Birsa was caught yesterday, गवर्नर जनरल ने बिरसा मुंडा की गिरफ्तारी पर टेलीग्राम के जरिए यह सूचना लंदन भेजी थी

Birsa Munda Death Anniversary: आदिवासियों के भगवान बिरसा मुंडा के आंदोलन से अंग्रेज भयभीत थे और वे यह चाहते थे कि किसी भी तरह इस जनांदोलन को रोका जाए. उन्हें इस बात का डर था कि अगर यह आंदोलन तेज हो गया, तो इसे दबाना मुश्किल हो जाएगा. यही वजह थी कि जब बिरसा मुंडा की गिरफ्तारी हुई, तो गवर्नर जनरल ने टेलीग्राम के जरिए गृह विभाग को सूचित किया था. उस टेलीग्राम की काॅपी प्रभात खबर के पास सुरक्षित है, जिसमें यह लिखा हुआ है -Birsa was caught yesterday.

Birsa Munda Death Anniversary: आदिवासी अस्मिता के लिए आजीवन संघर्ष करने वाले बिरसा मुंडा की 9 जून को शहादत दिवस है. 9 जून को मात्र 25 वर्ष की आयु में यह असाधारण युवा शहीद हो गया था. अंग्रेजों ने उनकी प्रतिभा को पहचान लिया था और वे जानते थे कि अगर यह युवक उनकी गिरफ्तारी से छूट गया, तो यह एक बड़े आंदोलन को जन्म दे सकता है, इसलिए वे बिरसा मुंडा से डरते थे. अंग्रेजों ने जो सूचना दी उसके अनुसार बिरसा मुंडा की जेल में हैजा से मौत हुई थी, लेकिन यह सूचना भ्रामक प्रतीत होती है. कई दावे यह कहते हैं कि बिरसा मुंडा को जेल में जहर दे दिया गया था, जिससे उनकी मौत हुई.

आदिवासियों के लिए उनके हीरो हैं बिरसा मुंडा

बिरसा मुंडा आदिवासियों के हीरो हैं. वे काफी गरीब और साधारण परिवार के थे, लेकिन उन्होंने उस वक्त की परिस्थिति को देखते हुए यह भांप लिया था कि आदिवासियों से उनका सबकुछ छीना जा रहा है. उनकी जमीन, उनकी पहचान सबकुछ पर संकट है, तब उन्होंने संघर्ष की शुरुआत की. प्रबुद्ध आदिवासी गुंजल इकिर मुंडा बताते हैं कि बिरसा मुंडा को आदिवासी समाज अपनी प्रेरणा के रूप में देखता है. वे एक ऐसे व्यक्तित्व हैं, जिनसे आदिवासियों ने अपने हक के लिए संघर्ष करना सीखा. बिरसा मुंडा की खासियत यह है कि वे गरीबी में रहे और बहुत ही साधारण परिवार के थे, लेकिन उन्होंने अपने हक के लिए संघर्ष किया और एक ऐसी ताकत को चुनौती दी, जो उस वक्त पूरे देश पर राज कर रही थी. उन्होंने आदिवासियों को अपने हक के लिए खड़े होना सिखाया. जब उन्होंने देखा कि अंग्रेज उनसे सबकुछ छीन रहे हैं, तब उन्होंने हथियार उठाया.

बिरसा मुंडा से भयभीत थे अंग्रेज

गवर्नर जनरल का पत्र

बिरसा मुंडा एक प्रतिभाशाली युवा थे, जिनके अंदर गजब की लीडरशिप क्वालिटी थी. उनके इस गुण के बारे में अंग्रेज जान गए थे. यही वजह था कि वे बिरसा मुंडा और उसके आंदोलन से डरते थे. उन्होंने बिरसा मुंडा के आंदोलन को दबाने के लिए बहुत प्रयास किए. अंग्रेजों ने बिरसा के आंदोलन को दबाने के लिए बड़ी लड़ाई लड़ी और डोंबारी के युद्ध में अनेक आदिवासियों को गोली का शिकार बनाया. इस लड़ाई में कितने आदिवासी मारे गए थे, यह किसी को पता नहीं है, लेकिन उन वक्त स्टेट्‌समैन अखबार ने 400 लोगों के मारे जाने की सूचना प्रकाशित थी. रांची के डिप्टी कमिश्नर स्ट्रीटफील्ड ने इस रिपोर्ट पर आपत्ति की थी और कहा था कि सिर्फ 11 लोग मारे गये थे. बिरसा से जिस तरह आदिवासियों को एकत्रित किया और उलगुलान यानी क्रांति की शुरुआत की थी, अंग्रेज उससे घबराए हुए थे और किसी भी कीमत पर बिरसा को गिरफ्तार करना चाहते थे. बिरसा मुंडा की जब गिरफ्तारी हुई, तो उसकी सूचना गवर्नर जनरल ने लंदन तक भेजी थी. वह पत्र छह फरवरी को लिखा गया था, जिसमें यह बताया गया है कि बिरसा मुंडा की गिरफ्तारी एक दिन पहले यानी 5 फरवरी को हुई है. उनके अधिकतर साथी जो उसके सिद्धांतों पर चलते हैं, उनकी गिरफ्तारी पहले ही हो चुकी थी. इस पत्र में अंग्रेजी में लिखा हुआ है-Birsa was caught yesterday. Most of his principal adherent had been captured previously.

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लेखक के बारे में

Author: Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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