Hapamuni Mahamaya Temple: हापामुनी मंदिर मां महामाया का अत्यंत प्राचीन और पवित्र मंदिर माना जाता है. लोहरदगा मार्ग पर स्थित यह मंदिर प्राकृतिक हरियाली और शांत वातावरण के बीच श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति का अद्भुत अनुभव कराता है. यहां आने वाले भक्त मां महामाया के चरणों में अपनी मनोकामनाएं अर्पित करते हैं और उनकी कृपा प्राप्त करने की कामना करते हैं.
905 ईस्वी में हुआ था मंदिर का निर्माण
हापामुनी महामाया मंदिर का निर्माण वर्ष 908 ईस्वी में नागवंशी शासक गजघंट राय द्वारा कराया गया था. बाद में वर्ष 1391 ईस्वी में राजा मोहन राय के पुत्र राजा शिवदास ने मंदिर परिसर में भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित कराई. यह मंदिर गुमला मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और झारखंड की प्राचीन धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है.
आग पर नंगे पांव चलकर निभाई जाती है आस्था
हापामुनी मंदिर में रामनवमी के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन होता है. इसके अगले दिन से प्रसिद्ध मंडा पूजा की शुरुआत होती है, जिसमें विशाल मेले का आयोजन भी किया जाता है. इस अनूठी परंपरा के दौरान श्रद्धालु नंगे पांव जलते अंगारों पर चलकर अपनी श्रद्धा और विश्वास का परिचय देते हैं. इस धार्मिक आयोजन में दूर-दूर से हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं.
क्यों ढंककर रखी जाती है मां महामाया की मूर्ति?
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार मां महामाया की प्रतिमा सदैव वस्त्र से ढंककर रखी जाती है. ऐसी लोकमान्यता है कि यदि कोई व्यक्ति मां की प्रतिमा को खुले नेत्रों से देख ले, तो उसकी दृष्टि चली जाती है. इसी कारण मंदिर के पुजारी भी जब मां का वस्त्र बदलते हैं, तो अपनी आंखों पर काली पट्टी बांध लेते हैं. हालांकि इस मान्यता और मंदिर की स्थापना को लेकर समय-समय पर अलग-अलग मत भी सामने आते रहे हैं.
मां महामाया की आज्ञा और चमत्कारिक कथा
हापामुनी मंदिर का इतिहास लरका आंदोलन से भी जुड़ा हुआ माना जाता है. जनश्रुति के अनुसार, जब बरजू राम मंदिर में मां महामाया की पूजा कर रहे थे, तभी बाहरी आक्रमणकारियों ने गांव पर हमला कर उनकी पत्नी और बच्चे की हत्या कर दी. यह दुखद समाचार उनके सहयोगी राधो राम ने उन्हें दिया. इसका बदला लेने के लिए कहानी के अनुसार राधो राम ने अकेले ही आक्रमणकारियों का सामना किया. युद्ध के दौरान मां ने उन्हें चेतावनी दी कि यदि वे पीछे मुड़कर देखेंगे तो उनका सिर धड़ से अलग हो जाएगा. राधो राम वीरतापूर्वक लड़ते रहे, लेकिन जैसे ही उन्होंने पीछे मुड़कर देखा, उनका सिर धड़ से अलग हो गया. आज भी जिस स्थान पर राधो राम पूजा किया करते थे, वहां उनका और बरजू राम का समाधि स्थल मौजूद है, जिसे श्रद्धालु श्रद्धापूर्वक नमन करते हैं.
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खपड़े का मुख्य मंदिर और अनेक देवी-देवताओं की प्रतिमाएं
हापामुनी का मुख्य मंदिर आज भी पारंपरिक खपड़े (टाइल) की संरचना में सुरक्षित है. मंदिर परिसर में विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह स्थल एक महत्वपूर्ण तांत्रिक पीठ भी माना जाता है, जहां साधना और शक्ति उपासना का विशेष महत्व है.
झारखंड की आध्यात्मिक विरासत का अनमोल केंद्र
हापामुनी महामाया मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि झारखंड की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक पहचान का जीवंत प्रतीक है. प्राचीन इतिहास, रहस्यमयी मान्यताएं, लोककथाएं और अनूठी धार्मिक परंपराएं इस मंदिर को देशभर के श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनाती हैं. यहां पहुंचकर भक्त मां महामाया की दिव्य उपस्थिति और अलौकिक शांति का अनुभव करते हैं.
