सतलुज विवाद :127 कट्स,तीन बार बदला नाम,30 साल पहले लापता बैंक कर्मचारी की कहानी 48 घंटे में गायब

सोचिए...अगर आपके खाने में सिर्फ नमक हो या सिर्फ मसाले, तो उसका स्वाद कैसा होगा? बिल्कुल उसी तरह, जब किसी कहानी पर 127 कैंचियां चलें, तो उसमें क्या ही बचेगा? हमारा सिस्टम इतिहास से संवाद करने की बजाय उसे कंट्रोल करने या छिपाने की कोशिश क्यों करता है? इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए जानना होगा दिलजीत दोसांझ की 'सतलुज' कहना क्या चाहती है.

Satluj Film controversy : शुक्रवार की शाम अक्सर मैं और मेरा एक साथी किसी अच्छी फिल्म के साथ बिताते हैं. इस शुक्रवार हमने सतलुज देखने का प्लान किया. बाहर रिमझिम बारिश, सामने टीवी की स्क्रीन और मूड बिल्कुल फिल्मी. लेकिन इस बार कहानी शुरू होने से पहले ही खत्म हो गई. क्योंकि वो अब गायब कर दी गई थी. गूगल किया, तो बस इतना मालूम हुआ कि फिल्म हटा ली गई है. मगर क्यों? इसका कोई जवाब कहीं नहीं मिला. मालूम हुआ कि फिल्म 30 साल पहले लापता हुए एक व्यक्ति की कहानी पर आधारित है. अभी तक हमने तो हमेशा यही सुना था कि 'गड़े मुर्दे नहीं उखाड़ते', लेकिन यहां तो है इतिहास के उन मुर्दों को फिर से दफनाने की कोशिश हो रही है...

प्रभात खबर की स्पेशल स्टोरी सीरीज़ में आज हम उसी फैसले की पूरी तहकीकात करेंगे. जानेंगे कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि 127 कट्स, तीन बार नाम बदलने और चार साल तक थिएटर में रिलीज का इंतज़ार करने के बाद भी दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' जब OTT प्लेटफॉर्म पर रिलीज हुई, तो उसे महज 48 घंटे के भीतर ही वहां से हटाना पड़ गया.

कौन थे जसवंत सिंह खालड़ा?

1990 का दशक... पंजाब आतंकवाद, अलगाववाद और पुलिस अभियानों के बीच झुलस रहा था. गोलियों की आवाज और बम धमाकों से आम लोगों का जीवन अस्तव्यस्त था. हालात ऐसे की सैकड़ों परिवार दर-दर भटक रहे थे. इस बीच खबरें आई कि पंजाब के कई इलाकों से बड़ी संख्या में युवा लापता हो रहे थे. दावा किया जा रहा था पुलिस उनका फर्जी मुठभेड़ कर रही है. एक बैंक कर्मचारी ने इन दावों और सवालों के जबाब तलाशने की जिम्मेवारी उठाई. जिसका नाम था जसवंत सिंह खालड़ा. 1952 में पंजाब के में जन्मे खालड़ा पेशे से बैंक कर्मचारी थे, लेकिन सामाजिक जीवन में वे शिरोमणि अकाली दल की मानवाधिकार इकाई से भी जुड़े हुए थे. यही जुड़ाव उन्हें उन सावालों तक ले आया था.

जब सरकारी रिकॉर्ड ने खड़े कर दिए सवाल

खालड़ा ने लापता लोगों के मामलों की पड़ताल शुरू की. उनकी जांच उन्हें पंजाब के श्मशान घाटों और नगर निगम के रिकॉर्ड तक ले गई. महीनों तक दस्तावेज खंगालने के बाद उन्होंने दावा किया कि 1984 से 1994 के बीच हजारों लावारिस शवों का अंतिम संस्कार किया गया. उनका आरोप था कि इनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की थी, जिन्हें कथित तौर पर गैर-कानूनी तरीके से मारने के बाद उनकी पहचान मिटाने की कोशिश की गई थी. 16 जनवरी 1995 को चंडीगढ़ में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने इन दस्तावेजों को सार्वजनिक किया. यह दावा उस समय पंजाब पुलिस के लिए बड़ा आरोप था. हालांकि पुलिस ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि जिन लोगों को लापता बताया जा रहा है, उनमें से कई फर्जी दस्तावेजों के सहारे विदेश चले गए हैं और उनकी गुमशुदगी का ठीकरा पुलिस पर फोड़ा जा रहा है. लेकिन खालड़ा पीछे हटने को तैयार नहीं थे. उन्होंने पुलिस को सार्वजनिक बहस की चुनौती दी.

और फिर एक दिन... खालड़ा खुद लापता हो गए

6 सितंबर 1995 की सुबह, अमृतसर स्थित अपने घर के बाहर जसवंत सिंह खालड़ा कार धो रहे थे. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, तभी एक सफेद वाहन वहां आकर रुका. कुछ हथियारबंद लोग उतरे और खालड़ा को अपने साथ ले गए. इसके बाद उन्हें फिर कभी जीवित नहीं देखा गया. शुरुआत में पंजाब पुलिस ने किसी भी तरह की गिरफ्तारी या अपहरण से इनकार किया. लेकिन खालड़ा की पत्नी परमजीत कौर ने हार नहीं मानी. उन्होंने अपहरण का मामला दर्ज कराया और लगातार न्यायालय का दरवाजा खटखटाती रहीं. क्योंकि उसे अपने पति पर पूरा भरोसा था और पुलिस के इरादों से भी वो वाकिफ थी. वैसे भी जो व्यक्ति सिस्टम से लड़ रहा हो, सिस्टम उसको उसको लेकर कितना फ्रिकमंद रहता है. इसे कौन नहीं जानता... खैर कहानी में आगे बढ़ते हैं...

CBI की जांच में क्या सामने आया?

पुलिस की जांच बिरबल की खिचड़ी की तरह पक रही थी. पुलिस के इरादे से वाकिफ परमजीत कौर ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और मामला पंजाब पुलिस से लेकर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंपा गया. CBI ने शुरू से जांच की और खालड़ा के पड़ोसी किरपाल सिंह रंधावा के बायन को आधार बनाया. किरपाल सिंह ने अपने बयान में दावा किया था कि खालड़ा के अपहरण में पंजाब पुलिस के अधिकारी शामिल थे. CBI को स्पेशल पुलिस ऑफिसर कुलदीप सिंह और अन्य गवाहों के बयान भी मिले. कुलदीप सिंह ने दावा किया कि खालड़ा को अवैध रूप से थाने में रखा गया, उनसे पूछताछ की गई और वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में उनके साथ मारपीट हुई. उन्होंने यह भी कहा कि एक दिन गोली चलने की आवाज सुनने के बाद उन्होंने खालड़ा को खून से लथपथ देखा. CBI सारा खेल समझ गई थी और उसने अपनी रिपोर्ट में बताया कि खालड़ा का अपहरण, अवैध हिरासत और हत्या पंजाब पुलिस के कुछ अधिकारियों द्वारा की गई थी. जांच और अदालती सुनवाई के बाद इस मामले में कई पुलिस अधिकारियों को दोषी ठहराया गया.

खालड़ा सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, एक सवाल बन गए

जसवंत सिंह खालड़ा का शव कभी बरामद नहीं हुआ. लेकिन उनकी जांच ने उन हजारों कथित लावारिस शवों और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया. CBI ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट में 2,097 ऐसे अंतिम संस्कारों का उल्लेख किया, जिनकी पहचान और मौत की परिस्थितियों पर खालड़ा ने सवाल उठाए थे. यही वजह है कि आज, तीन दशक बाद भी जसवंत सिंह खालड़ा का नाम केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि पंजाब के उस दौर के सबसे विवादित अध्यायों में से एक है.

127 कट्स... तीन नाम और 48 घंटे का सफर

जसवंत सिंह खालड़ा की कहानी सिर्फ अदालतों और जांच एजेंसियों तक सीमित नहीं रही. करीब तीन दशक बाद जब निर्देशक हनी त्रेहान ने इस कहानी को सिनेमा के पर्दे पर लाने की कोशिश की, तो विवाद एक बार फिर उसके साथ चल पड़ा. फिल्म का पहला नाम 'घल्लूघारा' रखा गया था. पंजाब के इतिहास में यह शब्द सिखों के कथित नरसंहार के संदर्भ में इस्तेमाल किया जाता है. बाद में इसका नाम बदलकर 'पंजाब 95' किया गया और आखिरकार रिलीज से पहले इसे 'सतलुज' नाम दिया गया.

विवाद यहीं नहीं रुका. 2022 में फिल्म के सह-निर्माता रॉनी स्क्रूवाला के प्रोडक्शन हाउस RSVP Movies ने फिल्म को प्रमाणन के लिए केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) के पास भेजा. करीब छह महीने बाद बोर्ड ने फिल्म को सैद्धांतिक मंजूरी तो दी, लेकिन इसके साथ 127 कट्स और कई बदलावों की सूची भी सौंप दी. हनी त्रेहान ने बताया कि CBFC ने मुख्य किरदार जसवंत सिंह खालड़ा का नाम बदलने, पंजाब पुलिस से जुड़े संदर्भ हटाने, तिरंगे और गुरबानी वाले कुछ सिन्स हटाने तथा कई स्थानों के नाम बदलने का सुझाव दिया. इन बदलावों को लेकर निर्माता और बोर्ड के बीच लंबे समय तक खींचतान चलती रही और फिल्म की रिलीज लगातार टलती गई. आखिरकार चार साल के इंतजार और कई बदलावों के बाद 3 जुलाई 2026 को फिल्म 'सतलुज' के नाम से OTT प्लेटफॉर्म ZEE5 पर रिलीज हुई. लेकिन फिल्म का यह सफर भी लंबा नहीं चला. रिलीज के करीब 48 घंटे बाद ही यह प्लेटफॉर्म से गायब हो गई.

ZEE5 से क्यों हटाई गई सतलुज?

फिल्म के अचानक हटने के बाद सवाल उठने लगे कि आखिर ऐसा क्या हुआ. ZEE5 ने एक संक्षिप्त बयान जारी करते हुए कहा कि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए फिल्म को अगली सूचना तक भारत में उपलब्ध नहीं कराया जाएगा. हालांकि इसे दोबारा प्लेटफॉर्म पर लाने के लिए कानूनी प्रक्रिया के तहत सभी प्रयास किए जाएंगे. हालांकि, अपने बयान में ZEE5 ने यह स्पष्ट नहीं किया कि फिल्म किसके निर्देश पर हटाई गई या इसके पीछे कौन-सी कानूनी या प्रशासनिक प्रक्रिया थी. यही वजह है कि 'सतलुज' पर विवाद अब सिर्फ 127 कट्स तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसकी OTT रिलीज और अचानक हटाए जाने को लेकर भी कई सवाल खड़े हो रहे.


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Published by: Gautam Kumar

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