साथ हुआ था, जिसके कारण उनके पैर अंदर की तरफ मुड़े हुए थे. इस वजह से वे सामान्य बच्चों की तरह चल या खड़े नहीं हो पाते थे. बचपन में उन्हें सीधे खड़े होने की कोशिश करने के लिए हर समय विशेष डॉक्टरी जूतों और उपकरणों (ऑर्थोपेडिक ब्रेसिज़) का सहारा लेना पड़ता था.
डॉक्टरों ने कहा था- शायद कभी चल नहीं पाएंगे
साल 2024 में दिए एक इंटरव्यू में साइबारी ने बताया था कि डॉक्टरों ने उनके माता-पिता से कहा था कि संभव है वह पूरी जिंदगी सामान्य तरीके से चल ही न सकें. यह सुनना किसी भी परिवार के लिए बेहद कठिन था, लेकिन उनकी मां ने हार नहीं मानी. उन्होंने सिर्फ यही दुआ की कि उनका बेटा सामान्य और स्वस्थ जीवन जी सके. उन्हें फुटबॉलर बनाने का सपना नहीं था, बल्कि बस उसे अपने पैरों पर चलते देखना चाहती थीं.
दो साल की उम्र में रखा पहला कदम
लंबे इलाज, फिजियोथेरेपी और विशेष उपकरणों की मदद से इस्माइल ने करीब दो साल की उम्र में पहली बार अपने पैरों पर चलना शुरू किया. इसके बाद उन्हें दौड़ने और फुटबॉल खेलने का शौक लग गया. उन्होंने स्पेन के टेरेसा शहर में स्थानीय क्लबों के साथ फुटबॉल खेलना शुरू किया, जहां उनका परिवार उस समय रहता था.
आर्थिक संकट ने बदल दी जिंदगी
साल 2007 में स्पेन में आए आर्थिक संकट का असर साइबरी के परिवार पर भी पड़ा. उनके पिता सामान ढोने का काम करते थे और नौकरी जाने का खतरा था, जबकि उनकी मां बेकरी चलाती थीं. आर्थिक परेशानियों के कारण पूरा परिवार बेल्जियम जाकर बस गया. नई जगह, नई भाषा और नई शुरुआत के बावजूद साइबरी ने फुटबॉल का सपना नहीं छोड़ा.
बेटे की मेहनत बनी सफलता की कहानी
विश्व कप में मोरक्को के लिए निर्णायक पेनल्टी गोल करने के बाद मां की आंखों में आंसू सिर्फ जीत के नहीं थे. उन्हें वह छोटा बच्चा याद आ गया, जिसके बारे में कभी डॉक्टरों ने कहा था कि शायद वह चल भी नहीं पाएगा. अब वही बेटा दुनिया के सबसे बड़े फुटबॉल मंच पर अपने देश को जीत दिला रहा था.
हर माता-पिता के लिए प्रेरणा
साइबारी की कहानी यह संदेश देती है कि माता-पिता का विश्वास और लगातार साथ किसी भी मुश्किल को पार करने की ताकत देता है. उनकी मां ने कभी बड़ी उपलब्धियों की नहीं, बल्कि बेटे के सामान्य जीवन की कामना की थी. आज वही बेटा लाखों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुका है. यह कहानी बताती है कि धैर्य, विश्वास और परिवार का साथ असंभव लगने वाली परिस्थितियों को भी बदल सकता है.
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