भारत विरोधी नारों का केंद्र रहा श्रीनगर का जामा मस्जिद बकरीद पर बंद, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती ने उठाए सवाल

Bakra Eid In kashmir : कश्मीर में बकरीद के मौके पर श्रीनगर का ऐतिहासिक जामा मस्जिद बंद है और इसे लेकर वहां के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और विपक्ष की नेता महबूबा मुफ्ती और इल्तिजा मुफ्ती ने अफसोस जताया है और कहा है कि जामा मस्जिद को खोला जाना चाहिए. लेकिन यहां बड़ा सवाल यह है कि आखिर सरकार ने जामा मस्जिद को बंद क्यों किया है? क्या जामा मस्जिद का इतिहास सिर्फ धार्मिक है या वहां से भारत विरोधी आवाजें भी बुलंद हुई हैं.

Bakra Eid In kashmir : बकरीद के मौके पर कश्मीर में नमाज अदा की गई और नमाज के बाद मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने श्रीनगर के जामा मस्जिद में नमाज अदा करने की अनुमति ना मिलने को दुर्भाग्यपूर्ण बताया और कहा कि इस तरह के फैसले किस आधार पर लिए जाते हैं, मुझे पता नहीं है, लेकिन सरकार को अपने लोगों पर भरोसा करना चाहिए. विपक्ष की नेता महबूबा मुफ्ती और इल्तिजा मुफ्ती ने भी बकरीद की बधाई दी और जामा मस्जिद में नमाज अदा करने की अनुमति ना मिलने पर अफसोस जताया. साथ ही इन दोनों नेताओं ने हुर्रियत के नेता उमर फारुक को नजरबंद करने की बात भी कही और यह कहा कि अगर सबकुछ ठीक है, तो फिर उन्हें नजरबंद क्यों किया गया है.

श्रीनगर के जामा मस्जिद में बकरीद की नमाज क्यों नहीं?

श्रीनगर के जामा मस्जिद में बकरीद की नमाज अदा करने की अनुमति सरकार की ओर से नहीं दी गई है. इसकी बड़ी वजह यह होगी कि वहां का इतिहास इस तरह का रहा है कि पुलिस प्रशासन किसी भी तरह का रिस्क लेने के मूड में नहीं है. उनके लिए आम लोगों की सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा है. पहलगाम हमले की घटना के बाद से सरकार और मुस्तैद है और किसी भी तरह की अनहोनी को टालना चाहती है. सुरक्षा कारणों से कई बार जामा मस्जिद को बंद किया है, सरकार की मंशा इसके पीछे और कुछ नहीं दिखती है.

जामा मस्जिद का कई बार हो चुका है राजनीतिक इस्तेमाल

श्रीनगर का जामा मस्जिद बकरीद पर बंद

श्रीनगर के जामा मस्जिद का कई बार राजनीतिक इस्तेमाल हो चुका है. खासकर 1990 के दशक में इस मस्जिद के जरिए अलगाववादियों ने राजनीतिक भाषण दिए और कई सभाओं का आयोजन भी किया गया. सैयद अली शाह गिलानी और मीरवाइज उमर फारुक जैसे हुर्रियत नेताओं ने जामा मस्जिद को कई बार मंच की तरह इस्तेमाल किया और यहां से अलगाववादी भाषण दिए गए. कई बार यहां शुक्रवार की नमाज के बाद भारत विरोधी नारे लगाए गए और पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए गए हैं. पत्थरबाजी की घटनाएं भी आम रही हैं, हालांकि आर्टिकल 370 के हटाए जाने के बाद इस तरह की घटनाओं पर लगाम कस गई है. अनुच्छेद 370 के हटने के बाद लगभग 16 महीनों तक मस्जिद बंद रही थी.

क्या है जामा मस्जिद का इतिहास

जामा मस्जिद का निर्माण 1394 ई. में शाह मिरी वंश के सुल्तान सिकंदर बुतशिकन ने करवाया था. यह मस्जिद कश्मीर में इस्लाम के प्रसार का बड़ा प्रतीक है. इस मस्जिद का स्थापत्य भी बहुत अनोखा है. यहां इंडो-इस्लामिक और बौद्ध-पहाड़ी वास्तुकला का अनोखा संगम है. मस्जिद में देवदार की लकड़ी से कई खंभे भी बनाए गए हैं. यहां एक साथ 30 हजार से अधिक लोग नमाज अदा कर सकते हैं.

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By Rajneesh anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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