AI की दुनिया में महिलाओं की आवाज क्यों जरूरी है?

एल्गोरिदम भी समाज के पूर्वाग्रह सीखते हैं. इसलिए एआई में महिलाओं की भागीदारी केवल समानता का सवाल नहीं, बल्कि भरोसेमंद और जिम्मेदार तकनीक की शर्त है. भारत के सामने अवसर है कि वह दुनिया को समावेशी एआई शासन का नया मॉडल दे.

कल्पना कीजिए कि आप नौकरी के लिए आवेदन करते हैं.

योग्यता पूरी है, अनुभव भी है, लेकिन आपका आवेदन किसी इंसान ने नहीं, बल्कि एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित प्रणाली ने खारिज कर दिया.

कारण? उस एल्गोरिदम ने अपने प्रशिक्षण के दौरान ऐसे आंकड़ों से सीखा था, जिनमें वर्षों से पुरुषों को नेतृत्व की भूमिकाओं में अधिक महत्व दिया गया था.

या फिर एक महिला को बैंक से कर्ज चाहिए. एआई उसके आवेदन का जोखिम अधिक मान लेता है, क्योंकि उसके प्रशिक्षण डेटा में महिलाओं के आर्थिक अवसर पहले से सीमित रहे हैं.

ऐसी घटनाएं अब केवल कल्पना नहीं हैं. दुनिया के कई देशों में भर्ती, स्वास्थ्य सेवाओं, ऋण वितरण और सार्वजनिक सेवाओं में एआई आधारित निर्णयों में लैंगिक पक्षपात के उदाहरण सामने आ चुके हैं.

यही कारण है कि आज वैश्विक राजनीति में एक नया प्रश्न तेजी से उभर रहा है- क्या एआई केवल तकनीक का विषय है, या लोकतंत्र, समानता और वैश्विक न्याय का भी?

AI अब केवल तकनीक नहीं, Geopolitics का नया मोर्चा है

बीते कुछ वर्षों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने दुनिया की राजनीति को बदलना शुरू कर दिया है.

जिस तरह बीसवीं सदी में तेल, परमाणु तकनीक और अंतरिक्ष शक्ति वैश्विक प्रभाव का आधार बने, उसी तरह इक्कीसवीं सदी में एआई नई रणनीतिक शक्ति के रूप में उभर रहा है.

आज अमेरिका, चीन, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, जापान और भारत सभी अपनी-अपनी एआई रणनीतियां तैयार कर रहे हैं.

यह प्रतिस्पर्धा केवल बेहतर चैटबॉट या तेज कंप्यूटर बनाने की नहीं है. यह आर्थिक प्रतिस्पर्धा, राष्ट्रीय सुरक्षा, डेटा संप्रभुता, वैश्विक मानकों और भविष्य की विश्व व्यवस्था को आकार देने की होड़ भी है.

लेकिन इस पूरी बहस के बीच एक महत्वपूर्ण प्रश्न अक्सर पीछे छूट जाता है-

आखिर एआई बना कौन रहा है?

और उससे भी बड़ा प्रश्न-

उसकी सोच किन अनुभवों से आकार ले रही है?

तकनीक neutral नहीं होती

अक्सर कहा जाता है कि मशीनों में भावनाएं नहीं होतीं, इसलिए वे निष्पक्ष होती हैं.

लेकिन वास्तविकता इससे अलग है.

AI अपने फैसले स्वयं नहीं बनाता. वह उन्हीं आंकड़ों से सीखता है, जो इंसानों ने तैयार किए हैं.

यदि डेटा में समाज के पुराने भेदभाव मौजूद हैं, तो एआई भी वही भेदभाव दोहराने लगता है.

इसीलिए विशेषज्ञ कहते हैं कि एआई का सबसे बड़ा खतरा उसका बुद्धिमान होना नहीं, बल्कि उसका पक्षपाती होना है.

महिलाओं की कम भागीदारी क्यों चिंता का विषय है?

दुनिया भर में एआई अनुसंधान, तकनीकी कंपनियों और नीति निर्माण में महिलाओं की भागीदारी अभी भी सीमित है.

तकनीकी शिक्षा से लेकर शोध प्रयोगशालाओं और कॉरपोरेट नेतृत्व तक, पुरुषों का वर्चस्व अधिक दिखाई देता है.

इसका सीधा असर एआई प्रणालियों पर पड़ता है.

यदि डिजाइन करने वाले, डेटा तैयार करने वाले और नीति बनाने वाले लगभग एक जैसी सामाजिक पृष्ठभूमि से आते हैं, तो उनके द्वारा विकसित तकनीक भी अनजाने में उसी दृष्टिकोण को आगे बढ़ाती है.

यानी समस्या केवल प्रतिनिधित्व की नहीं, बल्कि तकनीक की गुणवत्ता की भी है.

Inclusion केवल Social justice नहीं, बेहतर तकनीक की शर्त है

कई लोग लैंगिक समानता को केवल सामाजिक या नैतिक मुद्दा मानते हैं.

लेकिन AI के मामले में यह तकनीकी आवश्यकता भी है.

यदि किसी तकनीक का उपयोग करोड़ों लोग करेंगे, तो उसके निर्माण में भी समाज की विविधता दिखाई देनी चाहिए.

महिलाओं, विभिन्न सामाजिक समूहों, भाषाई समुदायों और अलग-अलग क्षेत्रों की भागीदारी AI को अधिक विश्वसनीय और उपयोगी बनाती है.

इसीलिए आज वैश्विक स्तर पर समावेश को जिम्मेदार AI की आधारशिला माना जा रहा है.

दुनिया किस दिशा में बढ़ रही है?

वैश्विक स्तर पर कई संस्थाएं इस विषय को गंभीरता से उठा रही हैं.

OECD के एआई सिद्धांत पारदर्शिता, जवाबदेही और समावेशिता को भरोसेमंद एआई की बुनियाद मानते हैं.

UNESCO की AI नैतिकता संबंधी सिफारिशें भी स्पष्ट करती हैं कि लैंगिक समानता तकनीकी विकास से अलग कोई सामाजिक एजेंडा नहीं, बल्कि नैतिक एआई की अनिवार्य शर्त है.

दुनिया धीरे-धीरे यह स्वीकार कर रही है कि बेहतर एआई वही होगा, जिसमें अधिक विविध आवाजें शामिल हों.

भारत के सामने एक बड़ा अवसर

भारत आज दुनिया की सबसे बड़ी डिजिटल अर्थव्यवस्थाओं में से एक है.

डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, आधार, यूपीआई, डिजिटल भुगतान और डिजिटल शासन के अनुभवों ने भारत को वैश्विक मंच पर अलग पहचान दी है.

अब AI के क्षेत्र में भी भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है.

सरकार का AI for All दृष्टिकोण इसी सोच को आगे बढ़ाता है कि AI केवल बड़े उद्योगों तक सीमित न रहे, बल्कि विकास का माध्यम बने.

लेकिन यदि भारत वास्तव में वैश्विक AI नेतृत्व चाहता है, तो उसे केवल तकनीकी क्षमता नहीं, बल्कि नैतिक नेतृत्व भी दिखाना होगा.

भारत की वैश्विक भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत आज यूरोप, अमेरिका, इंडो-पैसिफिक और ग्लोबल साउथ के साथ एआई सहयोग को लगातार मजबूत कर रहा है.

यह केवल तकनीकी साझेदारी नहीं है.

यह भविष्य की वैश्विक एआई व्यवस्था को आकार देने की प्रक्रिया भी है.

ऐसे में भारत के पास अवसर है कि वह विकासशील देशों की आवाज को सामने लाए.

भारत यह बता सकता है कि एआई केवल विकसित देशों की जरूरतों के हिसाब से नहीं, बल्कि विविध सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप भी विकसित होना चाहिए.

भारत को क्या करना चाहिए?

यदि भारत समावेशी एआई शासन का नेतृत्व करना चाहता है, तो कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं.

  • सबसे पहले, एआई नीति निर्माण में महिलाओं, सामाजिक वैज्ञानिकों, विधि विशेषज्ञों और तकनीकी विशेषज्ञों की समान भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी.
  • दूसरे, विश्वविद्यालयों में एआई नैतिकता, सार्वजनिक नीति और जेंडर अध्ययन को साथ जोड़ने वाले अंतर्विषयी केंद्र विकसित किए जाने चाहिए.
  • तीसरे, एआई अनुसंधान परियोजनाओं में यह मूल्यांकन भी शामिल होना चाहिए कि किसी तकनीक का महिलाओं और कमजोर समूहों पर क्या प्रभाव पड़ेगा.
  • चौथे, भारतीय शोध संस्थानों और उद्योग जगत को मिलकर ऐसे डेटासेट विकसित करने चाहिए जो भारत की भाषाई, सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता को सही ढंग से प्रतिबिंबित करें.
  • और सबसे महत्वपूर्ण, भारत को अपनी वैश्विक एआई साझेदारियों में समावेश और लैंगिक न्याय को केवल पूरक विषय नहीं, बल्कि मुख्य नीति सिद्धांत बनाना होगा.

भविष्य केवल स्मार्ट AI का नहीं, न्यायपूर्ण AI का होगा

इतिहास बताता है कि हर नई तकनीकी क्रांति अपने साथ असमानताओं को भी जन्म देती है.

औद्योगिक क्रांति ने उत्पादन बढ़ाया, लेकिन श्रमिक अधिकारों की नई लड़ाई भी शुरू हुई.

डिजिटल क्रांति ने सूचना का लोकतंत्रीकरण किया, लेकिन डिजिटल विभाजन भी पैदा किया.

अब एआई क्रांति के सामने भी वही चुनौती है.

यदि इसे केवल तकनीकी दक्षता के आधार पर विकसित किया गया, तो यह पुराने सामाजिक भेदभाव को और गहरा कर सकती है.

लेकिन यदि इसे विविधता, समानता और उत्तरदायित्व के साथ विकसित किया गया, तो यह मानव विकास का सबसे बड़ा साधन भी बन सकती है.


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लेखक के बारे में

By अचल प्रियदर्शी

अचल प्रियदर्शी (Achal Priyadarshy) अंतरराष्ट्रीय संबंधों, इंडिक एवं इंडीजीनस अध्ययन के जानकार, शिक्षाविद् और 32 पुस्तकों के लेखक हैं.

उन्होंने केंद्रीय मंत्री के राजनीतिक सहायक के तौर पर काम किया है, तथा ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (TRI)- रांची और झारखंड सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग (DoFECC) के साथ भी कार्य किया है.

उन्होंने सैकड़ों UPSC अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन किया है, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों व समसामयिक विषयों पर उनके विश्लेषणात्मक लेख नियमित रूप से UPSC-केंद्रित पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं.

साहित्य और जनजातीय इतिहास में उनके योगदान को मान्यता देते हुए उन्हें वर्ष 2025 में आयोजित जमशेदपुर लिटरेचर फेस्टिवल के उद्घाटन संस्करण में उनकी पुस्तक Tribal Bravehearts के लिए शब्द-शिल्पी सम्मान से सम्मानित किया गया. शैक्षणिक रूप से, उन्होंने हार्वर्ड डिविनिटी स्कूल से Religion, Peace and Conflict विषय में अध्ययन किया है.

ये उनकी कुछ लोकप्रिय किताबें हैं;

  1. Pakistan State, Armed Influenconomy (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  2. बिहार जनादेश 2025 (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  3. International Relations: UPSC & State Civil Services Examinations (Oakbridge Publishing) (2026)

  4. ब्रांड हेमंत (स्वतंत्र प्रकाशन) (2025)

  5. झारखण्ड की जनजाति समाज और समय का संकट (प्रकाशन संसथान) (2026)

  6. जनजातीय शूरवीर (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  7. Know Your State: Jharkhand (अरिहंत प्रकाशन) (2025)

  8. उत्तर प्रदेश सामान्य ज्ञान (क्राउन पुब्लिकेशन्स) (2024)

  9. बिहार सामान्य ज्ञान (उपकार प्रकाशन) (2024)

  10. International Relations for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)

  11. Internal Security & Disaster Management for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)

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