येनपक कथा अपने नाम के अनुरूप अनोखा कहानी संग्रह, कविता से कहानी की ओर अनामिका अनु की सशक्त उपस्थिति

Book Review : इस कहानी संग्रह की खासियत यह भी है कि इसमें देशज शब्दों का बखूबी प्रयोग हुआ है. भुकभुकाना, जाफरी, नकमुनिया. बिहार की स्थानीय भाषा के शब्दों का प्रयोग भी कहानी संग्रह में दिखता है, जो यह बताने के लिए काफी है कि अनामिका अनु का संबंध बिहार से है.

Book Review : ‘आसक्त की प्रेमिकाएं अपना अंतिम प्रेम जीती हैं और फिर प्रेम, प्रीत, इश्क, मुहब्बत जैसे असंख्य शब्दों को अपसे हाथ से सदा के लिए किसी निष्ठुर माटी में दफन कर देती हैं.’

‘मुझे आपमें और बेटी में एक को चुनना था, मैंने बेटी को चुना. मैंने झूठे अहंकार और गैरबराबरी की वकालत करती सामाजिक मान्यताओं के बदले नई सोच, समानता और मनुष्यता को चुना. स्वीटी का पति आपके लिए मुसलमान है मगर मेरे और स्वीटी के लिए एक मनुष्य.’

‘दृगा लिखती है.

दृगा गांव आई है. गांव, अपने पति के घर

दिन भर बैठे–बैठे किताब पलटती है. कलम तोड़ती है, कागज काला करती है. कामचोर कहीं की…

सास कहे. पति सुन बैठ–बैठ मुस्काए’

‘उसे हर स्त्री से प्रेम था.

हर स्त्री को उससे छांव मोलना पसंद था.

हर स्त्री को उसके नाम की उलाहना सुनना पसंद था.

हर स्त्री बारिश के आने से पहले उससे मिलना चाहती थी.’

ये चार रोचक प्रसंग चार कहानियों से लिए गए हैं. कहानियों के इन पैराग्राफ पर नजर डालें तो आपका महसूस होगा कि कथाकार ने कितनी साफगोई से इसे बुना है. हर शब्द महत्वपूर्ण है और दिल–दिमाग को झकझोरने वाला. कहीं से भी कोई अतिरिक्त शब्द नहीं जितने की जरूरत है उतने ही हैं. ये सभी प्रसंग युवा कथाकार और कवयित्री अनामिका अनु के नए कथा संग्रह ‘येनपक कथा और अन्य कहानियांं’ से लिया गया है.

अनामिका अनु का पहला कहानी संग्रह

मैं आपको यह बताना चाहती हूं कि अनामिका अनु की यह पहली किताब है और इस पहली किताब में ही वो इतना प्रभाव छोड़ती हैं कि आगे उन्हें पढ़ने का इंतजार रहेगा. चूंकि अनामिका अनु एक कवयित्री हैं, तो उनकी कई कहानियां कविताओं सी लगती हैं. जैसे दृगा लिखती है. अनामिका अनु ने पुस्तक के प्रस्तावना में बताया है कि उनके लिए यह कहानी संग्रह अधूरी पंक्तियों और चूक गए शब्दों की कहानियां है. निसंदेह अधूरी पंक्तियां मारक होती हैं और अनामिका की कहानियां इस बात को साबित करती हैं.

अनामिका का यह पहला कथा संग्रह उन्हें कथाकारों की भीड़ में अलग से खड़ा करता है. उनकी कहानियों के संवाद में जो पैनापन है, वह झकझोरता है. सच के इतने करीब कि लगता है अरे, मेरा तो इससे साक्षात्कार हुआ है. चाहे बेटियों से छुपाकर बहू–बेटों को दूध पिलाना हो, या स्वीटी के लिए मां–बाप का प्रेम. सबकुछ अकाट्‌य सत्य.

कहानियों में देशज शब्दों का भरपूर प्रयोग

इस कहानी संग्रह की खासियत यह भी है कि इसमें देशज शब्दों का बखूबी प्रयोग हुआ है. भुकभुकाना, जाफरी, नकमुनिया. बिहार की स्थानीय भाषा के शब्दों का प्रयोग भी कहानी संग्रह में दिखता है, जो यह बताने के लिए काफी है कि अनामिका अनु का संबंध बिहार से है. 

येनपक कथा, जिसे टाइटल स्टोरी कहा जा सकता है, वह लोककथा के तर्ज पर लिखा गया है और दिल को छूता है. जिस बारीकी से लेखिका ने कहानियों को परोसा है, कहना मुश्किल लगता है कि यह उनका पहला संग्रह है. कहानियों में नदी से प्रवाह है, जो पढ़ने वाले को बहाकर प्रारंभ से अंत तक लेकर जाता है. इस कहानी संग्रह के लिए अनामिका अनु साधुवाद की पात्र हैं. कुल 18 कहानियां इस संग्रह में हैं.

अनामिका अनु बिहार के मुजफ्फरपुर जन्मी हैं और केरल में रहती हैं. इन्हें 2020 में भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार भी मिल चुका है. इंजीकरी और यारेख इनकी प्रमुख रचनाएं हैं. मंजुल पब्लिशिंग हाउस ने इसका प्रकाशन किया है. किताब की साइज हाथ में फिट बैठती है और फाॅन्ट भी सुंदर है, जो पढ़ने का आनंद देते हैं. बीच–बीच में सजीव रेखाचित्र का प्रयोग भी सुंदर है. कुल मिलाकर येनपक कथा अपने नाम के अनुरूप अनोखा संग्रह है और इसे पढ़ा जाना चाहिए. 

ये भी पढ़ें : भारत को खो देने के बयान के बाद, ट्रंप ने दी मोदी के साथ दोस्ती की दुहाई, अमेरिकी एनालिस्ट उनके रवैये से चिंतित

प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी

लेखक के बारे में

By Rajneesh anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

Read More
ePaper

अपने दैनिक समाचार अनुभव को और बेहतरीन बनाएं

सिर्फ ₹399 ₹149

एक साल के लिए

आज ही सब्सक्राइब करें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >