100 साल पहले झारखंड में महात्मा गांधी ने कराया था टाटा कंपनी के प्रबंधन और मजदूरों के बीच समझौता

Mahatma Gandhi In Jharkhand: महात्मा गांधी 1917 से 1940 के बीच कई बार झारखंड दौरे पर आए थे. उन्होंने यहां के लोगों को समझा और उनके कल्याण की कोशिश भी की, हालांकि 1940 में उनके रामगढ़ अधिवेशन में आने की चर्चा सबसे ज्यादा होती है. 1925 में उन्होंने टाटा कंपनी और कर्मचारियों के बीच शांतिपूर्ण समझौता कराकर ऐसी शुरुआत की, जिसकी वजह से न्यायपूर्ण श्रम नीति बनी और मजदूरों का कल्याण हुआ. 8 अक्टूबर को वे मधुपुर पहुंचे थे और यहां के लोगों को शिक्षा के प्रति जागरूक किया था और शराब का पुरजोर विरोध किया. 1925 में उन्होंने झारखंड के कई जिलों का दौरा किया था, 100 साल बाद भी गांधी जी की कही बातें प्रासंगिक हैं और आम जनता उनसे खुद को कनेक्ट महसूस करती है.

Mahatma Gandhi In Jharkhand: महात्मा गांधी ने बिहार के चंपारण से सत्याग्रह आंदोलन की शुरुआत की थी और वहां के नील किसानों को तीनकठिया प्रथा से मुक्ति दिलाई थी, इस बात से तो ज्यादातर लोग वाकिफ हैं, लेकिन क्या आप यह जानते हैं कि महात्मा गांधी ने टाटा प्रबंधन और वहां के मजदूरों के बीच आज से 100 साल पहले समझौता कराया था? इस समझौते के लिए वे विशेष आग्रह पर जमशेदपुर आए थे और उन्हें जमशेदपुर शहर बहुत अच्छा भी लगा था. अपने कई भाषणों में उन्होंने जमशेदपुर का जिक्र किया था.

महात्मा गांधी कब आए थे जमशेदपुर?

महात्मा गांधी उस शहर को देखने के इच्छुक थे, जहां से उन्हें दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद आंदोलन के वक्त 25 हजार का चेक मिला था. जमशेदजी नुसरवानजी जिन्होंने टाटा की स्थापना की थी उनके छोटे बेटे सर रतनजी टाटा ने उन्हें यह चेक दिया था. इस संबंध में वरिष्ठ पत्रकार अनुज सिन्हा ने अपनी किताब -महात्मा गांधी की झारखंड यात्रा में लिखा है कि रतन जी टाटा ने पहले 25 हजार का चेक संघर्ष को मजबूत करने के लिए दिया था, बाद में फिर उन्होंने सत्याग्रहियों के लिए 25 हजार दिया था. 1917 में जब महात्मा गांधी रांची आए थे तो उस वक्त के बिहार -ओडिशा के लेफ्टिनेंट गवर्नर एडवर्ड गेट ने उनसे यह कहा था कि जमशेदपुर गए बिना वापस नहीं जाइएगा. लेकिन उस वक्त वे जमशेपुर नहीं जा पाए थे. 1922 में टाटा कंपनी में हड़ताल हुई थी. इस हड़ताल की वजह से मजदूरों और प्रबंधन के बीच तनातनी चल रही थी, जो सुलझ नहीं रही थी.तब सीएफ एंड्रूज ने महात्मा गांधी से यह अनुरोध किया था कि वे जमशेदपुर आएं और मजदूरों की समस्याओं का समाधान करें. उनके अनुरोध पर महात्मा गांधी 8 अगस्त 1925 में जमशेदपुर आए थे और उनकी मध्यस्थता से ही मैनेजमेंट और मजदूरों के बीच विवाद सुलझा था और हड

महात्मा गांधी का जमशेदपुर दौरा क्यों था इतना खास?

जिस वक्त अंग्रेजों को यह घमंड था कि भारत में लोहे का कारखाना नहीं हो सकता है और यहां इस्पात का निर्माण संभव नहीं है, उस वक्त जमशेदजी ने टाटा में टिस्को कंपनी की स्थापना की थी. टाटा कंपनी को इस्पात बनाने के लिए कच्चा माल यहां के नजदीकों खानों से मिल जाता था. बड़े पैमाने पर यहां की कंपनी से इस्पात का उत्पादन होता था और विश्वयुद्ध के दौरान टाटा ने सरकार को लोहा उपलब्ध कराया था. एक गांव को किस तरह जमशेदजी ने एक बेहतरीन नगर में तब्दील कर दिया था. गांधीजी की यात्रा के बाद टाटा कंपनी के प्रबंधन और मजदूरों में ऐतिहासिक समझौता हुआ और कंपनी ने मजदूरों के हित को तवज्जो दी. उनके लिए काम के घंटे को निर्धारित किया और उन्हें बुनियादी सुविधाएं भी मुहैया कराई गईं. मजदूरों को स्वास्थ्य और शिक्षा की सुविधाएं भी दी गई और मजदूरों के वेतन में भी वृद्धि की गई. लगभग 30 हजार मजदूर वहां काम करते थे जिनमें से अधिकांश बिहार, झारखंड और बंगाल से ही थे, गांधी जी की पहल से उनको बहुत लाभ हुआ.

झारखंड के कई अन्य जिलों का भी गांधी जी ने किया था दौरा

1925 में महात्मा गांधी सिर्फ जमशेदपुर ही नहीं आए थे, उन्होंने झारखंड के कई अन्य जिलों का भी दौरा किया था. अनुज कुमार सिन्हा अपनी किताब में लिखते हैं कि महात्मा गांधी 8 अक्टूबर को गिरिडीह से मधुपुर पहुंचे थे. वे यहां देश बंधु स्मारक कोष के लिए धन इकट्ठा करने और खादी का प्रचार करने आए थे. उन्होंने यहां कई कार्यक्रमों में शिरकत की और तिलक विद्यालय भी गए. इस विद्यालय का जिक्र इसलिए जरूरी है क्योंकि यहां विद्यार्थियों की संख्या तमाम प्रयासों के बावजूद भी घटती जा रही थी, तब गांधी जी ने शिक्षकों का हौसला बढ़ाया था और कहा था कि छात्र कम हैं, लेकिन शिक्षकों को निराश होने की जरूरत नहीं है. आप अपना कर्तव्य करते रहें. गांधी जी ने 1925 में चक्रधरपुर, गिरिडीह, हजारीबाग, चाईबासा और कोडरमा का भी दौरा किया था.

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महात्मा गांधी की झारखंड यात्रा के 100 साल, विद्यार्थी के चरित्र निर्माण में आज भी प्रासंगिक ‘सत्य के प्रयोग’

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लेखक के बारे में

Author: Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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