पैगंबर मुहम्मद की निंदा करने और नास्तिकों के खिलाफ बना है पाकिस्तान में ईश निंदा कानून, मौत की है सजा

Blasphemy Law In Pakistan : पाकिस्तान विश्व के उन देशों में शुमार है, जहां ईश निंदा कानून लागू है और यहां पैगंबर मोहम्मद पर किसी भी तरह की अपमान जनक टिप्पणी करना अपराध है. यहां तक कि ईश्वर को ना मानना भी पाकिस्तान में अपराध माना जाता है.

Blasphemy Law In Pakistan : पाकिस्तान का ईश निंदा कानून एक बार फिर चर्चा में है, वजह यह है कि हाल ही में वहां की अदालत ने चार अल्पसंख्यकों को ईश निंदा कानून का दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई है. इन चारों पर आरोप है कि इन्होंने सोशल मीडिया पर मोहम्मद साहब के बारे में अपमानजनक टिप्पणी की. अब इन चारों की जिंदगी पर संकट है, आगे उनकी मौत की सजा कायम रहती है या शीर्ष अदालतें कुछ दया करती है, यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन एक बात तो तय है कि इन चारों को बड़ी सजा मिलेगी.

क्या है पाकिस्तान का ईश निंदा कानून?

पाकिस्तान एक इस्लामिक राज्य है, जहां इस्लाम को राष्ट्र धर्म माना गया है. ईश निंदा कानून में यह प्रावधान है कि कोई भी अगर पैगंबर मोहम्मद के बारे में कोई अपमानजनक टिप्पणी करता है, चाहे वह टिप्पणी मौखिक हो या लिखित, या किसी तस्वीर या फिर संकेत अथवा अन्य किसी तरीके से यह अपराध करता है तो उसे मौत की सजा सुनाई जा सकती है. इसके अलावा आजीवन कारावास और जुर्माने की सजा भी सुनाई जाती है.

पाकिस्तान में कब लागू हुआ ईश निंदा कानून

पाकिस्तान में जो ईश निंदा कानून वर्तमान समय में लागू है उसकी शुरुआत ब्रिटिश काल में ही हो गई थी, जब किसी भी धर्म के खिलाफ टिप्पणी करने पर सजा करने का प्रावधान था. 1956 में जब पाकिस्तान में संविधान लागू हुआ, तो ईश निंदा कानून को और भी कठोर बना दिया गया. हालांकि 1970 तक पाकिस्तान में ईश निंदा कानून उतना चर्चा में नहीं रहा, लेकिन 1980– 1986 के बीच जब वहां जनरल जिया-उल हक की सरकार रही तो ईश निंदा कानून का खूब इस्तेमाल हुआ और इस कानून में कई अन्य धाराएं भी जोड़ी गईं. अहमदिया मुसलमान को पाकिस्तान में मुसलमान नहीं माना जाता है और इसके लिए 1974 में संविधान में संशोधन भी किया गया था. इसी दौर में इस कानून का एक तरह से इस्लामीकरण कर दिया गया और अब यह कानून महज पैगंबर मोहम्मद के अपमान से संबंधित ही रह गया है. अलजजीरा डाॅट काॅम के अनुसार 1986 से पहले महज 14 केस ही ईश निंदा के दर्ज हुए थे, लेकिन उसके बाद सिनारियो पूरा बदल गया. 1987 से 2017 के बीच 1500 से अधिक लोगों पर ईशनिंदा का आरोप लगा और 75 लोगों की हत्या भीड़ ने ईशनिंदा के आरोप में कर दी. 2023 में ईश निंदा कानून को और भी सख्त कर दिया गया है.

हिंदुओं और ईसाइयों के खिलाफ किया जाता है ईश निंदा कानून का दुरुपयोग

पाकिस्तान में काम करने वाली मानव अधिकार संस्थाएं और सेक्यूलर लोगों का दावा है कि ईश निंदा कानून का दुरुपयोग अल्पसंख्यकों के खिलाफ किया जाता है. खासकर हिंदुओं और ईसाइयों के खिलाफ इस कानून का इस्तेमाल कर उन्हें जेल में डाला जाता है. हालांकि कई सेक्यूलर मुसलमान भी इस कानून का शिकार बने हैं और जेल में रहे, जिनमें अयाज निजामी का नाम हालिया चर्चा में रहा, जिन्हें 2017 में ईश निंदा कानून के तहत गिरफ्तार किया गया और 2021 में मौत की सजा सुनाई गई है. 2022 में एक श्रीलंकाई नागरिक प्रियंता कुमारा की भीड़ ने इसलिए हत्या कर दी थी, क्योंकि उन्होंने इस्लामी प्रार्थना लिखे हुए पोस्टर को फाड़ दिया था.

पाकिस्तान में नास्तिक होना भी अपराध

पाकिस्तान विश्व के उन चुनिंदा देशों में शुमार है, जहां नास्तिकता यानी ईश्वर की सत्ता में विश्वास नहीं करने को भी अपराध माना जाता है और इसके लिए मृत्युदंड का भी प्रावधान है. विश्व में कुल 7 देश ऐसे हैं जो नास्तिकता और ईशनिंदा के लिए मृत्युदंड देते हैं और 32 देशों में यह दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है. भारत में भी ईश निंदा कानून है, लेकिन यहां इसे धार्मिक भावनाओं को आहत करने से जोड़कर देखा जाता है और यह किसी खास धर्म पर लागू नहीं है. भारत एक सेक्यूलर देश है, जहां सभी धर्मों का आदर है और उसका अपमान करने वाले को सजा मिलती है. भारत के अलावा अन्य कई देशों में भी धर्म का अपमान करने पर सजा का प्रावधान है. 

किन देशों में ईशनिंदा के लिए है मृत्युदंड

  • नाइजीरिया
  • पाकिस्तान
  • ईरान
  • अफगानिस्तान
  • सोमालिया
  • मॉरिटानिया
  • सऊदी अरब

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By Rajneesh anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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