Indonesia : पीएम मोदी की यात्राएं टूरिज्म ट्रिप नहीं, चीन के लिए जाल ‌बिछा रहे हैं

सेशेल्स, इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की पीएम मोदी की यात्राएं. जापानी पीएम की भारत यात्रा. पीएम को अवॉर्ड मिलना, ब्रम्होस डील, संयुक्त सैनिक अभ्यास सिर्फ दिखावे नहीं हैं. अंदर ही अंदर एक जाल बिछाई जा रही है, एक घेरेबंदी हो रही है, जिसका टारगेट चीन है.

Indonesia : ‘किसी भी चीज को जबरन नहीं, बल्कि तसल्ली से समझा जाता है. क्या आपमें इतना सब्र है कि आप कीचड़ के बैठने और पानी के साफ होने तक इंतजार कर सकते हैं? मशहूर चीनी दार्शनिक लाओ त्सु की ये बात भारत की चीन से निपटने की मौजूदा रणनीति पर सटीक बैठती है. इंतजार करना भी समझदारी का काम हो सकता है. भारत ने बीते दो हफ्तों में कैसे चीन को घेरा है, आइए पीएम मोदी के साथ आपको एक स्ट्रैटेजिक विजिट पर ले चलते हैं… 

कहानी की शुरु‌आत होती है पीएम की सेशेल्स विजिट से…

27 से 29 जून 2026 को पीएम मोदी सेशेल्स गए. अजीब नाम का देश है. मेरे घर में तो इसका नाम कई लोगों ने पहली ही बार सुना. पर किसे पता था, पीएम सिर्फ यहां अवॉर्ड लेने नहीं गए थे. असल में यही वो जगह है, जहां से सागर में चीन की ओर से भारत के लिए की जाने वाली घेरेबंदी को तोड़ा जा सकता है. सेशेल्स पर अपनी धाक जमाते ही भारत पूर्वी अफ्रीकी देशों से चीन के प्रभाव को उखाड़ने की तरफ बढ़ जाएगा.

सेशेल्स खत्म ही हुआ था कि जापानी पीएम दिल्ली चली आईं…

सेशल्स विजिट को 2 ही दिन हुए थे कि जापान की पीएम दिल्ली आ गईं. यूं तो उनके आने का अर्थ क्या था, हमने आपको बताया ही था. लेकिन सेनकाकू/दियाओयू द्वीपों पर दबी जुबान में एक संदेश चला गया. असल में ये जापान और चीन के बीच पूर्वी चीन सागर में स्थित द्वीपों का एक समूह, जिस पर दोनों देशों का दावा है. भारत अगर जापान के साथ आ जाता है तो चीन को टक्कर देने में जापान को काफी ताकत मिल जाएगी. 

इधर जापान को ताकत दी, उधर इंडोनेशिया पहुंच गए मोदी, और फिर मलक्का स्ट्रेट…

भारत और इंडोनेशिया दोनों मलक्का स्ट्रेट यानी जलडमरूमध्य के संरक्षक देशों में शामिल हैं. विश्व का लगभग एक-तिहाई समुद्री व्यापार यही से होकर गुजरता है. चीन की बड़ी ऊर्जा आपूर्ति इसी रास्ते से होती है.

फिर तटीय रक्षा सहयोग के क्षेत्र में भारत और इंडोनेशिया सबंग बंदरगाह के बीच संपर्क को बढ़ावा देने के लिए संयुक्त रूप से काम कर रहे हैं. यह बंदरगाह अंडमान और निकोबार द्वीप समूह और मलक्का स्ट्रेट के मुहाने पर स्थित हैं. यह साझेदारी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत के इंदिरा पॉइंट (ग्रेट निकोबार) से इंडोनेशिया का रोंदो द्वीप केवल 163 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है.

इसलिए भारत के इस देश से मजबूत होते रिश्ते ड्रैगन की आंखों में किरकिरी तो डालेगा ही.

आइए भारत–इंडोनेशिया के रिश्तो की एक झलकी देखते हैं– 

  • ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम की आपूर्ति
  • तटीय रक्षा सहयोग
  • संयुक्त नौसैनिक अभ्यास
  • समुद्री निगरानी

ये सब महज सैनिक एक्सरसाइज नहीं है. बल्कि, बड़ी ही चतुराई से उठाए गए कदम हैं. दोनों देश बड़े समझादारी से समुद्री व्यवस्था को मजबूत करने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं.

इसके बाद पीएम चले गए ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड. उसकी कहानी हम इसी स्टोरी की अगली कड़ी में सुनाएंगे. पहले भारत और चीन की कुछ लेयर्स और खोलते हैं…

बिना चाशनी की जलेबी: भारत-चीन के उलझे रिश्ते 

भारत ने 1954 में चीन के साथ 'पंचशील' नीति अपनाई थी. इसे भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और चीन के प्रधानमंत्री झोउ एनलाई ने तैयार किया था. इसका मकसद शांतिपूर्ण संबंधों, आपसी सम्मान और व्यापार के लिए एक ढांचा बनाना था. लेकिन साल 1962 का संघर्ष और हाल ही में गलवान घाटी में हुए तनाव के बाद से फिर कभी भारत और चीन एक साथ आ ही नहीं सके. यों तो डोकलाम, अजहर महमूद और पाकिस्तान को सपोर्ट, भारत में चीनी सामानों और मोबाइल ऐप पर बैन जैसे कई पेंच अटके पड़े हैं. असल में बीते 40-50 सालों में चीन के भयानक विकास के रास्ते ने भारत को हमेशा सतर्क रखा है. अगर करीब से देखेंगे तो भारत-चीन संबंध बिना चाशनी वाली जलेबी जैसे दिखेंगे. इसमें कोई मिठास नहीं है और अनगिनत घुमाव. 

चीन से ऐसी खट्टी दोस्ती से सबक लेते हुए, भारत ऐसी साझेदारियां बना रहा है जहां चीन की धमक अभी कम है. भारत के दक्षिण में स्थित इंडो-पैसिफिक क्षेत्र एक ऐसा ही इलाका है. इंडो-पैसिफिक आपस में जुड़ा हुआ समुद्री इलाका है जो अफ्रीका के पूर्वी तट से लेकर पश्चिमी अमेरिका तक फैला है, और हिंद और प्रशांत महासागरों को जोड़ता है. यह दुनिया की GDP का 60% से ज्यादा हिस्सा है.

नतीजतन, इंडोनेशिया के सुमात्रा से लगभग 163 km दूर अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का विकास भारत की समुद्री पहुंच और निगरानी क्षमताओं को मजबूत करने में मदद करता है. इंडोनेशिया, फिलीपींस, वियतनाम, ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे देशों के साथ भारत का बढ़ता सहयोग इसी बड़ी रणनीति का हिस्सा है, जिसका मकसद इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शक्ति का संतुलन बनाए रखना है.

'सलामी स्लाइसिंग' रणनीति क्या है?

भू-राजनीति की जानकार रितिका करमाकर बताती हैं कि इतिहास में बड़े बदलाव अक्सर एक बड़े हमले से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे, सोचे-समझे कदमों से आते हैं. ये कदम शुरुआत में इतने छोटे लगते हैं कि कोई ध्यान नहीं देता, लेकिन सालों बाद बड़ा असर दिखाते हैं. यही चीन की 'सलामी स्लाइसिंग' रणनीति का सार है. पूरी तरह से सैन्य कब्जे पर निर्भर रहने के बजाय, चीन ने अक्सर धीरे-धीरे आगे बढ़कर और प्रशासनिक दावे करके अपने क्षेत्रीय दावों को मज़बूत करने की कोशिश की है.

अगर हम बारीकी से देखें तो यह साफ दिखाई देता है. 

  • 1951 में तिब्बत पर नियंत्रण मजबूत करना (चीन के सरकारी दस्तावेज़ों में तिब्बत पर नियंत्रण का उल्लेख मिलता है). 
  • 1962 की लड़ाई के बाद अक्साई चिन पर कब्जा बनाए रखने (भारत सरकार की रिपोर्टें और ऐतिहासिक दस्तावेज  इस पर प्रकाश डालते हैं).
  • 1963 के चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते के ज़रिए शक्सगाम घाटी हासिल करने (इस समझौते का विवरण पाकिस्तान और चीन के आधिकारिक रिकॉर्ड में उपलब्ध है).
  • और, 2016 के यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ द सी (UNCLOS) के फ़ैसले के बावजूद 'नाइन-डैश लाइन' (एक काल्पनिक रेखा जिसके आधार पर चीन दक्षिण चीन सागर में बड़े समुद्री दावे करता है) पर अड़े रहने तक (संयुक्त राष्ट्र संघ के फ़ैसले और चीन की प्रतिक्रियाएं इस पर उपलब्ध हैं), यह पैटर्न साफ़ है.

उदाहरण के लिए, दक्षिण चीन सागर में चीन द्वारा कृत्रिम द्वीपों का निर्माण और सैन्यीकरण 'सलामी स्लाइसिंग' का ही एक रूप है.

रितिका आगे कहती हैं कि, 'सलामी स्लाइसिंग' हमें याद दिलाती है कि देश की आज़ादी पर खतरा हमेशा लड़ाई से ही नहीं आता, बल्कि लगातार धीरे-धीरे पड़ने वाले दबाव से भी आता है. और इसीलिए भारत को ऐसी कार्रवाइयों के खिलाफ़ लगातार जवाबी कदम उठाने पड़ेंगे.

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दक्षिण चीन सागर और अन्य क्षेत्रों में चीन की बढ़ती आक्रामकता पिछले कुछ वर्षों में चीन ने दक्षिण चीन सागर में ‘नाइन-डैश लाइन’ के आधार पर व्यापक समुद्री दावे किए हैं, जिससे वियतनाम, फिलीपींस, मलेशिया और ब्रुनेई के साथ तनाव बढ़ा है. विवादित क्षेत्रों में चीनी जहाजों की आक्रामक मौजूदगी, कृत्रिम द्वीपों का निर्माण और सैन्यीकरण इस रणनीति के प्रमुख संकेत हैं (वियतनाम, फिलीपींस और अन्य देशों की सरकारों द्वारा जारी आधिकारिक बयान और यूएन रिपोर्टों में इसका ज़िक्र है).

इंडोनेशिया के उत्तर नातूना सागर में भी चीन के दावे इंडोनेशिया के EEZ (Exclusive Economic Zone - समुद्र का वह इलाका है जिसमें किसी संप्रभु देश को समुद्री संसाधनों की खोज और उनके इस्तेमाल का विशेष अधिकार होता है) से टकराते हैं. इसलिए वहां गश्त और अवरोध जैसी घटनाओं के कारण बार-बार तनाव पैदा होता है (इंडोनेशियाई सरकार के रक्षा और विदेश मंत्रालय द्वारा जारी वक्तव्यों में इसका उल्लेख मिलता है). यह विवाद सिर्फ़ समुद्री संसाधनों का नहीं, बल्कि संप्रभुता और क्षेत्रीय प्रभाव का भी है.

वियतनाम और फिलीपींस के खिलाफ़ चीन की आक्रामकता सबसे स्पष्ट रही है, क्योंकि दोनों देश अपने अधिकार-क्षेत्र में चीनी जहाजों की घुसपैठ और धमकाने वाली कार्रवाइयों का विरोध करते रहे हैं (दोनों देशों की ओर से संयुक्त राष्ट्र में शिकायतें दर्ज कराई गई हैं). 

इसी तरह जापान के साथ सेनकाकू/दियाओयू द्वीपों ( जापान और चीन के बीच पूर्वी चीन सागर में स्थित द्वीपों का एक समूह, जिस पर दोनों देशों का दावा है) को लेकर टकराव बना रहता है (जापान के विदेश मंत्रालय की ओर से इस पर वक्तव्य जारी किए गए हैं).

जबकि ऑस्ट्रेलिया ने चीन के समुद्री दावों को कानूनी आधारहीन बताया है और इस मुद्दे पर सख़्त रुख अपनाया है (ऑस्ट्रेलियाई सरकार के रक्षा और विदेश मामलों के मंत्रालय ने इस संबंध में आधिकारिक बयान दिए हैं).

कुल मिलाकर, चीन की यह नीति समुद्र पर राज करना, संसाधनों पर नियंत्रण पाना और क्षेत्रीय देशों पर दबाव बनाने की कोशिश मानी जाती है. इससे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा, व्यापार और कूटनीति तीनों पर असर पड़ा है.

Indonesia : आसियान में भारत की भूमिका होगी मज़बूत

इंडोनेशिया आसियान (ASEAN) का सबसे प्रभावशाली सदस्य है. दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों का संगठन (ASEAN) दक्षिण-पूर्व एशिया के सभी 11 देशों का एक अंतर-सरकारी मंच है. ASEAN मुख्य रूप से दक्षिण-पूर्व एशिया के आर्थिक विकास, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और अंतरराष्ट्रीय नियमों के पालन पर ध्यान केंद्रित करता है. इसलिए जकार्ता के साथ मज़बूत संबंध भारत को पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में अधिक सक्रिय भूमिका निभाने का अवसर देते हैं. इससे भारत की 'एक्ट ईस्ट नीति' और हिन्द-प्रशांत दृष्टिकोण को भी नई गति मिलती है. साथ ही यह संदेश भी जाता है कि भारत क्षेत्रीय स्थिरता और बहुध्रुवीय व्यवस्था (Multipolar Order) का समर्थक है.

लगभग 10 वर्षों के अनुभव वाले भू-राजनीतिक विश्लेषक डॉ. महीप के अनुसार, 'प्रधानमंत्री मोदी की इंडोनेशिया यात्रा भारत-इंडोनेशिया व्यापक रणनीतिक साझेदारी की रणनीतिक परिपक्वता का प्रतीक है. यह सिर्फ़ द्विपक्षीय संबंधों का विस्तार नहीं, बल्कि हिन्द-प्रशांत में शक्ति संतुलन की नई रणनीति का संकेत भी है. उत्तर नातूना सागर, मलक्का जलडमरूमध्य और ब्रह्मोस रक्षा सहयोग के माध्यम से भारत उन देशों के साथ विश्वास-आधारित सुरक्षा नेटवर्क विकसित कर रहा है जो क्षेत्र में नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था और रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना चाहते हैं. यह चीन के विरुद्ध टकराव की नीति नहीं, बल्कि संतुलित और स्थायी शक्ति-संतुलन (Strategic Balancing) की भारतीय कूटनीति का उदाहरण है.'


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लेखक के बारे में

Author: Achal Priyadarshy

Published by: Rajneesh Anand

अचल प्रियदर्शी (Achal Priyadarshy) अंतरराष्ट्रीय संबंधों, इंडिक एवं इंडीजीनस अध्ययन के जानकार, शिक्षाविद् और 32 पुस्तकों के लेखक हैं. उन्होंने केंद्रीय मंत्री के राजनीतिक सहायक के तौर पर काम किया है. उन्होंने ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (TRI), रांची तथा झारखंड सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग (DoFECC) के साथ कार्य किया है.

उन्होंने सैकड़ों UPSC अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन किया है, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों व समसामयिक विषयों पर उनके विश्लेषणात्मक लेख नियमित रूप से UPSC-केंद्रित पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं.

साहित्य और जनजातीय इतिहास में उनके योगदान को मान्यता देते हुए उन्हें वर्ष 2025 में आयोजित जमशेदपुर लिटरेचर फेस्टिवल के उद्घाटन संस्करण में उनकी पुस्तक “Tribal Bravehearts” के लिए "शब्द-शिल्पी सम्मान" से सम्मानित किया गया. शैक्षणिक रूप से, उन्होंने हार्वर्ड डिविनिटी स्कूल से Religion, Peace and Conflict विषय में अध्ययन किया है. ये उनकी कुछ लोकप्रिय किताबें हैं;

  1. Pakistan State, Armed Influenconomy (प्रभात प्रकाशन)

  2. बिहार जनादेश 2025 (प्रभात प्रकाशन)

  3. International Relations: UPSC & State Civil Services Examinations (Oakbridge Publishing)

  4. ब्रांड हेमंत (स्वतंत्र प्रकाशन)

  5. झारखण्ड की जनजाति समाज और समय का संकट (प्रकाशन संसथान)

  6. जनजातीय शूरवीर (प्रभात प्रकाशन)

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