Pacific : चीन के खिलाफ, भारत के लिए क्यों हैं Australia और New Zealand खास

क्या चीन को घेरने के लिए भारत इंडो-पैसिफिक में नई रणनीति बना रहा है? जानिए क्यों प्रधानमंत्री मोदी का ऑस्ट्रेलिया, और न्यूजीलैंड दौरा भारत की समुद्री सुरक्षा, क्वाड, व्यापार और चीन की बढ़ती चुनौती के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है.

Pacific : नीला सागर, सफेद रेत और छोटे छोटे द्वीपों का समूह 

Pacific : भारत से बहुत दूर, नीले-नीले प्रशांत महासागर में कई छोटे-छोटे सुंदर द्वीप हैं. इन द्वीपों पर रहने वाले लोग मछली पकड़ते हैं, नारियल उगाते हैं और समुद्र के साथ अपना जीवन बिताते हैं. लेकिन इन द्वीपों के सामने एक बड़ी चुनौती है. कभी चक्रवात आते हैं, कभी समुद्र का पानी बढ़ता है और कभी सड़कों, अस्पतालों और बंदरगाहों के लिए पैसों की कमी हो जाती है.

इसी कारण उन्हें दूसरे देशों की मदद की जरूरत पड़ती है.

कुछ साल पहले तक इन द्वीपों की सबसे ज़्यादा मदद ऑस्ट्रेलिया करता था. वह उनका पड़ोसी भी है और लंबे समय से उनके साथ काम करता आया है.

फिर इन छोटे द्वीपों के बीच हुई चीन की एंट्री 

फिर एक दिन एक नया बड़ा देश, चीन, भी इन द्वीपों की ओर आने लगा. उसने कहा, "हम सड़कें बनाएंगे, बंदरगाह बनाएंगे, इमारतें बनाएंगे और विकास के लिए पैसा देंगे."

छोटे द्वीपों ने सोचा, "अगर कोई हमारी मदद करना चाहता है, तो यह अच्छी बात है."

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई.

जब ऑस्ट्रेलिया ने समझी दूर की बात 

धीरे-धीरे ऑस्ट्रेलिया को चिंता होने लगी. उसे लगा कि चीन सिर्फ विकास नहीं करना चाहता, बल्कि इस इलाके में अपना प्रभाव भी बढ़ाना चाहता है. 2018 के आसपास ऐसी खबरें आईं कि वानुआतु (Vanuatu) में चीन शायद एक सैन्य अड्डा बनाना चाहता है. इससे ऑस्ट्रेलिया और उसके मित्र देशों की चिंता बढ़ गई.

फिर 2022 में एक और बड़ी घटना हुई.

सोलोमन द्वीप (Solomon Islands) और चीन ने एक सुरक्षा समझौता किया. 

सोलोमन द्वीप की सरकार ने कहा, "हम यह समझौता अपने देश में शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए कर रहे हैं."

कुछ-कुछ वैसा ही जैसा श्रीलंका, मालदीव, नेपाल बोलते रहें है… 

फिर जब ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और अमेरिका ने अपना रुख बदला…

लेकिन ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और न्यूजीलैंड को लगा कि इससे चीन की मौजूदगी इस क्षेत्र में और बढ़ सकती है.

इसके बाद ऑस्ट्रेलिया ने भी अपनी कोशिशें तेज कर दीं.

उसने कहा, "हम भी अपने पड़ोसी द्वीपों के साथ मिलकर काम करेंगे."

ऑस्ट्रेलिया ने कई देशों को पुलिस प्रशिक्षण देना शुरू किया, समुद्री सुरक्षा में मदद बढ़ाई, आर्थिक सहायता दी और नए रक्षा समझौते किए.

उसका उद्देश्य साफ था कि छोटे द्वीप यह महसूस करें कि ऑस्ट्रेलिया उनका भरोसेमंद साथी है.

2025 और 2026 में ऑस्ट्रेलिया ने वानुआतु और फिजी के साथ महत्वपूर्ण सुरक्षा समझौते किए.

इन समझौतों का संदेश था कि दोनों देश मिलकर अपने समुद्र और सुरक्षा का ध्यान रखेंगे.

लेकिन क्या छोटे द्वीप किसी एक देश का साथ देना चाहते हैं?

जवाब है - जरूरी नहीं.

आज प्रशांत महासागर के छोटे-छोटे द्वीप दुनिया के लिए बहुत महत्वपूर्ण बन गए हैं.

एक तरफ चीन विकास और नई परियोजनाओं की बात करता है. दूसरी तरफ ऑस्ट्रेलिया सुरक्षा और लंबे समय की साझेदारी का वादा करता है.

और ठीक यहीं पर भारत, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के लिए यह बात बहुत अहम हो गई है. पीएम मोदी का दौरा प्रशांत महासागर में चीन को घेरने के लिए इसीलिए जरूरी है. 

यही कहानी भारत के पड़ोस की भी…

मान लीजिए आपके घर के आसपास कई छोटे-छोटे पड़ोसी रहते हैं. वर्षों तक आप एक-दूसरे की मदद करते रहे. लेकिन फिर एक दिन एक नया और बहुत अमीर पड़ोसी आया. उसने कहा-

‘मैं सड़क बनाऊंगा, बंदरगाह बनाऊंगा, पुल बनाऊंगा, बिजली दूंगा और पैसा भी दूंगा.’

छोटे पड़ोसियों को यह प्रस्ताव अच्छा लगा.

लेकिन बड़े पड़ोसी (भारत) ने सोचा-

"अगर ये परियोजनाएं सिर्फ विकास तक सीमित रहीं तो ठीक है, लेकिन अगर इनका इस्तेमाल भविष्य में रणनीतिक या सैन्य उद्देश्यों के लिए हुआ, तो मेरी सुरक्षा भी प्रभावित हो सकती है."

यही कहानी दक्षिण एशिया और हिंद महासागर में भी दिखाई देती है.

उदाहरण 1: श्रीलंका

चीन ने श्रीलंका में हंबनटोटा बंदरगाह बनाया.

जब श्रीलंका कर्ज नहीं चुका पाया, तो बंदरगाह 99 साल की लीज पर चीनी कंपनी को देना पड़ा.

भारत को चिंता हुई कि व्यापार के लिए बना बंदरगाह भविष्य में रणनीतिक महत्व भी हासिल कर सकता है.

उदाहरण 2: मालदीव

चीन ने पुल, आवास और कई बड़ी परियोजनाओं में निवेश किया.

बाद में भारत ने भी अस्पताल, जल परियोजनाएँ, तटरक्षक सहयोग और आपदा राहत बढ़ाई ताकि मालदीव के साथ उसके पुराने रिश्ते मजबूत बने रहें.

उदाहरण 3: नेपाल

नेपाल में चीन ने सड़क, रेल और कनेक्टिविटी परियोजनाओं की पेशकश की.

इसके जवाब में भारत ने सीमा पार रेल, पेट्रोलियम पाइपलाइन, बिजली व्यापार और डिजिटल कनेक्टिविटी पर अधिक ध्यान देना शुरू किया.

उदाहरण 4: बांग्लादेश

चीन ने बड़े-बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट बनाए.

उधर भारत ने बिजली आपूर्ति, रेल संपर्क, जलमार्ग, व्यापार और रक्षा सहयोग बढ़ाया ताकि दोनों देशों का भरोसा मजबूत रहे.

यही है ‘String of Pearls’ की चर्चा

कई रणनीतिक विशेषज्ञ कहते हैं कि चीन हिंद महासागर के आसपास बंदरगाहों और बुनियादी ढाँचे का एक नेटवर्क बना रहा है. इसमें अक्सर जिन जगहों का उदाहरण दिया जाता है-

  • पाकिस्तान का ग्वादर
  • श्रीलंका का हंबनटोटा
  • म्यांमार का क्याउकफ्यू
  • मालदीव में बढ़ता निवेश
  • जिबूती, अफ्रीका में चीन का सैन्य अड्डा

भारत इसे केवल बंदरगाहों की सूची नहीं, बल्कि अपनी समुद्री सुरक्षा के नजरिये से भी देखता है.

तो पीएम मोदी का प्रशांत दौरा क्यों महत्वपूर्ण है?

जैसे ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड चाहते हैं कि प्रशांत के छोटे द्वीप केवल चीन पर निर्भर न हों,

वैसे ही भारत भी चाहता है कि हिंद महासागर और इंडो-पैसिफिक के छोटे देश किसी एक बड़ी शक्ति पर पूरी तरह निर्भर न हों.

इसलिए भारत इन देशों के साथ विकास, समुद्री सुरक्षा, डिजिटल सहयोग, आपदा राहत, और भरोसेमंद साझेदारी को मजबूत कर रहा है.

प्रधानमंत्री मोदी की प्रशांत क्षेत्र की सक्रिय कूटनीति केवल एक विदेश यात्रा नहीं, बल्कि भारत की व्यापक इंडो-पैसिफिक रणनीति का हिस्सा है. जिसका उद्देश्य अपने साझेदार देशों के साथ मिलकर एक खुला, सुरक्षित और संतुलित समुद्री क्षेत्र बनाए रखना है. इंडो-पैसिफिक आपस में जुड़ा हुआ समुद्री इलाका है जो अफ्रीका के पूर्वी तट से लेकर पश्चिमी अमेरिका तक फैला है, और हिंद और प्रशांत महासागरों को जोड़ता है. यह दुनिया की GDP का 60% से ज्यादा हिस्सा है.

आसान भाषा में समझिए

जहां प्रशांत महासागर की कहानी में, छोटे द्वीपों को चीन ने विकास के नाम पर बरगलाया है, जिसे ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड ने खुद के खिलाफ माहौल बनाने के तौर पर ही देखा है. 

वहीं दक्षिण एशिया में भी, भारत चाहता है कि उसके पड़ोसी विकास करें. लेकिन ऐसा संतुलन भी बना रहे जिससे पूरे क्षेत्र की सुरक्षा और स्थिरता प्रभावित न हो.

यही कारण है कि आज विकास, कूटनीति और सुरक्षा, तीनों एक साथ चल रहे हैं। यही आधुनिक भू-राजनीति (Geopolitics) की सबसे बड़ी कहानी है.

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तो आखिर प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?

पैसिफिक महासागर के छोटे द्वीपों की कहानी सिर्फ ऑस्ट्रेलिया और चीन के बीच की होड़ के बारे में नहीं है. यह बदलती हुई ग्लोबल व्यवस्था को दिखाती है, जहां बड़ी ताकतें न सिर्फ युद्ध के मैदान में, बल्कि बंदरगाहों, समुद्री रास्तों, निवेश, खनिजों, टेक्नोलॉजी और कूटनीति के ज़रिए अपना असर बढ़ा रही हैं.

यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड की यात्रा को सिर्फ तीन देशों की यात्रा के तौर पर नहीं, बल्कि भारत की व्यापक इंडो-पैसिफिक रणनीति के एक अहम हिस्से के तौर पर देखा जा रहा है.

पिछले दशक में, चीन ने डेवलपमेंट के लिए मदद, लोन और बंदरगाहों, सड़कों व दूसरे इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण के जरिए पैसिफिक इलाके में अपना असर बढ़ाया है. ऑस्ट्रेलिया ने इसे सिर्फ आर्थिक गतिविधि के तौर पर नहीं, बल्कि एक लंबे समय की रणनीतिक चुनौती के तौर पर देखा है. नतीजतन, उसने वानुअतु, फिजी और पापुआ न्यू गिनी जैसे देशों के साथ सुरक्षा सहयोग, समुद्री निगरानी, ​​पुलिस ट्रेनिंग और रक्षा समझौतों को तेजी से आगे बढ़ाया है. इसी तरह, भारत भी इस इलाके में चीन की बढ़ती मौजूदगी को सिर्फ आर्थिक गतिविधि के नजरिए से नहीं, बल्कि अपनी सुरक्षा से जुड़े हितों के नजरिए से देखता है.

ऑस्ट्रेलिया: भारत का सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार

प्रोफेसर रोशनी सेनगुप्ता के अनुसार, इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव ऑस्ट्रेलिया है. उनका मानना है कि भारत अब इंडो-पैसिफिक को केवल Act East Policy का विस्तार नहीं मानता, बल्कि अपनी विदेश नीति का केंद्रीय क्षेत्र बना चुका है. यही कारण है कि भारत और ऑस्ट्रेलिया के संबंध अब केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सुरक्षा, प्रौद्योगिकी, समुद्री सहयोग और वैश्विक सप्लाई-चेन तक पहुंच चुके हैं.

वे बताती हैं कि 2022 के Economic Cooperation and Trade Agreement (ECTA) और Comprehensive Strategic Partnership के बाद दोनों देशों के संबंध कई नई दिशाओं में आगे बढ़े हैं. विशेष रूप से-

  • Critical Minerals (Lithium, Rare Earths), Supply Chain Diversification, Quad सहयोग, Maritime Domain Awareness, रक्षा अभ्यास (Malabar और AUSINDEX), विश्वविद्यालय एवं शोध सहयोग, Skilled Migration

इन सभी क्षेत्रों में भारत और ऑस्ट्रेलिया लगातार नजदीक आए हैं.

भारत के लिए ऑस्ट्रेलिया केवल एक व्यापारिक साझेदार नहीं है. आज जब पूरी दुनिया इलेक्ट्रिक वाहनों, बैटरियों, सेमीकंडक्टर और स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ रही है, तब लिथियम और रेयर अर्थ मिनरल्स रणनीतिक संसाधन बन चुके हैं. चीन इन खनिजों की वैश्विक आपूर्ति पर लंबे समय से मजबूत पकड़ रखता है. ऐसे में ऑस्ट्रेलिया के साथ सहयोग भारत को इस निर्भरता को कम करने का अवसर देता है.

चीन: दोनों देशों की साझा चिंता

भारत और ऑस्ट्रेलिया के संबंधों में सबसे महत्वपूर्ण समानता यह है कि दोनों देश हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती सक्रियता को लेकर सजग हैं. ऑस्ट्रेलिया की चिंता मुख्यतः इन मुद्दों को लेकर है-

  • Solomon Islands में चीन की बढ़ती सुरक्षा उपस्थिति
  • Pacific Islands में चीनी निवेश
  • संभावित सैन्य पहुंच
  • दक्षिण प्रशांत में चीन का बढ़ता प्रभाव

दूसरी ओर भारत की चिंताएं कुछ अलग लेकिन समान प्रकृति की हैं-

  • वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर तनाव
  • हिंद महासागर में चीनी नौसैनिक गतिविधियाँ
  • Belt and Road Initiative (BRI)
  • String of Pearls के तहत बंदरगाहों का नेटवर्क
  • पाकिस्तान के ग्वादर, श्रीलंका के हंबनटोटा और म्यांमार के क्याउकफ्यू जैसे रणनीतिक बंदरगाह

दोनों देशों का उद्देश्य किसी टकराव को बढ़ाना नहीं, बल्कि एक ऐसे Free, Open and Inclusive Indo-Pacific को मजबूत करना है, जहां समुद्री व्यापार सुरक्षित रहे और कोई भी एक शक्ति पूरे क्षेत्र पर अत्यधिक प्रभाव न जमा सके.

भारत और ऑस्ट्रेलिया: सहयोग केवल रक्षा तक सीमित नहीं

आज भारत और ऑस्ट्रेलिया के सहयोग के प्रमुख क्षेत्र हैं-

  • व्यापार और निवेश, Critical Minerals, Clean Energy, रक्षा एवं संयुक्त सैन्य अभ्यास, साइबर सुरक्षा, Maritime Domain Awareness, शिक्षा एवं अनुसंधान, Supply Chain Resilience

एमिटी विश्वविद्यालय, झारखंड के प्रोफेसर राहुल कुमार के अनुसार, यही कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब व्यापार, खनिज और समुद्री सुरक्षा, तीनों भारत और ऑस्ट्रेलिया के संबंधों की नई धुरी बन चुके हैं. उनके अनुसार यदि दोनों देश व्यापार समझौते को और व्यापक बनाते हैं तथा Critical Minerals और रक्षा सहयोग में ठोस प्रगति करते हैं, तो आने वाले वर्षों में भारत-ऑस्ट्रेलिया संबंध केवल अच्छी मित्रता नहीं, बल्कि रणनीतिक आवश्यकता बन जाएंगे.

न्यूजीलैंड: एक नई शुरुआत

यदि ऑस्ट्रेलिया इस यात्रा का रणनीतिक केंद्र है, तो न्यूजीलैंड भविष्य की संभावनाओं का प्रतीक है.

प्रोफेसर रोशनी सेनगुप्ता बताती हैं कि न्यूजीलैंड लंबे समय तक चीन के साथ अपने व्यापारिक संबंधों को प्राथमिकता देता रहा. इसलिए उसने सुरक्षा के मामलों में ऑस्ट्रेलिया जैसी सक्रिय भूमिका नहीं निभाई. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उसका दृष्टिकोण धीरे-धीरे बदल रहा है.

UPSC शिक्षक अभिषेक मिश्रा के अनुसार, भारत-न्यूजीलैंड संबंधों में हाल के वर्षों में उल्लेखनीय गति आई है. मार्च 2025 में प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन की भारत यात्रा, रायसीना डायलॉग में उनकी भागीदारी और भारत-नेतृत्व वाले Coalition for Disaster Resilient Infrastructure (CDRI) में  न्यूजीलैंड की सदस्यता ने दोनों देशों के बीच विश्वास को नई दिशा दी. इसके बाद अप्रैल 2026 में दोनों देशों के बीच Free Trade Agreement (FTA) हुआ, जिसके तहत अगले 15 वर्षों में भारत में लगभग 20 अरब डॉलर के निवेश का मार्ग प्रशस्त हुआ.

प्रधानमंत्री मोदी की जुलाई 2026 की यात्रा इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि लगभग चार दशकों बाद कोई भारतीय प्रधानमंत्री न्यूजीलैंड की आधिकारिक यात्रा कर रहा है. अभिषेक मिश्रा के अनुसार न्यूजीलैंड का महत्व तीन कारणों से बढ़ गया है-

  • इंडो-पैसिफिक में उसकी रणनीतिक स्थिति.
  • FTA के बाद आर्थिक सहयोग की नई संभावनाए.
  • भारतीय मूल के बड़े और प्रभावशाली प्रवासी समुदाय की उपस्थिति.

हालांकि हाल के वर्षों में वहां भारतीय समुदाय के विरुद्ध कुछ स्थानों पर बढ़ती प्रवासी-विरोधी भावना भी चिंता का विषय रही है, जिस पर दोनों देशों के बीच संवाद महत्वपूर्ण रहेगा.

इंडोनेशिया को साथ जोड़ने का संदेश

इस पूरी यात्रा में इंडोनेशिया की उपस्थिति भी अत्यंत महत्वपूर्ण है. प्रोफेसर रोशनी सेनगुप्ता के अनुसार, इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड को एक ही यात्रा में शामिल करना भारत का स्पष्ट संदेश है कि वह पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को एक साझा रणनीतिक भू-क्षेत्र के रूप में देखता है. यह केवल Act East नहीं, बल्कि एक व्यापक Indo-Pacific Vision है, जिसमें समुद्री सुरक्षा, लोकतांत्रिक साझेदारी, सुरक्षित व्यापार मार्ग और विश्वसनीय सप्लाई-चेन शामिल हैं.

लॉरेन एमॉस - भारत की पॉलिटिक्स, रक्षा, विदेश नीति और इंडो-पैसिफिक स्ट्रैटेजी की एक्सपर्ट के अनुसार, मोदी का पैसिफिक रीजन का दौरा सिर्फ़ साउथ-ईस्ट एशिया के एक और डिप्लोमैटिक दौरे के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. यह भारत की 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' और जकार्ता और कैनबरा के साथ उसकी 'कॉम्प्रिहेंसिव स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप' को ठोस रूप देने की कोशिश को दिखाता है. इस दौरे में कई पहलू शामिल थे: समुद्री सुरक्षा, डिफेंस एक्सपोर्ट, ज़रूरी मिनरल, जॉइंट मैन्युफैक्चरिंग, एजुकेशन, हेल्थकेयर, स्पेस कोऑपरेशन और शेयर्ड-हेरिटेज डिप्लोमेसी.

खास बात यह है कि भारत और इंडोनेशिया कोई फॉर्मल अलायंस नहीं बना रहे हैं. दोनों देश स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी को महत्व देते हैं और सख्त ग्रुप में शामिल होने से बचते हैं. इसके बजाय, वे ब्रह्मोस और एस्ट्रा मिसाइल, कोस्ट गार्ड कोऑपरेशन, रेयर-अर्थ मैग्नेट, स्टील प्रोडक्शन, IITs और IIMs की मौजूदगी और प्रोफेशनल ट्रेनिंग जैसी ठोस क्षमताओं पर आधारित पार्टनरशिप बना रहे हैं.

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लेखक के बारे में

Published by: Achal Priyadarshy

अचल प्रियदर्शी (Achal Priyadarshy) अंतरराष्ट्रीय संबंधों, इंडिक एवं इंडीजीनस अध्ययन के जानकार, शिक्षाविद् और 32 पुस्तकों के लेखक हैं.

उन्होंने केंद्रीय मंत्री के राजनीतिक सहायक के तौर पर काम किया है, तथा ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (TRI)- रांची और झारखंड सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग (DoFECC) के साथ भी कार्य किया है.

उन्होंने सैकड़ों UPSC अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन किया है, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों व समसामयिक विषयों पर उनके विश्लेषणात्मक लेख नियमित रूप से UPSC-केंद्रित पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं.

साहित्य और जनजातीय इतिहास में उनके योगदान को मान्यता देते हुए उन्हें वर्ष 2025 में आयोजित जमशेदपुर लिटरेचर फेस्टिवल के उद्घाटन संस्करण में उनकी पुस्तक Tribal Bravehearts के लिए शब्द-शिल्पी सम्मान से सम्मानित किया गया. शैक्षणिक रूप से, उन्होंने हार्वर्ड डिविनिटी स्कूल से Religion, Peace and Conflict विषय में अध्ययन किया है.

ये उनकी कुछ लोकप्रिय किताबें हैं;

  1. Pakistan State, Armed Influenconomy (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  2. बिहार जनादेश 2025 (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  3. International Relations: UPSC & State Civil Services Examinations (Oakbridge Publishing) (2026)

  4. ब्रांड हेमंत (स्वतंत्र प्रकाशन) (2025)

  5. झारखण्ड की जनजाति समाज और समय का संकट (प्रकाशन संसथान) (2026)

  6. जनजातीय शूरवीर (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  7. Know Your State: Jharkhand (अरिहंत प्रकाशन) (2025)

  8. उत्तर प्रदेश सामान्य ज्ञान (क्राउन पुब्लिकेशन्स) (2024)

  9. बिहार सामान्य ज्ञान (उपकार प्रकाशन) (2024)

  10. International Relations for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)

  11. Internal Security & Disaster Management for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)

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