Naag Panchami 2026: नाग पंचमी का पावन पर्व हर साल सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है. साल 2026 में नाग पंचमी17 अगस्त को मनाई जाएगी. इस दिन नाग देवता की पूजा-अर्चना करने की परंपरा है. यह पर्व प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति सम्मान का प्रतीक भी माना जाता है. महाभारत और पुराणों में वर्णित सुमन्तु मुनि और राजा जनमेजय के संवाद में नाग पंचमी के महत्व का विस्तार से वर्णन मिलता है. धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक नाग देवता की पूजा करने से सर्प भय दूर होता है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है.
नाग पंचमी की पौराणिक कथा
समुद्र मंथन से निकला दिव्य घोड़ा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार देवताओं और दानवों ने मिलकर समुद्र मंथन किया. इसी मंथन से उच्चैःश्रवा नाम का एक दिव्य और बेहद सुंदर सफेद घोड़ा निकला. उसके रंग को लेकर नागों की माता कद्रू और उनकी सौत विनता के बीच विवाद हो गया.
कद्रू और विनता के बीच लगी शर्त
विनता ने कहा कि उच्चैःश्रवा पूरी तरह सफेद है, जबकि कद्रू ने दावा किया कि घोड़े की पूंछ के बाल काले हैं. दोनों के बीच शर्त लग गई कि जिसकी बात गलत साबित होगी, वह दूसरी की दासी बनकर रहेगी. कद्रू ने शर्त जीतने के लिए अपने नाग पुत्रों से कहा कि वे सूक्ष्म रूप धारण करके उच्चैःश्रवा की पूंछ से लिपट जाएं, ताकि उसके बाल काले दिखाई दें.
नाग पुत्रों ने छल करने से किया इनकार
कद्रू के नाग पुत्रों ने अपनी माता की बात मानने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा कि छल और अधर्म का सहारा लेकर शर्त जीतना उचित नहीं है. नाग पुत्रों के इस निर्णय से कद्रू बेहद क्रोधित हो गईं.
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कद्रू ने नाग पुत्रों को दिया शाप
नाग पुत्रों के इनकार से क्रोधित होकर कद्रू ने उन्हें शाप दे दिया. उन्होंने कहा कि जब पांडव वंश के राजा जनमेजय अपने पिता परीक्षित की मृत्यु का बदला लेने के लिए सर्प यज्ञ करेंगे, तब सभी नाग उस यज्ञ की अग्नि में भस्म हो जाएंगे.
नागराज वासुकि पहुंचे ब्रह्मा जी की शरण में
माता के शाप से भयभीत होकर नागराज वासुकि अन्य नागों के साथ ब्रह्मा जी की शरण में पहुंचे. उन्होंने ब्रह्मा जी से शाप से बचने का उपाय पूछा. तब ब्रह्मा जी ने उन्हें बताया कि तपस्वी ऋषि जरत्कारु से वासुकि अपनी बहन का विवाह कराएं.
ऋषि आस्तीक का हुआ जन्म
ब्रह्मा जी की आज्ञा के अनुसार ऋषि जरत्कारु का विवाह वासुकि की बहन से हुआ. दोनों के पुत्र के रूप में ऋषि आस्तीक का जन्म हुआ. आस्तीक आगे चलकर अत्यंत विद्वान और तेजस्वी ऋषि बने. उनके जन्म का उद्देश्य ही नागों को कद्रू के शाप से बचाना था.
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राजा जनमेजय ने कराया सर्प यज्ञ
समय बीतने के बाद राजा जनमेजय के पिता परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के सर्पदंश से हो गई. पिता की मृत्यु से क्रोधित होकर जनमेजय ने नागों का विनाश करने के लिए विशाल सर्प यज्ञ शुरू कराया. यज्ञ की अग्नि में मंत्रों के प्रभाव से एक-एक करके नाग खिंचे चले आने लगे और अग्नि में भस्म होने लगे. इससे नागों में भय फैल गया.
आस्तीक मुनि ने रुकवाया सर्प यज्ञ
जब नागों का विनाश होने लगा, तब ऋषि आस्तीक राजा जनमेजय के यज्ञ स्थल पर पहुंचे. उन्होंने अपनी विद्वता और मधुर वाणी से राजा को प्रसन्न किया. राजा ने आस्तीक को वरदान मांगने के लिए कहा. आस्तीक मुनि ने राजा से सर्प यज्ञ रोकने का वरदान मांग लिया. राजा जनमेजय अपने वचन से पीछे नहीं हटे और उन्होंने यज्ञ बंद कर दिया. इस तरह आस्तीक मुनि ने असंख्य नागों के प्राण बचा लिए.
नाग पंचमी की मान्यता
धार्मिक मान्यता के अनुसार, जिस दिन आस्तीक मुनि ने नागों को सर्प यज्ञ की अग्नि से बचाया, वह सावन शुक्ल पंचमी का दिन था. इसी वजह से नाग पंचमी के दिन नाग देवता की पूजा करने की परंपरा मानी जाती है. मान्यता है कि इस दिन नाग देवता की श्रद्धापूर्वक पूजा करने से सर्प भय से रक्षा होती है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है. नाग पंचमी प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति सम्मान का संदेश देने वाला पर्व भी माना जाता है.
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