मुसलमान आक्रांताओं ने युद्ध में लूटी गई हिंदू औरतों की किस्मत में लिखा था गुलामी का भयंकर दर्द

Hindu women during Islamic Attack : मुस्लिम आक्रांताओं ने जब भारत पर हमला किया और यहां लूटपाट मचाया, तो सबसे बुरी स्थिति उन महिलाओं की हुई, जिन्हें वे अपने साथ लूट की वस्तु समझकर ले गए. मुस्लिम इतिहासकार बताते हैं कि उन महिलाओं को ‘माल ए गनीमत’ यानी लूट की वस्तु समझा गया, जिनकी नियति में गुलामी ही लिखी थी. लेकिन यह गुलामी कितनी भयंकर हो सकती है, इसे ऐसे समझा जा सकता है कि बलात्कार या मौत ही उनकी किस्मत में लिखा था.

Hindu women during Islamic Attack : क्या आप जानते हैं उन हिंदू महिलाओं के साथ क्या हुआ, जिन्हें भारत पर हमला करने वाले आक्रांता अपने साथ लूट की वस्तु समझकर ले गए? अगर नहीं तो जानिए कि इन हिंदू महिलाओं को बिना किसी दोष के  ऐसी सजा मिली जिसने उनके जीवन को नर्क से बदतर बना दिया. वे बस मनोरंजन की वस्तु थीं, जिनका अपना कोई वजूद नहीं था. उनके साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए गए और सुंदर स्त्रियों को हरम में डाला गया, जहां वे बस मनोरंजन की वस्तु थीं

अपने साथ किसी महिला को लेकर नहीं आया था मुहम्मद बिन कासिम

भारत पर हमला करने वाला पहला मुस्लिम आक्रांता मुहम्मद बिन कासिम था, जिसने 712 ईसवी में भारत पर हमला किया था. वह अरब साम्राज्य का सेनापति था. अरब के इतिहासकारों में जिनमें अल-बिलादुरी प्रमुख हैं उन्होंने कहीं भी यह जिक्र नहीं किया है कि कासिम अपने साथ किसी औरत को लेकर यहां आया था. इसकी वजह यह थी कि यह युद्ध अभियान था, जहां वे अपना साम्राज्य विस्तार के लिए आते थे यहां सैर-सपाटे की कोई गुंजाईश नहीं थी. हां, उन्होंने यह जिक्र जरूर किया है कि सिंध के राजा दाहिर को हराने के बाद उन्होंने यहां लूटपाट मचाया और लूट की वस्तुओं को अरब भेजा. लूट की वस्तुओं में हिंदू लड़कियां भी शामिल थीं.   

गुलाम बना दी जाती थीं औरतें और लड़कियां

गुलाम-महिलाएं

युद्ध में जीती गई औरतों का दुर्भाग्य यह था कि उन्हें विजेता अपना गुलाम बनाकर रखते थे. उन्हें यातनाएं भी दी जाती थीं. मध्ययुगीन इतिहास पर अगर गौर करें, तो पाएंगे कि भारत पर  तुर्क, अफगान और मुगलों ने हमला किया. इन्होंने अपनी परंपरा के अनुसार युद्ध में जीती गई महिलाओं को गुलाम बनाया और चूंकि वे महिलाएं थीं, इसलिए उनका जमकर यौन शोषण भी हुआ. इस्लाम में युद्ध में जीती गई वस्तुओं के लिए गनीमत का सिद्धांत होता है, जिसके तहत वे अपने राजा या मालिक को लूट का लगभग 20 प्रतिशत देते हैं, जिसमें खास वस्तुएं शामिल होती हैं और बाकी चीजों को लड़ाकों के बीच बांट दिया जाता है. यही वजह था कि लूटी गईं खूबसूरत महिलाएं मालिकों के हिस्से आती थीं और बाकी महिलाएं लड़ाकों की दासियां बनती थीं. इतिहासकार किशोरी शरण लाल ने अपनी किताब The Legacy of Muslim Rule in India में लिखा है कि युद्ध में पराजित राज्यों की औरतें बंदी बना ली जाती थीं, उन्हें गुलाम बनाकर या तो बाजारों में बेचा जाता था या फिर वह उनके हरम में जाती थी, जहां उनके साथ उसी तरह का व्यवहार होता था, जो युद्ध की लूट के साथ होता आया है.

महमूद गजनवी ने महिलाओं को लूट की वस्तु समझा

महमूद गजनवी ने एक तुर्क शासक था. उसने भारत पर 17 पर आक्रमण किया और हर बार भारत को लूटा. युद्ध के दौरान जब कोई राज्य पराजित होता था, तो पुरुषों की हत्या कर दी जाती थी और औरतों और बच्चों को बंदी बना लिया जाता था. हिंदू महिलाओं को मुसलमानों ने ‘माल ए गनीमत’ के तौर पर देखा और उनके साथ उसी तरह का व्यवहार भी किया जाता था. भारतीय इतिहास के विद्वान सर एचएम इलियट और जॉन डाउसन ने अपनी किताब, जो मूलत: मुस्लिम इतिहासकारों और लेखकों की कहानियों का अनुवाद है -The History of India as Told by Its Own Historians में लिखा है कि हिंदू औरतों को दास बाजारों में बेचा गया या फिर उन्हें हरम में रखा गया. जिन महिलाओं ने इस्लाम कबूल कर लिया उन्हें जीवनदान मिला और कुछ सम्मान भी. अन्य महिलाओं की नियति में बलात्कार ही लिखा है. इस किताब में बताया गया है कि मुस्लिम शासकों ने इन युद्ध को धार्मिक विजय के तौर पर पेश किया है.

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भारत पर हमला करने वाला पहला मुस्लिम आक्रांता कौन था?

मुहम्मद बिन कासिम

युद्ध में लूटी गई औरतों को क्या कहा जाता था?

माल ए गनीमत

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लेखक के बारे में

Author: Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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