क्या है वक्फ बाय यूजर, जिसको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा सवाल?

Supreme Court : सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि क्या वे अब हिंदू मंदिरों के ट्रस्ट में मुसलमानों को शामिल करेंगे, साथ ही कोर्ट ने यह भी पूछा है कि क्या सरकार वक्फ बाय यूजर के प्रावधान को समाप्त कर रही है? गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट वक्फ अधिनियम पर फिर सुनवाई करेगा, बुधवार की सुनवाई में कोर्ट ने किसी भी तरह के अंतरिम राहत को मंजूरी नहीं दी है. याचिकाकर्ताओं के वकील ने कोर्ट के सामने कहा है कि केंद्र सरकार वक्फ अधिनियम में जो संशोधन लेकर आई है वो आर्टिकल 26 का उल्लंघन है.

Supreme Court : वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 को चुनौती देने वाली लगभग 100 याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस भेजा है. याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से अविलंब अंतरिम राहत देने की मांग की थी, जिसे कोर्ट ने स्वीकार नहीं किया और कानून के संचालन पर रोक लगाने से मना कर दिया है. इसका अर्थ यह हुआ कि कोर्ट ने अपीलों पर सुनवाई करने से तो इनकार नहीं किया, लेकिन कानून पर रोक लगाने से भी मना कर दिया है.

कोर्ट ने किन मुद्दों पर केंद्र सरकार से मांगा है जवाब?

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह पूछा है कि वक्फ बोर्ड में दो गैर मुसलमानों को शामिल करने की बात कही गई है, तो क्या हिंदू मंदिरों के ट्रस्ट में सरकार मुसलमानों को शामिल करेगी? वक्फ (संशोधन) अधिनियम में यह प्रावधान है कि 22 नियुक्त सदस्यों में से दो गैर मुसलमान होंगे, वहीं राज्य के बोर्ड में भी दो गैर मुसलमानों को नियुक्त करने की बात कही गई है. सुप्रीम कोर्ट में वक्फ बाय यूजर का मसला भी उठा, जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर आप वक्फ बाय यूजर को हटा रहे हैं, तो यह एक मसला है. देश में अधिकतर वक्फ मस्जिदें 14वीं और 15वीं सदी में बनी हैं और अब उनका डीड मांगना सही नहीं होगा, क्योंकि वह किसी के पास मौजूद नहीं होगा. कोर्ट ने इन्हीं दो मसले पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है.

क्या है वक्फ बाय यूजर?

वक्फ बाय यूजर के अनुसार अगर कोई व्यक्ति या संस्था लंबे समय से किसी संपत्ति का उपयोग कर रही है, तो उसे उक्त संपत्ति को वक्फ करने का अधिकार है. पुराने वक्फ के नियम अनुसार यही व्यवस्था लागू थी, लेकिन 2025 के संशोधन में इस प्रावधान यानी वक्फ बाय यूजर को हटा दिया गया है. इसका मतलब यह है कि अब इस्तेमाल के आधार पर कोई संपत्ति वक्फ नहीं मानी जाएगी. इस मसले पर कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है. वक्फ संशोधन अधिनियम पर अब कोर्ट में फिर सुनवाई होगी.

5 अप्रैल को राष्ट्रपति ने वक्फ संशोधन अधिनियम को मंजूरी दी

वक्फ संशोधन अधिनियम को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने पांच अप्रैल को मंजूरी दी थी. उससे पहले इसे लोकसभा और राज्यसभा से पारित किया गया था. विधेयक के पारित होते ही कांग्रेस पार्टी, एआईएमआईएम नेता और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर् की ओर से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया था और इसे मौलिक अधिकारों का हनन बताया गया था. जिसके जवाब में केंद्र ने 8 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में एक कैविएट दायर किया, जिसके तहत कोर्ट से यह अनुरोध किया गया है किसी भी तरह आदेश जारी करने से पहले सरकार का पक्ष सुना जाए.

Also Read : क्या होगा वक्फ एक्ट का भविष्य ? जब संविधान में धार्मिक समुदायों को मिले हैं ये अधिकार…

क्या सुप्रीम कोर्ट वक्फ बिल को कर सकता है निरस्त, समझें संविधान में क्या है प्रावधान?

क्या है ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, कैसे करता है काम?

हिंदू और मुसलमान के बीच भारत में नफरत की मूल वजह क्या है?

विभिन्न विषयों पर एक्सप्लेनर पढ़ने के लिए क्लिक करें

प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी

लेखक के बारे में

By Rajneesh anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

Read More
ePaper

अपने दैनिक समाचार अनुभव को और बेहतरीन बनाएं

सिर्फ ₹399 ₹149

एक साल के लिए

आज ही सब्सक्राइब करें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >