MS Dhoni: पश्चिम बंगाल के व्यस्त खड़गपुर रेलवे स्टेशन के पास एक साधारण सी चाय की दुकान है – थॉमस टी स्टॉल. दिखने में साधारण, लेकिन इसकी कहानी असाधारण है. यहीं पर एक युवा लड़का अनगिनत घंटे बिताता था, इस बात से अनजान कि एक दिन वह दुनिया भर में ‘कैप्टन कूल’ के नाम से जाना जाएगा. उन दिनों न तो शोहरत थी और न ही दौलत. महेंद्र सिंह धोनी खड़गपुर में टिकट कलेक्टर के रूप में काम करते थे और साथ ही रेलवे में क्रिकेट के प्रति अपने जुनून को भी पूरा कर रहे थे. लंबे कामकाजी घंटों और बड़े सपनों के बीच, एक जगह हमेशा उनके साथ रहती थी – थॉमस की चाय की दुकान.
थॉमस की चाय दुकान पर घंटों बैठते थे धोनी
थॉमस के भतीजे जॉर्ज ने याद करते हुए कहा, ‘यह उनकी पसंदीदा जगह थी. वह यहां अपने दोस्तों के साथ घंटों बैठकर चाय पीते और बातें करते थे.’ थॉमस खुद धोनी के लिए चाय बनाते और परोसते थे, उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि यह शांत, दृढ़ निश्चयी युवक विश्व क्रिकेट में इतिहास रच देगा. जैसे-जैसे साल बीतते गए, धोनी वैश्विक प्रसिद्धि की सीढ़ियां चढ़ते गए. धोनी ने 2007 में भारत को उसका पहला टी20 वर्ल्ड कप खिताब दिलाया, फिर 2011 में 50 ओवर का वर्ल्ड कप और 2013 में चैंपियंस ट्रॉफी जीती.
2020 में इंटरनेशनल क्रिकेट से धोनी ने लिया संन्यास
उन्होंने 2020 में 17,266 रन बनाकर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास ले लिया. उन्होंने एक महान कप्तान और विकेटकीपर के रूप में अपने करियर का अंत किया, जिसमें सभी प्रारूपों में 16 अंतरराष्ट्रीय शतक और 800 से अधिक विकेट शामिल हैं, लेकिन खड़गपुर में, थॉमस के जीवन में एक कठिन मोड़ आया. उन्हें गंभीर ब्रेन स्ट्रोक्स आया और लगभग छह सप्ताह तक वेंटिलेटर पर रखा गया. हालांकि वे बच गए, लेकिन उनकी आवाज चली गई. जॉर्ज ने कहा, ‘वह एक बेहद मुश्किल समय था.’
धोनी ने थॉमस को पहुंचाई हर मदद
धोनी व्यक्तिगत रूप से तो नहीं आ सके, लेकिन उनका थॉमस से गहरा संबंध बना रहा. अपने मित्र रॉबिन के माध्यम से, वे नियमित रूप से थॉमस के स्वास्थ्य के बारे में पूछते रहे, उनकी रिकवरी पर नजर रखते रहे, डॉक्टरों से जानकारी लेते रहे और यह सुनिश्चित करते रहे कि जब सबसे ज्यादा जरूरत हो तब मदद मिले. परिवार के अनुसार, रॉबिन के इलाज का पूरा खर्च उठाया. जॉर्ज ने आगे कहा, ‘अगर सही समय पर मदद न मिलती, तो शायद थॉमस आज हमारे साथ न होते.’
धोनी ने थॉमस की दुकान भी टूटने से बचाई
उनका रिश्ता सिर्फ चिकित्सा सहायता से कहीं बढ़कर था. एक समय ऐसा भी आया जब चाय की दुकान पर अधिकारियों द्वारा तोड़फोड़ का खतरा मंडराने लगा, जिससे थॉमस की आजीविका का एकमात्र साधन खतरे में पड़ गया. एक बार फिर मदद मिली. रॉबिन ने धोनी से संपर्क किया, जिन्होंने रेलवे अधिकारियों से बात की. दुकान बच गई और उसे दोबारा बनाने के लिए आर्थिक सहायता भी मिली. आज थॉमस बोल नहीं सकते, लेकिन उनकी कहानी बहुत कुछ कहती है.
धोनी की तस्वीर आज भी दुकान के अंदर शान से टंगी है. ग्राहक आज भी आते हैं, सिर्फ चाय के लिए ही नहीं, बल्कि क्रिकेट से परे एक ऐसी कहानी को जानने के लिए जो विनम्रता, वफादारी और अटूट रिश्तों की कहानी है. क्योंकि कभी-कभी महानता की यात्रा एक कप चाय जैसी साधारण सी चीज से शुरू होती है.
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