भारत के नक्शे पर बार-बार क्यों छिड़ता है विवाद? जानिए सीमा, कानून और कूटनीति की पूरी कहानी

बांग्लादेश में भारत का कथित गलत नक्शा दिखाए जाने की घटना नई है, लेकिन ऐसा पहली बार नहीं हुआ. आखिर दुनिया के अलग-अलग मंचों पर भारत का नक्शा अलग क्यों दिखता है. ढाका की हालिया घटना के बहाने समझिए सीमा विवाद, अंतरराष्ट्रीय दावे, मैपिंग प्लेटफॉर्म्स की नीति और भारत की कानूनी व कूटनीतिक कार्रवाई.

India map controversy : आपने भारत देश का नक्शा देखने के लिए एक मैप ऐप खोला... फिर किसी दूसरी वेबसाइट पर देखा...और उसके बाद किसी तीसरे प्लेटफॉर्म पर भी देखा. और हर बार आपने एक अजीब बात नोटिस की, भारत तो वही था, मगर उसकी सीमाएं अलग-अलग दिखाई दे रही थीं. सिर्फ भारत नहीं दुनिया के कई देश इस समस्या से परेशान हैं. अमेरिका, रूस, जापान और फ्रांस जैसे कई देश सीमाओं को लेकर विवादों में उलझे हुए हैं. दुनिया में शायद ही कोई ऐसा देश हो जहां किसी न किसी रूप में सीमा विवाद न हो. लेकिन भारत की स्थिति अलग है, क्योंकि यहां कई बार अपने ही देश के नागरिकों के लिए सही नक्शा पहचानना मुश्किल हो जाता है. जरा सोचिए, अगर आपको अपने ही देश का आधिकारिक नक्शा पहचानने में परेशानी हो, तो यह कितनी हैरानी की बात होगी. अब सवाल उठता है कि आखिर भारत का सही नक्शा कौन-सा है? क्या एक ही देश के कई नक्शे हो सकते हैं? इस लेख में हम समझेंगे कि आखिर ऐसा क्यों होता है, और हालिया विवाद की पूरी कहानी क्या है?

पहले समझिए क्या है नया विवाद

दरअसल हुआ यह कि ढाका में "सार्क को फिर से मजबूत बनाने के रास्ते" को लेकर सेमिनार चल रहा था. कार्यक्रम में कई वरिष्ठ अधिकारी और विशेषज्ञ मौजूद थे. मंच पर भारत में बांग्लादेश के पूर्व उच्चायुक्त अहमद तारिक करीम अपनी प्रेजेंटेशन दे रहे थे. सब कुछ सही चल रहा था..लेकिन तभी उनकी एक स्लाइड स्क्रीन पर आई, जिसने पूरे माहौल को बदल दिया. स्लाइड में दिखाए गए नक्शे में जम्मू-कश्मीर को भारत की बजाय पाकिस्तान का हिस्सा दिखाया गया था. जिस पर ढाका स्थित भारतीय उच्चायोग की सेकंड सेक्रेटरी पूजा झा ने तुरंत आपत्ति जताई. उन्होंने साफ और स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह नक्शा तथ्यात्मक रूप से गलत है क्योंकि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है.

इसके जवाब में अहमद तारिक करीम ने कहा कि यह नक्शा केवल प्रतीकात्मक उद्देश्य से इस्तेमाल किया गया था और इसमें वास्तविक सीमाएं दिखाने का इरादा नहीं था. लेकिन पूजा कुमारी झा इस सफाई से संतुष्ट नहीं हुईं, और पूजा झा ने दोबारा अपनी बात रखते हुए कहा कि जब किसी आधिकारिक मंच पर भारत का नक्शा दिखाया जाता है, तो उसकी सीमाओं को सही तरीके से दर्शाना बेहद जरूरी है. उन्होंने दोहराया कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, इसलिए इस तरह की प्रस्तुति पर भारत अपनी आपत्ति दर्ज कराता है. गौरतलब है कि यह पूरा घटनाक्रम बांग्लादेश इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज (BIISS) में आयोजित सेमिनार के दौरान हुआ, जहां बांग्लादेश की विदेश मामलों की राज्य मंत्री Shama Obaid मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद थीं.

दुनिया क्यों प्रेजेंट करती है भारत का विवादित नक्शा

ढाका की इस घटना के बाद सवाल यह है कि आखिर अंतरराष्ट्रीय मंचों, विदेशी संस्थाओं और मैपिंग प्लेटफॉर्म्स पर भारत का नक्शा अलग-अलग तरीके से क्यों दिखाया जाता है?

क्यों दुनिया जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को भारत का हिस्सा नहीं मानती ? क्यों अक्साई चिन को अंतरराष्ट्रीय नक्शों में भारत से अलग दिखाया जाता है? पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर यानी पीओके (PoK) हो या अरुणाचल प्रदेश को लेकर क्यों दुनिया भ्रम में है. जबकि भारत ने कई बार यह स्पष्ट और साफ कर दिया है कि जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, पीओके, अक्साई चिन और अरुणाचल प्रदेश सभी भारत का अभिन्न हिस्सा है. इन सवालों का जवाब जानने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि भारत के नक्शे को लेकर सबसे बड़े विवाद किन-किन इलाकों से जुड़े हैं... और इन विवादों की शुरुआत कैसे हुई? देखिए इन्फोग्राफिक

तस्वीर प्रतीकात्मक और AI द्वारा निर्मित है
तस्वीर प्रतीकात्मक और AI द्वारा निर्मित है

देश एक लेकिन नक्शा अनेक..क्या है कारण

देश एक... लेकिन नक्शे अलग-अलग. आखिर ऐसा क्यों होता है? सवाल उठता है, क्या नक्शा गलत है, या इसके पीछे कोई बड़ी वजह छिपी है? दरअसल में, इसके पीछे सिर्फ एक नहीं, बल्कि कई कारण हैं.

  • पहला कारण-सीमा विवाद

दुनिया में कई ऐसी सीमाएं हैं, जिन पर पड़ोसी देशों के अलग-अलग दावे हैं. भारत, पाकिस्तान और चीन के बीच कुछ क्षेत्रों को लेकर लंबे समय से विवाद है. इसलिए अलग-अलग देशों या प्लेटफॉर्म पर इन इलाकों को अलग तरीके से दिखाया जा सकता है.

  • दूसरा कारण-संयुक्त राष्ट्र का रुख

संयुक्त राष्ट्र कई विवादित क्षेत्रों पर अंतिम फैसला नहीं देता. ऐसे इलाकों को वह Disputed यानी विवादित मानता है. यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हर नक्शा एक जैसा नहीं होता.

  • तीसरा कारण-मैप कंपनियों की नीति

अब बात Google, Apple और दूसरी डिजिटल मैप कंपनियों की. रिपोर्ट्स बताती हैं कि ये कंपनियां कई देशों में स्थानीय कानूनों और सरकारी नियमों के मुताबिक अलग-अलग संस्करण के नक्शे दिखाती हैं. यानी आप किस देश से नक्शा देख रहे हैं, इससे भी फर्क पड़ सकता है.

  • चौथा कारण- राजनीतिक संदेश

और कुछ मामलों में मामला सिर्फ तकनीकी नहीं होता. विश्लेषकों के मुताबिक, किसी क्षेत्र को खास तरीके से दिखाना कभी-कभी किसी देश या संस्था के राजनीतिक या कूटनीतिक रुख का संकेत भी माना जाता है.

यही वजह है कि एक ही दुनिया का नक्शा, अलग-अलग जगहों पर अलग दिख सकता है. जिसका अर्थ हुआ कि हर गलत नक्शा एक जैसी वजह से नहीं दिखाया जाता. कई बार यह तकनीकी चूक होती है या कई बार किसी देश या संस्था का आधिकारिक रुख और कई मामलों में राजनीतिक संदेश भी होता है.

कब-कब हुआ भारत के नक्शे को लेकर विवाद

ऐसे कई मौके आए हैं, जब अंतरराष्ट्रीय मंचों, विदेशी कंपनियों और यहां तक कि कुछ देशों ने भी भारत के आधिकारिक नक्शे से अलग सीमाएं दिखाईं. यानी, भारत के नक्शे को लेकर विवाद सिर्फ एक देश तक सीमित नहीं है. अलग-अलग देशों और संस्थानों के अपने-अपने राजनीतिक और कूटनीतिक रुख हैं. हर बार भारत ने इसका कड़ा विरोध दर्ज कराया. इसे समझने के लिए इन्फोग्राफिक देखिए

तस्वीर प्रतीकात्मक और AI द्वारा निर्मित है

विवादित नक्शा दिखाने पर भारत क्या करता है..?

अब तक आपने समझ लिया होगा कि कैसे अलग-अलग देशों, संस्थाओं और कंपनियों द्वारा समय-समय पर भारत का आधिकारिक नक्शे से अलग संस्करण प्रस्तुत किया गया. लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल उठता है...क्या भारत सिर्फ विरोध दर्ज कराकर रह जाता है, या फिर ऐसे मामलों में कोई कानून भी कार्रवाई करता है?

जवाब है—हां, कानून भी है.

भारत सरकार के लिए यह सिर्फ एक गलत तस्वीर या तकनीकी गलती का मामला नहीं होता. जब कोई विदेशी संस्था, वेबसाइट, कंपनी, मीडिया संगठन या अंतरराष्ट्रीय मंच भारत का Disputed यानी विवादित नक्शा दिखाता है, तो इसे देश की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से जुड़ा गंभीर मुद्दा माना जाता है. यही वजह है कि ऐसे मामलों में भारत का विदेश मंत्रालय संबंधित देश, संस्था या कंपनी के सामने आधिकारिक विरोध दर्ज कराता है. उनसे तुरंत विवादित नक्शा हटाने या उसमें सुधार करने की मांग की जाती है. पिछले कुछ वर्षों में कई वैश्विक कंपनियों, मीडिया संस्थानों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को भारत सरकार की ओर से ऐसे विरोध का सामना करना पड़ा है.

लेकिन मामला सिर्फ कूटनीतिक विरोध तक सीमित नहीं है. भारत में ऐसे मामलों से निपटने के लिए कानूनी प्रावधान भी हैं. क्रिमिनल लॉ (अमेंडमेंट) एक्ट, 1961 के तहत यदि कोई व्यक्ति या संस्था भारत की क्षेत्रीय सीमाओं को गलत तरीके से प्रदर्शित करती है, भारत के किसी हिस्से को किसी दूसरे देश का हिस्सा दिखाती है या किसी भी दृश्य माध्यम से देश की क्षेत्रीय अखंडता के विपरीत प्रस्तुति करती है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है. इस कानून के तहत दोषी पाए जाने पर तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है. इसके अलावा, डिजिटल मैप्स और जियोस्पेशियल डेटा के बढ़ते इस्तेमाल को देखते हुए भारत सरकार ने राष्ट्रीय भू-स्थानिक नीति (National Geospatial Policy) के जरिए भी यह स्पष्ट किया है कि भारत की आधिकारिक सीमाओं के गलत प्रदर्शन को स्वीकार नहीं किया जाएगा. जरूरत पड़ने पर सरकार इंटरनेट सेवा प्रदाताओं (ISPs) को ऐसे ऐप्स या वेबसाइटों को भारत में ब्लॉक करने के निर्देश भी दे सकती है.

इतना ही नहीं, सरकार ने एक समय Geospatial Information Regulation Bill का मसौदा भी तैयार किया था. इस प्रस्तावित कानून में भारत का गलत डिजिटल नक्शा, जीपीएस डेटा या ऑनलाइन मैप प्रकाशित करने पर 10 करोड़ से 100 करोड़ रुपये तक के जुर्माने और जेल की सजा का प्रस्ताव रखा गया था. हालांकि, यह विधेयक कभी कानून नहीं बन पाया. यानी साफ है कि भारत के नक्शे का सवाल सिर्फ भूगोल का नहीं, बल्कि देश की संप्रभुता, संवैधानिक सीमाओं और राष्ट्रीय सम्मान का भी है. इसलिए जब भी दुनिया के किसी कोने में भारत का नक्शा गलत दिखाया जाता है, तो उसके जवाब में सिर्फ आपत्ति नहीं, बल्कि कूटनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर कार्रवाई की जा सकती है.

भारत की तरह दुनिया क्यों नहीं दिखाता बड़ा दिल

विडंबना यह है कि जिस बांग्लादेश के साथ सीमा विवाद खत्म करने के लिए भारत ने संविधान तक में संशोधन किया, उसी देश में अब भारत के नक्शे को लेकर नया विवाद खड़ा हुआ है. करीब सात दशक तक चले सीमा विवाद को सुलझाने के लिए भारत ने बड़ा दिल दिखाया और दोनों देश के बीच भूमि सीमा समझौता (Land Boundary Agreement - LBA) आधिकारिक तौर पर लागू किया. इस समझौते के लिए भारत ने संविधान में संशोधन किया, ताकि दशकों पुराने सीमा विवाद का स्थायी समाधान किया जा सके. दोनों देश के बीच भूमि सीमा समझौता क्या था, इसे समझने के लिए नीचे दी गई इन्फोग्राफिक पर एक नजर डालिए.

तस्वीर प्रतीकात्मक और AI द्वारा निर्मित है

इतना ही नहीं, भारत ने चीन और पाकिस्तान, दोनों के साथ सीमा विवादों के समाधान के लिए भी बातचीत, कूटनीति और सैन्य स्तर पर संवाद का रास्ता अपनाया है.

भारत और चीन के बीच करीब 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर लंबे समय से विवाद है. जिसको सुलझाने के लिए 1993, 1996, 2005 और 2013 में दोनों देश के बीच कई महत्वपूर्ण समझौते हुए. सीमा विवाद के स्थायी समाधान के लिए स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव्स वार्ता और WMCC जैसे तंत्र बनाए गए. दोनों देशों के बीच कई दौर की कोर कमांडर स्तर की वार्ता हो रही है.वहीं भारत और पाकिस्तान के बीच मुख्य विवाद कश्मीर, नियंत्रण रेखा (LoC) और सर क्रीक को लेकर है. इन मुद्दों के समाधान के लिए 1972 के शिमला समझौते और 1999 के लाहौर घोषणापत्र में दोनों देशों ने द्विपक्षीय बातचीत से विवाद सुलझाने की प्रतिबद्धता जताई. जिस पर भारत कायम है. इसके साथ-साथ 2003 के संघर्ष विराम समझौते को 2021 में फिर से लागू करने पर सहमति बनी. इसके अलावा भारत ने कॉम्पोजिट डायलॉग और अन्य कूटनीतिक वार्ताओं के जरिए भी समाधान तलाशने की कोशिश भी की है.

हालांकि,इन सब के बीच भारत सरकार लगातार यह कहती रही है कि राष्ट्रीय संप्रभुता और सुरक्षा से समझौता नहीं किया जाएगा. जिसके लिए भारत ने संवाद और कूटनीति को प्राथमिकता देने के साथ-साथ आवश्यक होने पर अपनी सुरक्षा के लिए सैन्य कदम भी उठाए हैं, लेकिन अपनी सीमाओं और राष्ट्रीय हितों की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है.

दुष्प्रचार का जवाब कूटनीति और मीडिया के जरिए देना होगा : विशेषज्ञ

इस मामले को और विस्तार से जानने के लिए प्रभात खबर डिजिटल ने रक्षा मामलों के जानकार और रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल जेएस सोढ़ी से बात की. उन्होंने कहा कि उनका मानना है, भारत के नक्शे को लेकर फैलाए जाने वाले भ्रामक दावों को पूरी तरह रोक पाना संभव नहीं है, क्योंकि हर संप्रभु देश अपनी आधिकारिक स्थिति और विचार रखने के लिए स्वतंत्र है. हालांकि, भारत को ऐसे दावों का तथ्यों और अंतरराष्ट्रीय मानकों के आधार पर लगातार और प्रभावी तरीके से जवाब देना चाहिए, उनके अनुसार, जब भी चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश या किसी अन्य देश अथवा वैश्विक मंच पर भारत के मानचित्र को लेकर विवादित या भ्रामक प्रस्तुति सामने आए, तो भारत को उसका तत्काल और सशक्त प्रतिवाद करना चाहिए. साथ ही, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस तरह के दुष्प्रचार को उजागर करते हुए बार-बार यह स्पष्ट करना चाहिए कि भारत की आधिकारिक भौगोलिक सीमाएं क्या हैं.

रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल जेएस सोढ़ी का मानना है कि इस दिशा में केवल सरकारी स्तर पर ही नहीं, बल्कि भारतीय मीडिया संस्थानों के साथ-साथ वैश्विक मीडिया और अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है. उनके मुताबिक, तथ्य आधारित जानकारी को व्यापक स्तर पर प्रसारित किया जाना चाहिए, ताकि भारत का आधिकारिक पक्ष दुनिया के हर कोने तक पहुंचे और भारत के नक्शे को लेकर फैलाए जा रहे भ्रामक दावों तथा प्रचार का प्रभावी ढंग से जवाब दिया जा सके. ये भी पढ़ें : PGI 2.0 Report : लर्निंग और इक्विटी में बेहतर, मगर खराब इंफ्रास्ट्रक्चर के कारण पिछड़ रहा बिहार


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Published by: Gautam Kumar

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