ब्रिटिश एम्पायर गेम्स से कॉमनवेल्थ गेम्स तक, जानें 95 साल के सफर की कहानी

कॉमनवेल्थ गेम्स की शुरुआत किसी खिलाड़ी ने नहीं, बल्कि एक खेल पत्रकार ने की थी. 95 साल के इस सफर में जानें कैसे यह आयोजन ब्रिटिश एम्पायर गेम्स से कॉमनवेल्थ गेम्स बना और भारत ने कैसे इतिहास रचा.

कॉमनवेल्थ गेम्स दुनिया के प्रमुख बहु-खेल आयोजनों में गिने जाते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इसकी नींव किसी खिलाड़ी, कोच या प्रशासक ने नहीं, बल्कि एक स्पोर्ट्स राइटर ने रखी थी. कनाडा के खेल पत्रकार मेल्विल मार्क्स रॉबिन्सन की कल्पना से शुरू हुआ यह आयोजन आज राष्ट्रमंडल देशों के एथलीटों के लिए प्रतिष्ठा और गौरव का प्रतीक बन चुका है.

कॉमनवेल्थ गेम्स की प्रेरणा साल 1911 में लंदन में आयोजित इंटर-एम्पायर चैंपियनशिप से मानी जाती है. यह आयोजन किंग जॉर्ज पंचम के राज्याभिषेक समारोह का हिस्सा था. हालांकि इसे कॉमनवेल्थ गेम्स का आधिकारिक पहला संस्करण नहीं माना जाता, लेकिन यहीं से राष्ट्रमंडल देशों के बीच खेल प्रतियोगिता की अवधारणा ने आकार लेना शुरू किया.

एक पत्रकार की सोच ने बदली खेलों की दुनिया

साल 1928 के एम्स्टर्डम ओलंपिक से लौटने के बाद कनाडाई स्पोर्ट्स राइटर मेल्विल मार्क्स रॉबिन्सन के मन में ऐसा बहु-खेल आयोजन कराने का विचार आया, जिसमें ब्रिटिश साम्राज्य से जुड़े देशों के खिलाड़ी हिस्सा ले सकें. उनकी पहल और प्रयासों का नतीजा था कि दो साल बाद इस सपने को हकीकत का रूप मिल गया.

1930 में हुआ पहला आयोजन

16 से 23 अगस्त 1930 के बीच कनाडा के हैमिल्टन शहर में पहले ब्रिटिश एम्पायर गेम्स का आयोजन हुआ. इसमें 11 देशों के लगभग 400 खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया. उस समय प्रतियोगिता में कुल 8 खेलों के 59 इवेंट शामिल थे. खास बात यह थी कि सभी प्रतियोगिताएं व्यक्तिगत स्पर्धाएं थीं और महिलाओं के लिए केवल तैराकी का इवेंट रखा गया था.

स्कूल बना था पहला खेल गांव

आज जहां बड़े-बड़े एथलीट विलेज तैयार किए जाते हैं, वहीं पहले संस्करण में खिलाड़ियों के रहने की व्यवस्था हैमिल्टन के प्रिंस ऑफ वेल्स स्कूल में की गई थी. एक-एक क्लासरूम में दो दर्जन तक खिलाड़ियों को ठहराया गया था. सीमित संसाधनों के बावजूद आयोजन को बड़ी सफलता मिली.

भारत ने 1934 में की थी शुरुआत

1930 के पहले संस्करण में भारत हिस्सा नहीं ले पाया था क्योंकि उस समय देश ब्रिटिश शासन के अधीन था और खेल प्रशासनिक ढांचा पूरी तरह विकसित नहीं था. हालांकि 1934 में भारत ने पहली बार इन खेलों में भाग लिया और अपने डेब्यू संस्करण में ही पदक जीतकर इतिहास रच दिया.

राशिद अनवर बने पहले भारतीय पदक विजेता

कॉमनवेल्थ गेम्स में पदक जीतने वाले पहले भारतीय राशिद अनवर थे. उन्होंने 74 किलोग्राम फ्रीस्टाइल कुश्ती स्पर्धा में कांस्य पदक अपने नाम किया. यह भारतीय खेल इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है.

मिल्खा सिंह ने दिलाया पहला स्वर्ण

साल 1958 के कॉमनवेल्थ गेम्स भारत के लिए ऐतिहासिक साबित हुए. महान धावक मिल्खा सिंह ने 440 यार्ड दौड़ में स्वर्ण पदक जीतकर कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड जीतने वाले पहले भारतीय बनने का गौरव हासिल किया. यह उपलब्धि भारतीय एथलेटिक्स के इतिहास में मील का पत्थर मानी जाती है.

भारतीय महिलाओं ने भी रचा इतिहास

1958 में स्टेफनी डिसूजा और एलिजाबेथ डेवनपोर्ट कॉमनवेल्थ गेम्स में हिस्सा लेने वाली पहली भारतीय महिला एथलीट बनीं. इसके दो दशक बाद 1978 में अमी घिया और कंवल सिंह राष्ट्रमंडल खेलों में पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिलाएं बनीं.

दो बार खेलों से दूर रहा भारत

भारत ने 1962 के कॉमनवेल्थ गेम्स में चीन के साथ युद्ध के कारण हिस्सा नहीं लिया था. इसके बाद 1986 में दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद नीति के विरोध में कई देशों के साथ भारत ने भी खेलों का बहिष्कार किया था.

1978 में मिला नया नाम

शुरुआत में इन खेलों को ब्रिटिश एम्पायर गेम्स कहा जाता था. बाद में समय के साथ इसका स्वरूप बदलता गया और आखिरकार 1978 में इसे आधिकारिक रूप से कॉमनवेल्थ गेम्स नाम दिया गया, जिससे यह आज दुनिया भर में पहचाना जाता है.

खिलाड़ियों के लिए बना सफलता का मंच

कॉमनवेल्थ गेम्स ने दशकों से खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर दिया है. कई एथलीटों ने यहां शानदार प्रदर्शन के दम पर ओलंपिक और विश्व चैंपियनशिप जैसी बड़ी प्रतियोगिताओं में भी सफलता हासिल की. यही वजह है कि एक स्पोर्ट्स राइटर की कल्पना से शुरू हुआ यह आयोजन आज विश्व खेल कैलेंडर की सबसे प्रतिष्ठित प्रतियोगिताओं में शामिल है.

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Published by: Ujjawal Sinha

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