सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट के बाद क्या राष्ट्रपति 3 महीने के अंदर किसी बिल को पास करने के लिए बाध्य होंगे?

President Pocket Veto : भारतीय संविधान के अनुसार राष्ट्रपति राष्ट्र का प्रमुख होता है, उसके पास कई तरह के अधिकार हैं. हालांकि भारत का राष्ट्रपति अमेरिका के राष्ट्रपति की तरह मजबूत स्थिति में नहीं होता है और प्रधानमंत्री की सलाह पर काम करता है, तब भी उनके विधायी अधिकार उन्हें महत्वपूर्ण बनाते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति के उन्हीं विधायी अधिकारों में से एक जिसे ‘पॉकेट वीटो’ कहा जा रहा है, उसपर निर्णय दिया है. पॉकेट वीटो का अर्थ है किसी विधेयक को अनिश्चतकाल तक के लिए लंबित रखना.

President Pocket Veto : ‘पॉकेट वीटो’ यह शब्द सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के बाद से चर्चा में है, जिसमें यह कहा गया है कि राष्ट्रपति किसी बिल को अनिश्चित काल तक के लिए रोककर नहीं रख सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा है कि राष्ट्रपति अधिकतम तीन महीने के भीतर ही किसी बिल पर अपनी राय सरकार को बता दें. सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला तमिलनाडु सरकार द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है. तमिलनाडु सरकार ने राज्यपाल आरएन रवि के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई है. तमिलनाडु सरकार का कहना है कि राज्यपाल ने विधानसभा से पारित 10 विधेयकों को लंबित रखा हुआ है. दरअसल राज्यपाल ने उन विधेयकों को राष्ट्रपति के पास भेजा हुआ है. कोर्ट ने अपने फैसले में यह मजबूती से कहा है कि राज्यपाल और राष्ट्रपति जैसे पदों की भूमिका पारदर्शी होनी चाहिए, साथ ही अगर संविधान से जुड़ा कोई मसला हो तो उसकी समुचित व्याख्या के लिए सुप्रीम कोर्ट से सलाह ली जानी चाहिए, इससे लोकतंत्र मजबूत होता है.

तमिलनाडु के राज्यपाल ने राष्ट्रपति के पास विधेयक क्यों भेजे?

तमिलनाडु के राज्यपाल ने 10 वि्धेयकों को राष्ट्रपति के पास विचार के लिए इसलिए भेजा है क्योंकि उन्हें बिल पर कुछ आपत्तियां थीं. राज्यपाल ने उनकी संवैधानिकता की जांच के लिए उन्हें राष्ट्रपति के पास भेजा, संविधान का अनुच्छेद 200 राज्यपाल को यह अधिकार देता है. जब राज्यपाल बिल को राष्ट्रपति के पास भेज देते हैं तो उस बिल पर निर्णय करने का अधिकार राष्ट्रपति का होता है. चूंकि राष्ट्रपति ने अबतक उन 10 विधेयक को निर्णय नहीं लिया है इसलिए यह कहा जा रहा है कि राष्ट्रपति ने उन विधेयक पर पॉकेट वीटो लगा दिया है.

क्या है राष्ट्रपति का ‘पॉकेट वीटो’

भारतीय संविधान में राष्ट्रपति के पास जो अधिकार हैं, उनके लिए वीटो शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है, लेकिन जब भी कोई बिल राष्ट्रपति के पास स्वीकृति के लिए आता है, तो राष्ट्रपति के पास तीन तरह के विकल्प मौजूद है, जिसके तहत राष्ट्रपति बिल पर निर्णय सुनाते हैं.


अनुच्छेद 111 के अनुसार विकल्प

  1. बिल को स्वीकार कर सकते हैं, जिससे वह कानून बन जाता है.
  2. बिल को अस्वीकार कर सकते हैं, जिससे बिल निरस्त हो जाता है.
  3. बिल को पुनर्विचार के लिए भेज सकते हैं, अगर बिल दोबारा आता है, तो उसे स्वीकार करना अनिवार्य है. धन विधेयक के साथ यह स्थिति नहीं है, क्योंकि धन विधेयक राष्ट्रपति की सिफारिश पर ही लोकसभा में पेश होता है.

अनुच्छेद 200 और 201 के अनुसार राष्ट्रपति के पास विकल्प

  1. बिल को स्वीकार कर सकते हैं
  2. बिल को अस्वीकार कर सकते हैं
  3. विचार के लिए विधानमंडल को वापस भेज सकते हैं, या पॉकेट वीटो का प्रयोग कर सकते हैं

पॉकेट वीटो : पॉकेट वीटो राष्ट्रपति का वह अधिकार है, जिसके तहत राष्ट्रपति किसी विधेयक को अनिश्चितकाल तक के लिए लंबित रख सकते हैं. चूंकि भारतीय संविधान में यह वर्णित नहीं है कि राष्ट्रपति को कितने दिनों के अंदर विधेयक पर निर्णय लेना है इसलिए कभी-कभी पॉकेट वीटो राष्ट्रपति की अस्वीकृति की तरह काम करता है.

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों की अनुच्छेद 143 की बात

सुप्रीम कोर्ट ने पॉकेट वीटो के संबंध में फैसला लेते हुए कहा कि यह जरूरी नहीं है कि राष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट से राय मांगे, लेकिन संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत अगर किसी बिल में असंवैधानिकता जैसा कुछ विषय हो तो राष्ट्रपति को सुप्रीम कोर्ट से राय मांगनी चाहिए, ताकि संविधान की व्याख्या सही ढंग से हो पाए. कार्यपालिका के पास संविधान की व्याख्या का अधिकार नहीं है, यह अधिकार सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के पास है.

सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट के बाद अब आगे क्या?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने जजमेंट में यह कहा है कि किसी भी बिल को अनिश्चितकाल तक के लिए लटकाया नहीं जा सकता है और यह कहा है कि राष्ट्रपति को किसी भी बिल पर तीन महीने के अंदर निर्णय कर लेना चाहिए. इस संबंध में विधायी मामलों के जानकार अयोध्या नाथ मिश्र ने बताया कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा है, तो कुछ सोचकर ही कहा है. भारतीय संविधान ने राष्ट्रपति को सर्वोच्च माना है. इस लिहाज से सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय लंबी बहस को जन्म देता है. यह कोई ऐसा विषय नहीं है, जिसपर एक मिनट में राय दे दी जाए. कोर्ट का पूरा जजमेंट पढ़कर समझना होगा. भारतीय संविधान विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के अधिकार स्पष्टत: विभाजित हैं, इसलिए कोई भी निर्णय सोच-विचार कर करना चाहिए. जल्दी में कुछ भी कहना एकतरफा बात होगी. वहीं प्रसिद्ध कानूनविद्‌ फैजान मुस्तफा का कहना है कि आज की स्थिति में यही कानून है, इसलिए राष्ट्रपति को इसका अनुपालन करना होगा.

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By Rajneesh anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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