टीबी जांच की रडार में होंगे सर्दी-खांसी वाले हर बुजुर्ग, टीबी मुक्त झारखंड की दिशा में बड़ा कदम

टीबी मुक्त झारखंड अब भी एक ब़ड़ी चुनौती है. इसे लेकर केंद्र से लेकर राज्य तक की सरकार कोशिश कर रही है. 2025 तक इस लक्ष्य को पाने के लिए मरीजों की पहचान के कई नए सरंजाम किए जा रहे हैं. जानिए अब सर्दी-खांसी वाले बुजुर्गों पर क्यों खास नजर है..

Great Leap Forward towards TB Free Jharkhand : टीबी यानी ट्यूबरक्लोसिस अर्थात यक्ष्मा या तपेदिक आज भी मानवता के लिए बड़ा संकट है. इससे निजात दिलाने के लिए केंद्र से लेकर राज्य तक की सरकारें कोशिश कर रही हैं. देश की तरह झारखंड को भी टीबी से मुक्त करने के लिए 2025 तक का लक्ष्य़ रखा गया है. 

टीबी पीड़ित लोगों की पहचान काफी दिनों तक नहीं हो पाती है. खासकर गरीब नहीं कहे जा सकने वाले परिवार के सदस्यों के टीबी पीड़ित होने की आशंका तक नहीं होती है. क्योंकि धारणा है कि पोषण की कमी नहीं पाए जाने वाले लोगों में सामान्यतः टीबी का संक्रमण नहीं होता है.

परंतु धनी परिवारों के डायबिटीज पीड़ित लोगों में भी टीबी के लक्षण पाए जाने के बाद सरकार की नजर खड़ी हो गई है. इसलिए डायबिटिज पीड़ित मरीजों की टीबी जांच की प्रक्रिया काफी पहले ही शुरू हो चुकी है.

बुजुर्गों का इलाज करने वाले डॉक्टरों को दी जाएगी गाइडलाइन

राज्य सरकार की ओर से अब बुजुर्गों का इलाज करने वाले डॉक्टरों को टीबी जांच की गाइडलाइन दी जाएगी. इसके तहत किसी बुजुर्ग के सर्दी-खांसी से पीड़ित पाए जाने पर उनके टीबी के लक्षणों की भी जांच की जाएगी. इसके लिए बुजुर्ग से बाजाप्ता सहमति ले ली जाएगी.

झारखंड के मेडिकल कॉलेजों में स्थित जेरियाट्रिक डिपार्टमेंट के डॉक्टरों को इस बारे में अलर्ट किया जाएगा. इसके अलावा सदर अस्पतालों या दूसरी जगह स्थित जेरियाट्रिक विशेषज्ञ डॉक्टरों को भी इस बारे में सतर्क किया जाएगा.

टीबी पर झारखंड के स्टेट टास्क फोर्स की योजना गैर सरकारी स्तर पर कार्यरत बुजुर्गों के चिकित्सकों को भी टीबी के लक्षणों पर निगरानी करने के लिए तैयार करने की है. जल्दी ही इस पूरी प्रक्रिया को फूलप्रूफ बनाने की कवायद की जानी है. 

टीबी नियंत्रण के लिए बुजुर्गों पर क्यों है खास नजर

उम्र बढ़ने के साथ ही इम्यूनिटी यानी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने लगती है. इस कारण टीबी के बैक्टीरिया के प्रभावी होने की आशंका प्रबल हो जाती है. ऐसी स्थिति में किसी व्यक्ति के भीतर दबी हुई टीबी की बीमारी(यानी प्रकट नहीं) पूरे परिवार को टीबी का शिकार बना सकती है. फिर वहां से यह बड़ी आबादी में फैल सकती है. 

कई बार लंबे समय तक टीबी का लक्षण प्रकट नहीं होने के कारण दवा प्रतिरोधक टीबी बैक्टीरिया के डेवलप होने की आशंका बनी रहती है. इससे मरीज को निजात दिलाने के लिए चिकित्सकों को काफी मशक्कत करनी पड़ती है. इसका संक्रमण भी काफी तेजी से होता है.  

पांच राज्यों के जोनल टास्क फोर्स की बैठक में जताई चिंता 

हाल ही में रांची में बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ और ओड़िशा राज्यों के टीबी पर ईस्टर्न जोन टास्क फोर्स की बैठक रांची में हुई है. इसमें टीबी मुक्त देश की दिशा में बाधा बन रहे कई पहलुओं पर चिंता जताई गई. मिलजुलकर इन बाधाओं के निराकरण की कोशिश पर बल दिया गया. 

टीबी मुक्त झारखंड के लिए बुजुर्गों के टीबी जांच के लिए सतर्क रहने की आवश्यकता है. खासकर सर्दी-खांसी का इलाज कराने आए बुजुर्गों में टीबी के लक्षणों की जांच जरूर करनी चाहिए. इसके लिए जल्दी ही मेडिकल कॉलेजों के जेरियाट्रिक विभागों को गाइडलाइन जारी किया जाएगा.

डॉ. मनोज कुमार, चेयरमैन, स्टेट टीबी टास्क फोर्स, झारखंड

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लेखक के बारे में

Author: Mukesh Balyogi

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