शिमला समझौते पर बिन पेंदी का लोटा बना पाकिस्तान, जानिए इसमें क्या है खास…

Pakistan Shimla Agreement : पाकिस्तान एक ऐसा देश है, जो भारत के सामने टिक तो नहीं सकता,लेकिन वह इसकी कोशिश हमेशा करता रहता है. एक ओर पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ कहते हैं पाकिस्तान शिमला समझौते को मृत दस्तावेज मानता है, वहीं दूसरी ओर उनका विदेश मंत्रालय यह कहता है कि अभी तक औपचारिक रूप से इस समझौते को खत्म करने पर कोई विचार नहीं किया गया है. दरअसल पाकिस्तान समझ नहीं पा रहा है कि वह भारत के चौतरफा हमले से कैसे बचे.

Pakistan Shimla Agreement : ऑपरेशन सिंदूर के बाद से पाकिस्तान बौखलाया हुआ है, उसे यह समझ नहीं आ रहा है कि वह दुनिया को अपना चेहरा कैसे दिखाए. भारत ने उसे आतंकवाद के पैरोकार के रूप में इस तरह बेनकाब किया है कि वह छटपटा रहा है. इसी छटपटाहट में खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे वाले कहावत को चरितार्थ करते हुए पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने एक टेलीविजन इंटरव्यू में यह कहा था कि 1972 के शिमला समझौते को ‘एक मृत दस्तावेज’ समझा जाना चाहिए. पाकिस्तानी मंत्री के इस बयान पर पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत के साथ द्विपक्षीय समझौतों को खत्म करने का अभी तक कोई फैसला नहीं लिया गया है. विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा है कि भारत और पाकिस्तान के हालिया संबंधों की वजह से क्षेत्र में तनाव बढ़ा है और चर्चाएं हो रही हैं, लेकिन पाकिस्तान ने नई दिल्ली के साथ अपने किसी भी द्विपक्षीय समझौते को खत्म करने के लिए कोई औपचारिक या निर्णायक कदम नहीं उठाया है. पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के इस बयान से यह स्पष्ट है कि जिस तरह भारतीय प्रतिनिधिमंडल दुनिया के सामने पाकिस्तान को बेनकाब कर रहा है, वह बौखलाया हुआ है.

पाकिस्तान फिर हुआ बेनकाब

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने एक टेलीविजन कार्यक्रम में कहा था कि भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय संबंध पूरी तरह समाप्त हो चुका है और हम 1948 की स्थिति में वापस आ गए हैं. आसिफ ने कहा है कि सिंधु जल समझौता खत्म हो या ना हो, शिमला समझौता खत्म हो चुका है. शिमला समझौते में यह बात स्पष्ट है कि दोनों देश आपसी विवादों का निपटारा द्विपक्षीय वार्ता के साथ करेंगे, इसमें किसी तीसरे पक्ष की भागीदारी नहीं होगी. शिमला समझौते को खत्म करने की बात करके पाकिस्तान के रक्षामंत्री ने अपने देश को एक बार फिर बेनकाब कर दिया है और यह साबित कर दिया है कि उनकी नीति और रणनीति क्या है. पाकिस्तानी मंत्री ने कहा है कि वे 1948 की स्थिति में आ गए हैं और कश्मीर का समाधान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर करेंगे. ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि पाकिस्तान ने कश्मीर का राग अलापा है, 2019 में जब भारत ने कश्मीर से आर्टिकल 370 को हटाया था, उस वक्त भी पाकिस्तान ने शिमला समझौते को निलंबित किया था और आर्टिकल 370 को हटाए जाने का विरोध करते हुए इस मसले को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया था. उस वक्त भारत ने स्पष्ट तौर पर यह कहा था कि यह भारत का आंतरिक मसला है.

शिमला समझौता की खास बातें

मुख्य बातेंविवरण
1. द्विपक्षीय समाधानभारत और पाकिस्तान सभी विवादों को आपस में ही शांतिपूर्ण और द्विपक्षीय बातचीत से सुलझाएंगे .
2. युद्ध विराम की पुष्टि1971 के युद्ध के सीज़फायर को औपचारिक रूप से स्वीकार किया गया.
3. नियंत्रण रेखा (LoC)पूर्व की सीजफायर लाइन” को “नियंत्रण रेखा (LoC)” नाम दिया गया. दोनों देश इस रेखा का सम्मान करने पर सहमत हुए.
युद्धबंदी और भूमि वापसीभारत ने 93,000 पाकिस्तानी युद्धबंदियों को रिहा किया और पश्चिमी मोर्चे पर कब्जा की गई जमीन पाकिस्तान को लौटा दी.
शांतिपूर्ण सह-अस्तित्वभारत और पाकिस्तान एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का सम्मान करने पर सहमत हुए.

पाकिस्तान ने स्वीकारा वह आतंकियों को समर्थन देता है

स्काई न्यूज को दिए गए अपने इंटरव्यू में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री आसिफ ने यह स्वीकारा है कि वे तीन दशकों से आतंकियों को समर्थन, प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता दे रहे हैं. उनका कहना है कि यह गंदा काम हम अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों के लिए करते रहे हैं. यह हमारी गलती थी और हम इसके लिए भुगत भी चुके हैं. आसिफ के इस बयान से भारत के वो आरोप और पुख्ता होते हैं, जिसमें भारत लगातार यह कह रहा है कि पाकिस्तान आतंकियों को पनाह दे रहा है और उन्हें समर्थन दे रहा है.

क्या है शिमला समझौता

1971 के युद्ध की समाप्ति के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच शिमला समझौता हुआ था. इस समझौते का उद्देश्य क्षेत्र में शांति स्थापित करना था. चूंकि इस युद्ध में भारत विजयी हुआ था और पाकिस्तान की बुरी तरह से हार हुई थी, इसलिए पाकिस्तान ने शिमला समझौते पर हस्ताक्षर किया. उस वक्त भारत ने पाकिस्तान की 5,795 वर्ग मील भूमि और 93 हजार युद्धबंदी को रिहा कर दिया था. इस समझौते के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच एलओसी का निर्धारण हुआ और यह सहमति बनी कि दोनों देश इसका सम्मान करेंगे. उससे पहले इस लाइन को सीजफायर लाइन के नाम से जाना जाता था. इस समझौते में यह सहमति भी बनी थी कि दोनों देश आपसी विवादों को दिपक्षीय बातचीत से हल करेंगे. यह समझौता 2 जुलाई 1972 को हुआ था, समझौते पर भारत की ओर से प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान की ओर से वहां के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो ने हस्ताक्षर किया था.

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लेखक के बारे में

Published by: Rajneesh anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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